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तो क्या सिर्फ 40 दिन...क्या उद्धव से छिन जाएगी कुर्सी?

उद्धव सरकार की ओर से संबंधित प्रस्ताव को राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास भेजे शुक्रवार को 11 दिन हो गए, लेकिन अब तक राजभवन ने न तो इसे स्वीकार किया है और न अस्वीकार। ऐसे में राज्य सरकार की नजरें राजभवन के फैसले पर टिकी हैं।

 Shiv Kumar Mishra |  18 April 2020 3:03 AM GMT  |  दिल्ली

तो क्या सिर्फ 40 दिन...क्या उद्धव से छिन जाएगी कुर्सी?
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मुंबई: मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को मनोनीत सदस्य के रूप में विधान परिषद भेजने के मुद्दे पर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की खामोशी शिवसेना चीफ के लिए टेंशन बढ़ाने वाली है। उद्धव ठाकरे को विधान परिषद सदस्य मनोनीत किए जाने का प्रस्ताव 10 दिन से राजभवन में लंबित है, लेकिन इस पर अभी तक कोई फैसला नहीं आया है।

अब मुख्यमंत्री के पास सिर्फ 40 दिन बचे हैं। इस दौरान अगर वह विधान परिषद के लिए निर्वाचित या मनोनीत नहीं हुए, तो उनका मुख्यमंत्री पद अपने आप चला जाएगा। अगर ऐसा हुआ, तो कोरोना संकट के इस काल में राज्य को एक अभूतपूर्व संवैधानिक और राजनीतिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में सरकार का ध्यान राजभवन के फैसले पर लगा है।

राजभवन के फैसले पर टिकीं सबकी नजरें

6 अप्रैल को राज्य मंत्रिमंडल ने मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में और उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अध्यक्षता में हुई बैठक में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित कर राज्यपाल को भेजा था कि मौजूदा परिस्थिति में विधान परिषद के चुनाव नहीं हो सकते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे जो इस समय ना तो विधानसभा के सदस्य हैं और ना विधान परिषद के सदस्य हैं, उन्हें राज्यपाल की ओर से नामित किए जाने वाली विधानसभा की सीट के लिए मनोनीत किया जाए।

इस प्रस्ताव को राज्यपाल के पास भेजे शुक्रवार को 11 दिन हो गए, लेकिन अब तक राजभवन ने न तो इसे स्वीकार किया है और न अस्वीकार। ऐसे में राज्य सरकार की नजरें राजभवन के फैसले पर टिकी हैं। दरअसल, राज्य में अभूतपूर्व स्थिति है। इससे पहले कभी ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई कि राज्यपाल को किसी मुख्यमंत्री को मनोनीत सदस्य के तौर पर विधान परिषद भेजने की जरूरत पड़ी हो।

संवैधानिक विशेषज्ञों से कानूनी सलाह!

इस अभूतपूर्व राजनीतिक और संवैधानिक संकट को टालने के लिए ही मंत्रिमंडल ने राज्यपाल के पास उद्धव ठाकरे के नाम की सिफारिश की है। अपुष्ट खबरों में बताया जा रहा है कि राज्यपाल इस संबंध में संवैधानिक विशेषज्ञों से कानूनी सलाह मशविरा कर रहे हैं।

राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री ने बताया कि मुख्यमंत्री का कार्यकाल 28 मई को समाप्त हो रहा है। उन्हें उम्मीद है कि इससे पहले राज्यपाल अपना फैसला ले लेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति को देखते हुए उन्हें इस बात का पूरा भरोसा है कि राज्यपाल का फैसला सकारात्मक होगा, क्योंकि राज्य को संवैधानिक संकट से बचाने की जितनी जिम्मेदारी है राज्य सरकार की है, उतनी ही जिम्मेदारी राज्यपाल की भी है।

अगर गवर्नर ने सिफारिश को अस्वीकार कर दिया?

अगर राज्यपाल ने मंत्रिमंडल की सिफारिश को अस्वीकार कर दिया तब क्या होगा? इस सवाल पर मंत्री ने कहा कि तब हमारे पास दो ही विकल्प होंगे एक तो 3 मई को लॉकडाउन खत्म होने के तुरंत बाद चुनाव आयोग विधान परिषद की खाली पड़ी सीटों के चुनाव का ऐलान करें और 27 मई से पहले चुनाव प्रक्रिया पूरी कर परिणाम घोषित करें, ताकि मुख्यमंत्री निर्वाचित सदस्य के रूप में सदन के सदस्य बन सकें।

