Top
Home > राष्ट्रीय > सोशल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के मंसूबे पर लगाया विराम...!

सोशल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के मंसूबे पर लगाया विराम...!

 Special Coverage News |  9 Aug 2018 9:02 AM GMT  |  दिल्ली

सोशल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के मंसूबे पर लगाया विराम...!
x

कुंवर सी. पी. सिंह

पिछले कुछ सालों से सोशल नेटवर्किंग सिर्फ किशोरों के बीच ही नहीं बल्कि पुरानी पीढ़ी सहित, सभी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया है। व्यक्तिगत रूप से यह आपके मित्रों और परिवार के मध्य संपर्क स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है, जबकि व्यावसायिक रूप में सोशल नेटवर्किंग साइटें अपने पहचान के चित्र, प्रतिष्ठा, नेतृत्व पीढ़ी को स्थापित करके कारोबार को बनाए रखने और बढ़ाने में मदद करती हैं।


सोशल मीडिया कैसे है फायदेमंद...? फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साइटें आधुनिक जीवन का एक अहम हिस्सा बन गईं हैं। इसकी सहायता से आप अपने मित्रों के साथ तुरन्त और वास्तविक समय में जुड़ सकते हैं। उपयोगकर्ता एक दूसरे से बात-चीत कर सकते हैं, बार-बार जुड़ सकते हैं और सामूहीकरण कर सकते हैं। 2014 के आम चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों ने जमकर सोशल मीडिया का उपयोग कर आमजन को चुनाव के जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इस आम चुनाव में सोशल मीडिया के उपयोग से वोटिंग प्रतिशत बढ़ा, साथ ही साथ युवाओं में चुनाव के प्रति जागरूकता बढ़ी। सोशल मीडिया के माध्यम से ही 'निर्भया' को न्याय दिलाने के लिए विशाल संख्या में युवा सड़कों पर आ गए जिससे सरकार दबाव में आकर एक नया एवं ज्यादा प्रभावशाली कानून बनाने पर मजबूर हो गई। लोकप्रियता के प्रसार में सोशल मीडिया एक बेहतरीन प्लेटफॉर्म है, जहां व्यक्ति स्वयं को अथवा अपने किसी उत्पाद को ज्यादा लोकप्रिय बना सकता है। आज फिल्मों के ट्रेलर, टीवी प्रोग्राम का प्रसारण भी सोशल मीडिया के माध्यम से किया जा रहा है। वीडियो तथा ऑडियो चैट भी सोशल मीडिया के माध्यम से सुगम हो पाई है जिनमें फेसबुक, व्हॉट्सऐप, इंस्टाग्राम कुछ प्रमुख प्लेटफॉर्म हैं।


सोशल मीडिया ने पिछले एक दशक में संचार और संवाद की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया है। एक तरफ सूचनाओं का अबाध और तेजी से प्रसार बढ़ा है तो दूसरी तरफ खबरों की दुनिया ही बदल गयी है। बिना संपादक वाली इस खुली व्यवस्था के तमाम लाभों के साथ एक बड़ा घाटा यह सामने आया है कि सूचना और अफवाह तथा खबर और प्रोपगंडा के बीच का भेद मिट गया है। यही कारण है कि आजकल टीवी चैनलों समेत कुछ प्रकाशनों में वायरल सच नाम से कार्यक्रम भी शुरू हो चुका है। इन खामियों के बावजूद इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया संचार के सभी माध्यमों में सबसे तेज है और सबसे अधिक पहुंच रखता है। यही कारण है कि निजी और सरकारी संगठनों और संस्थाओं समेत विभिन्न सरकारें और उनके विभाग भी न केवल सोशल मीडिया पर हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर अपनी पहुंच और उपस्थिति बढ़ाने के लिए व्यापक रणनीति बनाते हैं।


आज हर कोई सोशल मीडिया की नि:शुल्क, अबाध और तेज गति का फायदा तो उठाना चाहता है लेकिन इसके खुद के लिए होने वाले नकारात्मक प्रभावों से बचना भी चाहता है। ऐसी मंशा को लेकर अब तक सोशल मीडिया के जरिये किए जा रहे संचार और संवाद को नियंत्रित करने के प्रयास लगातार किए जाते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पांच फरवरी 2009 को सरकार ने इंफोर्मेशन टेक्नोलॉजी अधिनियम 2000 (संशोधित 2008) की धारा 66-ए को लागू किया था, जिसके तहत अगर कोई व्यक्ति संचार माध्यमों के जरिये किसी को अपमानजनक/ घृणास्पद/ आक्रामक संदेश भेजता है तो उसे तीन वर्ष की कैद व जुर्माने की सजा दी जा सकती है, जिसे उच्चतम न्यायालय ने मार्च 2015 में असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इसके बावजूद सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के मंसूबों से सरकारें पीछे हटने का नाम नहीं ले रही हैं, वे चाहती हैं कि सोशल मीडिया पर उनका पूरा नियंत्रण हो ताकि वह जनता के विचारों को नियंत्रित कर सकें।


