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कमलनाथ सरकार से शिवराज सरकार पंचक से पंचनामे तक...

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नवनीत शुक्ला

मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार बड़े ढोल-ढमाके के साथ आई थी। सरकार ने पंचक में ही मंत्रिमंडल की शपथ ली। कमलनाथ ने भी शपथ ले ली। फिर मंत्रालयों को लेकर चला लंबा घमासान। मंत्रालय बंटने में समय निकलने के बाद सरकार जैसे-तैसे कामकाज में लगी ही थी, तबादला उद्योग से थोड़ी गति प्रारंभ हो गई थी। इस बीच पार्टी के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी के लिए मंथरा हो गए और पूरी सरकार पंद्रह महीने में भरभराकर गिर गई। कमलनाथ सरकार के समय अधिकारी ही सरकार चला रहे थे। मंत्री भी अधिकारियों पर ही आश्रित थे। पंद्रह महीने के कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस का कार्यकर्ता वहीं खड़ा रहा, जहां वह पहले दिन था। राज्यपाल की सरकार दिखने लगी थी। पंचक में बनी सरकार का पंचनामा कुछ इस प्रकार हो गया कि सरकार गिरने के बाद फिर वापस ही नहीं लौटी।

इसके बाद पंचक में ही मामा को सरकार का गठन करना पड़ा। भाजपा की सरकार ने भी पंचक में ही शपथ ली। हालांकि मामा ने इसका दु:ख भी व्यक्त किया कि वे नवरात्रि में शपथ लेना चाहते थे, पर होनी को कौन टाल सकता है। होनी है वही, जो राम रचि राखा... न तिल बराबर आगा, न राई बराबर पाछा। पंचक में ही भाजपा सरकार ने मंत्रिमंडल का गठन किया। सौ दिन से ज्यादा समय तक ठीक कांग्रेस की तरह ही मंत्रालय नहीं बंट पाए। फिर जिलों के प्रभार भी अभी तक नहीं बंट पाए। दूसरी ओर भाजपा की भी इस पंचक सरकार को दो माह बाद पंद्रह महीने हो रहे हैं। मामा की उंगली में राहू में बुध का अंतर चल रहा है। इधर एक बार फिर सिंधिया पूरी तरह मौन हो गए हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कमलनाथ की सरकार में दो महीने वे मौन हो गए थे। इधर भाजपा में भी सरकार, अधिकारी ही चला रहे हैं। भाजपा का कार्यकर्ता भी वहीं खड़ा है, जहां वह पंद्रह महीने पहले खड़ा था। पूरे हालात क्या वही के वही तो नहीं बन रहे हैं। हालांकि मामा लाल किताब के टोटकों पर इस समय काम कर रहे हैं। वे नौ ग्रहों से जुड़े हुए अलग-अलग वृक्ष इन दिनों लगा रहे हैं। राजनीति में कहा जाता है ऐसा कुछ नहीं घट रहा, जो पहले नहीं घटा है। घट वही रहा है, जो पहले घटा है। इतिहास हमेशा अपने आपको दोहराता है। अब देखना होगा पंचक से बनी सरकार पंचक से पंचनामे तक क्या पहुंचेगी या फिर ग्रह बदलेंगे, आगे की स्थिति आगे ही दिखाई देगी और उसे देखेंगे हम लोग।

क्राइसेस मैनेजमेंट खुद ही क्राइसेस...

इंदौर में कोरोना महामारी ने इतनी तेजी से पैर पसारना शुरू कर दिए हैं कि क्राइसेस मैनेजमेंट को अब सरकार ने दरकिनार कर अधिकारी मैनेजमेंट पर ही भरोसा करना बेहतर समझा है। वैसे भी क्राइसेस मैनेजमेंट के सदस्य इन दिनों खुद ही क्राइसेस में हैं। उन्हें अपना भविष्य दिखाई नहीं दे रहा है। दूसरी ओर भोपाल में बैठे बड़े राजनेता यह समझ गए हैं कि बीमारी से निपटने के लिए विषयों के ज्ञाताओं से चर्चा की जाए, ताकि कुछ बेहतर हो सके, क्योंकि क्राइसेस मैनेजमेंट नियम और नीति बनाने में कभी भी सही दिशा नहीं दे पाया है। कुछ दुकानें खुलवाने में लगे रहे, कुछ दुकानें खोलने में लगे रहे।

Shiv Kumar Mishra
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