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महाराष्ट्र में खेतिहर मजदूर ने लगाई फांसी, बीजेपी की शर्ट पहने होने से मची सनसनी

 Special Coverage News |  14 Oct 2019 6:53 AM GMT  |  बुलढाना

महाराष्ट्र में खेतिहर मजदूर ने लगाई फांसी, बीजेपी की शर्ट पहने होने से मची सनसनी

महाराष्ट्र के बुलढाना में रविवार को एक खेतिहर मजदूर ने पेड़ से लटक कर अपनी जान दे दी। मरते वक्त जो उसने टीशर्ट पहन रखी थी उस पर लिखा हैं "पुन्हा आनुया आपले सरकार" यानी फिर से अपनी सरकार बनाएँ।

स्थानीय किसान संगठनों का कहना है कि मरने वाला किसान 38 वर्षीय राजेश तलवड़े खेती से जुड़ी परेशानियों का सामना कर रहा था कमाल की बात यह है कि महाराष्ट्र में चुनाव है और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस घटना स्थल से महज 15 किलोमीटर की दूरी पर चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे।

महाराष्ट्र में ऐसे किसानों की संख्या लगातार घट रही है जिनकी अपनी खेतीहर ज़मीन हुआ करती थी और ऐसे किसानों की संख्या बढ़ रही है जो किराये पर ज़मीन लेकर खेती कर रहे हैं. इन खेतिहर मजदूर किसानों में 80 प्रतिशत क़र्ज़ में डूबे हुए हैं.' सम्भव है कि राजेश तलवड़े भी इसी तरह के किसान हो एक मोटे अनुमान के मुताबिक पिछले दो साल में अकेले महाराष्ट्र में 8,000 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है फडणवीस सरकार में महाराष्ट्र के किसान पूरी तरह से कृषि कर्जमाफी की मांग कर रहे थे यह मुद्दा विधानसभा में बार-बार उठाया गया है।

महाराष्ट्र में 55 प्रतिशत आबादी ग्रामीण है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार पिछले बीस साल यानी 1995 से 2015 के बीच 3.10 लाख किसानों ने आत्महत्या की. पिछले दो साल से किसान आत्महत्या के आंकड़ों को जारी नहीं किया जा रहा है.वर्तमान सरकार किसान आत्महत्या से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक नहीं करना चाहती. कृषि अर्थशास्‍त्री देविंदर शर्मा के मुताबिक 80 फीसदी किसान बैंक लोन न चुका पाने की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं .सरकार किसानों की कर्ज माफी के लिए जो बजट देती है उसका ज्‍यादातर हिस्‍सा कृषि कारोबार से जुड़े व्‍यापारियों को मिलता है न कि किसानों को।

पिछले 20 सालों में हर दिन दो हज़ार किसान खेती छोड़ रहे हैं. किसानों की आय आज 'नेगेटिव ग्रोथ' की ओर है। लेकिन मोदी सरकार हर साल किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात करती ह दुर्भाग्यजनक यह है कि पैदावार बढ़ रही है, इसमें संसाधनों और 'इनपुट' का हाथ है, लेकिन किसान की कमाई नहीं बढ़ रही है पिछले 45 सालों में गेहूं का समर्थन बढ़ा, लेकिन सिर्फ 19 गुना, जबकि शासकीय कर्मचारी की आमदनी में 150 गुना का इजाफा हुआ। सरकारी आंकड़ों का कहना है कि 2016 का आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि देश के 17 राज्यों में किसानों की सालाना औसत आय 20 हजार रुपए से कम है। गेहूं और धान जैसी कुछेक फसलों को छोड़कर किसी भी फसल का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार किसानों को नहीं दिलवा पा रही है।

मोदी सरकार की किसानों के प्रति नीतियो में गजब का विरोधाभास है आप देखिए कि पिछले वित्तमंत्री अरुण जेटली बात करते थे कांट्रेक्ट फार्मिंग की ओर नयी वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण बात करती है जीरो बजट कृषि दोनों योजनाएं बिल्कुल विपरीत ध्रुवों पर खड़ी हुई है और सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों योजनाओं पर कोई ठोस काम नजर नही आता।

बड़ी बड़ी बातें की जाती है किसानों की आय को लेकर नए नए जुमले ईजाद किये जाते हैं लेकिन नीचे ग्राऊंड लेबल तक कुछ नही आता किसान बदस्तूर आत्महत्या करता जाता है।

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