अगर चुनाव आयोग यह नहीं करता, तो फिर मुख्यमंत्री अपने पद से इस्तीफा देकर नए सिरे से शपथ लेनी पड़ सकती है। हालांकि इस प्रक्रिया में एक बड़ा पेच यह है कि मंत्रिमंडल की समस्त शक्तियां मुख्यमंत्री में निहित हैं। अगर मुख्यमंत्री अपने पद से इस्तीफा देते हैं, तो समूचे मंत्रिमंडल को इस्तीफा देना पड़ेगा और फिर से सभी मंत्रियों को शपथ दिलानी पड़ेगी।

...तो गेंद वापस राजभवन के पाले में

दूसरा पक्ष यह है कि मुख्यमंत्री के इस्तीफा देने के बाद गेंद वापस राजभवन के पास चली जाएगी और राज्यपाल ही यह तय करेंगे कि वे कब शपथ दिलाएंगे। बहरहाल, इस स्थिति को टालने के लिए राज्य सरकार की तरफ से भी कानूनी सलाह मशविरा किया जा रहा है। हो सकता है कि यदि राज्यपाल मंत्रिमंडल की सलाह को स्वीकार नहीं करते हैं, तो सरकार की तरफ से राज्यपाल के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए।

हालांकि अभी तक सरकार के भीतर कोई इस बात की पुष्टि नहीं कर रहा, लेकिन भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि सरकार के कुछ जानकार मंत्री और बड़े नेता नेता इस विकल्प पर कानूनविदों के साथ राय मशवरा कर रहे हैं।

यह है संवैधानिक व्यवस्था

संविधान के अनुच्छेद 164 (4) के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति बिना एमएलए अथवा एएमएलसी चुने मंत्री पद या मुख्यमंत्री पद की शपथ लेता है, तो उसके लिए 6 महीने के भीतर विधिवत चुनाव जीतना अनिवार्य होता है। उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की धपथ ली थी, इसलिए 27 मई तक उनका निर्वाचित होना या मनोनीत होना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।

यहां गड़बड़ाया गणित

महाविकास अघड़ी सरकार के चुनावी खिलाड़ियों का गणित यह था कि 15 अप्रैल को खाली हो रही विधान परिषद 9 सीटों में से एक सीट पर मुख्यमंत्री को आसानी से चुनाव जीत कर विधान परिषद के सदस्य चुन लिए जाएंगे, लेकिन उससे पहले ही कोरोना संकट ने दस्तक दे दी और चुनाव आयोग ने सभी चुनाव स्थगित कर दिए। इसके साथ ही आघाडी सरकार का सारा चुनावी गणित गड़बड़ा गया।

विपक्ष में भी टेंशन

कोरोना संकट के इस भयानक मुश्किल दौर में मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे की भूमिका की पूरे राज्य में हो रही प्रशंसा से विपक्ष का टेंशन भी बढ़ने लगा है। उद्धव ठाकरे जिस तरह सोशल मीडिया के जरिए राज्य की जनता से संवाद साध रहे हैं और बिना किसी आव या ताव के राज्य की जनता को इस तरह भरोसा दिला रहे हैं जैसे उनके परिवार का कोई सदस्य उनसे बात कर रहा हो। इसे जनमानस में उनकी छवि एक धीर गंभीर और शांति से फैसला लेने वाले नेता की बनी है।

न सिर्फ राज्य की आम जनता, बल्कि प्रशासन के वरिष्ठ आला अफसरों और राज्य कर्मचारियों के बीच भी उद्धव ठाकरे की छवि एक सीधे-सच्चे, ईमानदार और कर्मठ मुख्यमंत्री के रूप में विकसित हुई है। ऐसे में विपक्ष को लग रहा है कि अगर उद्धव ठाकरे एक बार बेहतर मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हो गए, तो फिर महाविकास आघाड़ी सरकार को गिराना बीजेपी के लिए मुश्किल हो जाएगा।

गवर्नर पर पवार का कटाक्ष

दरअसल, राज्यपाल भी बीजेपी के हैं इसलिए उनकी चुप्पी को लेकर इस दृष्टिकोण से भी कई-तर्क वितर्क राजनीतिक हलके में चल रहे हैं। इन अटकलों को इसलिए भी बल मिल रहा है, क्योंकि पिछले दिनों राज्य की महाविकास आघाडी सरकार के शिल्पकार एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने राज्यपाल की समानांतर सरकार चलाने की प्रवृत्ति पर कटाक्ष किया था। वहीं, दूसरी ओर बीजेपी के नेता भी कोरोना संकट के समय सरकार के काम-काज की शिकायतों को लेकर राज्यपाल से लगातार मिल रहे हैं।

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