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ये भूख भी बेहद जालिम है, पेट की हो या हवस की

ये वक़्त एक अजीब सा दर्द भी दे रहा है। बीमारी तो अपनी जगह है लेकिन पेट की आग कुछ भी करने को मजबूर कर रही है।

 Shiv Kumar Mishra |  21 July 2020 4:28 AM GMT  |  दिल्ली

ये भूख भी बेहद जालिम है, पेट की हो या हवस की
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संजय रोकड़े

बेशक, भूख बेहद जालिम होती है। आपने कभी ये महसूस किया या ना किया लेकिन मुझे इसका एहसास पूरा- पूरा है। इस जालिम भूख की बेवफाई को कई दफा करीब से महसूसा है।

वक्त बेवक्त इसके आक्रोश को भी झेला है।

अब आप कहेगें भूख का आक्रोश। ये कैसी बात कर रहा हूं मैं। लेकिन आप मेरा यकिन मानिए इस जालिम भूख का अपना एक आक्रोश भी है। बेहद दर्दनाक । असहनीय।

खैर भूख के आक्रोश पे बात फिर कभी।

फिलवक़्त, हम बात करते है इस दौर की महामारी पे। जब से ये महामारी आयी है तब से हम सबके मुंह एक ही बात सुन रहे है कि महामारी को अवसर में बदलो।

ये बात सियासतदान बडे जोर- शोर से कह रहे है ।और तो और जब तक कहते सुनायी दे रहे है।

वैसे तो आप भी सोचते होगें कि जब सब कह रहे है कि महामारी को अवसर में बदलों तो आपका मन भी लालायित तो होता ही होगा। आखिर आपका भी तो मन जो ठहरा।

लेकिन सोचते भी होगें कि आखिर अवसर में बदले तो बदले कैसे।

बहरहाल। ये भी एक कला है। ठीक उस भूख की तरह जो हर किसी के पेट में राज नही करती है। किसी बदनसीब का पेट ही उसका वास होता है, जैसे कि हम सबने देखा भी है।

खैर। महामारी को आप भले ही अवसर में ना बदल पा रहे हो लेकिन बदलने वाले तेजी से बदल रहें है।

हर कोई अपने- अपने तरीके से बदल रहा है।

सियासतदान नयी तरह की सियासत करके। व्यापारी घाटे का व्यापार बता कर मुनाफे का लाभ उठा रहा है। तालाबंदी के दौरान भी देश के किसी एक शहर से 4 सौ से साढ़े 4 सौ करोड़ टैक्स चोरी की जा कर।

सोचो भला, ऐसे वक़्त में भी कोई घाटे का व्यापार कर रहा होगा। सोचना आपको है।

पर बात अभी इस पर नही। बात उस पर होनी चाहिये कि जब देश में किसी को अपना पेट पालने तक को मोहताज हो जाना पढे तो ऐसे में वो क्या करे।

जब इंसान को दो वक़्त की रोटी तक नसीब ना हो ऐसे वक़्त में वो जिंदगी को जिए कैसे। खासकर बाहर भी उसके लायक कोई काम ना बचा हो। सब बंद हो।

अब सवाल है कि उसके पास जो भी अवसर में बदलने के लिए मौजुद हो उसे उसके सहारे अवसर में बदलने का प्रयास करना चाहिये या नही।

गर भूख भी कहने लगे कि -अब मेरी भी इंतेहां हो गयी है। ठीक उस खूबसूरत गीत की तरह जिसे हमने कभी गुन गुनाया है-

इंतेहां हो गयी मेरे यार की

आप यकिन मानिए भूख की भी अपनी इंतेहां है। आप ही बताओ है या नही। कब तक कोई भूखा रह सकता है। बताओ तो जरा ।

बेशक भूख, भूक है और उसकी अपनी इंतेहां भी है। इसे कोई झुठला नही सकता है।

इसे सच को कौन नकार सकता है कि भूख को मिटाने के लिए कुछ तो करना ही होता है।

हां इस भूख को मिटाने के तरीके अपने- अपने हो सकते है। उसमें किसी को कोई दिक्कत भी क्या होनी चाहिये।

पर ये भूख का फलसफा भी बड़ा अजीब है। मेरी तो अब तक समझ में नही आया है। पता नही ये जाने कैसा है।

मैं तो अब तक समझ नही पाया हूं और आप, आपका मुझे पता नही।

पर ये जो वक़्त चल रहा है ना, ये वक़्त लोगों की अजीब सी भूख बढ़ा रहा है।

ये वक़्त एक अजीब सा दर्द भी दे रहा है। बीमारी तो अपनी जगह है लेकिन पेट की आग कुछ भी करने को मजबूर कर रही है।

अजीब किस्म की मजबूरियां तारी है।

सच कहूं तो भूख का ये दौर हर किसी को बाजार की और खिंच के ले आया है। जो चाहे उसे भी और जो ना चाहे उसे भी।

मैं इस चित्र के हवाले से यहां ये कहूं कि भूख दोनों को बाजार तक खिच लायी है

" इक खरीदने के लिए निकला तो "

" दूसरी खुद को बेचने चली आयी "

तो क्या गलत है।

ये भूख भी बड़ी अजीब है। बेहद जालिम है। पेट की हो या हवस की।

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