अकेले पड़े शिवराज...!

 सी पी सिंह जर्नलिस्ट |  2018-09-21 16:32:54.0  |  भोपाल

अकेले पड़े शिवराज...!

पहली बार ऐसा हो रहा है जब मध्य-प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहन अकेले ही जुटे हुए हैं...वे रोज़ 16-17 घंटों काम कर रहे हैं...सुबह से निकल जाते हैं और एक दिन में कई ज़िलों की ख़ाक छानते हैं...कहीं पत्थर, कहीं जूते, कहीं काले झंडे कहीं ज़बरदस्त स्वागत कहीं कानफोड़ू ज़िंदाबाद सब अकेले ही झेल रहें हैं...लेकिन बाक़ी के भाजपा नेता नदारद है...चौंकाने वाली बात तो यह है कि...सीएम शिवराज सिंह चौहान पर जब सीधी जिले के चुरहट में हुए पथराव के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश भर में धरना प्रदर्शन करने का ऐलान किया था...लेकिन राजधानी भोपाल में यह धरना पूरी तरह से फ्लॉप रहा...बताया जा रहा है कि धरने में भाजपा के कुल 100 दिग्गज नेता भी नहीं थे...जबकि उस समय भोपाल में लगभग सभी मंत्री मौजूद थे...अब बड़ा सवाल यही है कि...क्या सीएम शिवराज सिंह भाजपा में अकेले पड़ गए हैं...यह सवाल इसलिए भी है क्योंकि रात 9:30 बजे सीएम शिवराज सिंह पर चुरहट में पथराव हुआ...लेकिन दूसरे दिन सुबह 10:30 बजे तक भाजपा के किसी दिग्गज नेता ने इस घटना की निंदा तक नहीं की थी...बाद में कांग्रेस को टारगेट किया गया...और प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने प्रदेश व्यापी विशाल धरने का ऐलान किया पर यह भी तो फ्लॉप शो ही साबित हुआ...मध्य-प्रदेश में चुनावी रण का शंखनाद हो चुका है...राष्टीय चुनाव आयोग की टीम के भोपाल दौरे के बाद अब राज्य में चुनावी काउंटडाउन भी शुरू हो गया...हालांकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पूरी ताकत से अपना चुनावी अभियान में जुटे हुए हैं...लेकिन चुनाव से ठीक पहले जहां कांग्रेस ने कमलनाथ को अध्यक्ष बनाकर राज्य में संगठन को नई ऊर्जा देने की कोशिश की है तो दूसरी ओर राज्य में डेढ़ दशक से सत्ता में काबिज भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने इस बार भी मुख्यमंत्री शिवराज के चेहरे पर ही भरोसा जताया है...भाजपा मानती है कि मध्य-प्रदेश में शिवराज के अलावा कोई दूसरा ऐसा चेहरा नहीं जो चौथी बार राज्य में बीजेपी की सरकार बना सके...यानी शिवराज ही चुनाव में भाजपा के ट्रंप कार्ड हैं...मध्य-प्रदेश के 'मामा' शिवराज का चेहरा ही भाजपा की जीत की गारंटी बना हुआ है...इसी समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा चुनाव से पहले पूरे राज्य में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जन-आशीर्वाद यात्रा निकाल रही है...इस यात्रा के जरिए सीएम शिवराज राज्य की सभी 230 विधानसभा सीटों पर पहुंचकर लोगों से सीधा संवाद कर रहे हैं...इस यात्रा के लिए मुख्यमंत्री लगातार रोड शो और सभाएं कर रहे हैं...यात्रा के दौरान अब तक कई ऐसे मौके आए हैं जब मुख्यमंत्री ने आधी रात के बाद भी जनसभाओं को संबोधित किया है...बारिश या आधी रात में हो रही सभाओं में उमड़ रही भीड़ के फोटो-वीडियो भाजपा के सोशल मीडिया सेल जमकर वायरल कर रहे हैं...इस अभियान को एक ओर भाजपा अपने नेता की उपलब्धि बता रही है...वहीं सियासी गलियारों में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है कि कहीं न कहीं चुनाव से ठीक पहले शिवराज अकेले पड़ते जा रहे हैं...शिवराज सिंह को पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं का जो सहयोग मिलना चाहिए वो नहीं मिलता दिखाई दे रहा है... जबकि भाजपा के आला नेताओं ने जन आशीर्वाद यात्रा शुरू होने से पहले कहा था कि यात्रा का समापन 25 सितंबर को भोपाल में होगा जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र और अमित शाह भी शामिल होंगे... लेकिन अब भाजपा का कहना है कि यात्रा चुनाव तक चलेगी यानी मुख्यमंत्री की यात्रा जारी रहेगी...!!

लंबे समय से सत्ता में रहने से पार्टी को जो एंटी-इनकंमबेंसी का सामना करना पड़ रहा है...उसको फिलहाल अकेले शिवराज अपनी सभाओं के जरिए दूर करने की कोशिश कर रहे हैं...इसके अलावा 25 सितंबर को भोपाल में होने वाले कार्यकर्ता महाकुंभ में भी नरेंद्र मोदी के शामिल होने पर भी संशय खड़ा हो गया है...मतलब...एक बार फिर मध्य-प्रदेश में भाजपा शिवराज के भरोसे है...इतना ही नहीं दिल्ली में हुई भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के फोटो सेशन में शिवराज के न होने पर कांग्रेस ने भी चुटकी ली है...भाजपा में अलग-थलग पड़ गए सीएम शिवराज सिंह चौहान को अब पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और बाबूलाल गौर की याद आने लगी है...शायद यह पहली बार है जब चुनावी सभा में सीएम शिवराज सिंह ने मध्यप्रदेश के विकास का श्रेय अपने अलावा किसी और को दिया...सीएम ने कहा कि उमाश्री, गौर और मैंने प्रदेश की किस्मत बदल दी है...अब तक शिवराज सिंह सिर्फ 'मैं' का ही उपयोग किया करते थे...यहां तक कि तमाम प्रचार अभियानों में भी भाजपा के कार्यकाल के बजाए शिवराज सिंह के कार्यकाल का जिक्र किया जाता रहा है...! भाजपा में अलग-थलग पड़ गए सीएम शिवराज सिंह चौहान को अब पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और बाबूलाल गौर की याद आने लगी है...शायद यह पहली बार है जब चुनावी सभा में सीएम शिवराज सिंह ने मध्यप्रदेश के विकास का श्रेय अपने अलावा किसी और को दिया...सीएम ने कहा कि उमाश्री, गौर और मैंने प्रदेश की किस्मत बदल दी है...अब तक शिवराज सिंह सिर्फ 'मैं' का ही उपयोग किया करते थे...यहां तक कि तमाम प्रचार अभियानों में भी भाजपा के कार्यकाल के बजाए शिवराज सिंह के कार्यकाल का जिक्र किया जाता रहा है...!!

अब तक शिवराज सिंह ने जितनी भी लड़ाइयां लड़ी हैं...उसमें हमेशा उनकी पार्टी, आरएसएस और उनके कुछ चुनिंदा साथी हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर साथ में खड़े रहे...चाहे 2008 फिर 2013 के विधानसभा चुनाव या फिर डंपर या व्यापम काण्ड जैसे संकट हों...पहली बार ऐसा हो रहा है जब मुख्यमंत्री अकेले ही जुटे हुए हैं...वे रोज़ 16-17 घंटों काम कर रहे हैं...सुबह से निकल जाते हैं और एक दिन में कई ज़िलों की ख़ाक छानते हैं...कहीं पत्थर, कहीं जूते, कहीं काले झंडे कहीं ज़बरदस्त स्वागत कहीं कानफोड़ू ज़िंदाबाद सब अकेले ही झेल रहें हैं सीएम शिवराज...लेकिन बाक़ी के भाजपा नेता नदारद है...मध्य-प्रदेश के बड़े नेताओं की बात करे तो प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गी, बाबूलाल गौड़, और उमाशंकर गुप्ता शिवराज सिंह से किनारा काटते साफ दिखाई पड़ते है...वही यह भी पहली बार हुआ है जब केंद्रीय नेतृत्व शिवराज सिंह के साथ खड़ा हुआ दिखाई नहीं दे रहा... प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भी उनकी पसंद का नहीं है...सो पूरा चुनाव अभियान एक ही धुरी पर आकर केंद्रित हो गया...अगर कोई साथ में है तो उनकी छवि और प्रचार का काम देखने वाला जनसंपर्क विभाग और कुछ विश्वस्त अधिकारी...जनसंपर्क में भी पहली बार ऐसा हुआ कि एक साथ चार धनुर्धर...एक से बढ़कर एक क्षमतावान लोग...मुख्यमंत्री का मीडिया मैनेजमेंट संभाल रहे हैं...अब इतने सारे रसोइए मिलकर चुनावी जीत की खिचड़ी पका रहे हैं...देखते हैं क्या होता है...?

वैसे बड़ा धर्मसंकट आन पड़ा है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर... कांग्रेस के नेताओं की चुनौती से निपटें या अपने पार्टी के भीतर नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के कारण पनप रहे असंतोष से...कांग्रेस पार्टी ने अपनी बदली हुई रणनीति के तहत सभी नेताओं की एक साथ रैली करने की बजाए अलग-अलग क्षेत्रों में सभाएँ करने का नया तरीक़ा विकसित कर लिया है...वहीं शिवराज सिंह अकेले ही लगे हैं...मध्यप्रदेश से एक दर्जन के लगभग भाजपा नेता केंद्र सरकार में मंत्री या फिर महत्वपूर्ण पदों पर है...लेकिन नरेंद्र सिंह तोमर की एक आध-सभा के अलावा किसी ने आज तक चुनावों के बाबत प्रदेश में कुछ ऐसा नहीं किया जो दिखाई दिया हो...सवाल यही उठ रहा है कि...कहाँ हैं सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन, उमा भारती, थावरचंद गहलोत, प्रकाश जावडेकर, वीरेंद्र कुमार, एमजे अक़बर या कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, अनूप मिश्रा, फग्गन सिंह कुलस्ते, सत्यनारायण जटिया या और नामचीन नेता...? वहीं कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, अजय सिंह, अरुण यादव, जीतू पटवारी, राजमणि पटेल और अन्य छोटे बड़े नेता अपने अपने स्तर पर अलग अलग क्षेत्रों में चुनावी कमान संभाले हुए हैं...पहली बार कांग्रेस में "एक नेता" या "मुख्यमंत्री" का सवाल का हावी नहीं है...पिछले तेरह सालों में शिवराज आख़िर इतने अकेले क्यों पड़ गये….पता नहीं क्यों 2003 के दिग्विजय सिंह याद आ रहे हैं...जो इसी तरह तब अकेले पड़ गये थे...!!

कुंवर सी.पी सिंह...,

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