हाल ही में केंद्र सरकार ने देश के हर जिले में एक सोशल मीडिया हब बनाने का सर्कुलर जारी किया था। ब्रॉडकॉस्ट कंसल्टेंट इंडिया लिमिटेड के जरिये जारी टेंडर में एक सॉफ्टवेयर आपूर्ति की बात थी, जिससे तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नजर रखा जाना था। इस सर्कुलर के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस विधायक महुआ मोईत्र द्वारा दाखिल यचिका पर सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि सोशल मीडिया की निगरानी के जरिये क्या सरकार सर्विलांस स्टेट बनाना चाहती है? अपनी याचिका में महुआ मोईत्र ने न्यायालय में कहा था कि सोशल मीडिया हब बनाने से तमाम सोशल साइटों में मौजूद हर डाटा तक सरकार की पहुंच हो जाएगी, जो देश के नागरिकों के निजता के अधिकारों का उल्लंघन होगा और सरकार को लोगों की निजी जानकारी खंगालने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय की ताजा सुनवाई के दौरान सरकार ने तीन सदस्यीय पीठ के सामने कहा कि सरकार सोशल मीडिया हब बनाने की नीति की फिर से समीक्षा करेगी और इसलिए उसने संबंधित सकरुलर को वापस लेने का फैसला किया है।


सरकार के इस फैसले से सोशल मीडिया पर सरकारी नियंत्रण के मंसूबे पर फिलहाल तो विराम लग गया है, लेकिन सरकार कोई भी हो वह इस पर अधिक समय तक मौन नहीं रहने वाली क्योंकि सरकारों का चरित्र उनकी लोकप्रियता के बुनियाद पर टिका होता है, इसलिए जब सरकारें चुनावी वादों को पूरा नहीं कर पातीं, अपनी नीतिगत राजनीति में फेल होने लगती हैं और जनता का उनमें विश्वास कम होने लगता है तो वे जनता की असहमति की आवाजों को दबाने के लिए संचार माध्यमों पर ही हमला करती हैं। अगर आज सोशल मीडिया अफवाहों का अड्डा है तो मुख्यधारा की मीडिया भी अपनी विश्वसनीयता को लेकर कटघरे में खड़ा नजर आता है। इन दोनों को जिस बिंदु पर अलग किया जा सकता है, वह है सोशल मीडिया पर खबरों और सूचनाओं को किसी के दबाव में रोका नहीं जा सकता है, यही कारण है कि सरकारें और राजनीतिक दल इस माध्यम से सबसे अधिक परेशानी महसूस करने लगे हैं।


एक जमाना था जब आंकड़ों और शोधों के लिए रिपोटोर्ं पर भारी निर्भरता होती थी, जहां तक आम जनता की पहुंच नहीं के बराबर थी। मुख्यधारा की मीडिया के हाथ में था कि वह इन रिपोटोर्ं का किस तरह से और किसके पक्ष में विश्लेषण करे, लेकिन आज सबकुछ एक क्लिक की दूरी पर है और नई मीडिया के प्रबंधन या एडिटर जैसी व्यवस्था से मुक्त होने के चलते, सामूहिक संचार और संवाद का वास्तविक और लोकतांत्रिक मंच बनकर उभरा है। इसी का प्रभाव है कि किसी मुद्दे पर देशभर के लोग वैचारिक रूप से एकजुट हुए हैं और नई आवाज बनकर एक नई कहानी लिख रहे हैं। ऑनलाइन मीडिया और उसके सामाजिक प्रभाव का यह दबाव अखबारों, न्यूज चैनलों और पत्रिकाओं सभी पर देखा जा सकता है। आज शायद ही कोई ऐसा मीडिया हो, जो ऑनलाइन न हो। ये सभी माध्यम बहुत ही तेजी से नई मीडिया से जुड़े हैं। फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब और इंस्टाग्राम के गैर-विभेदकारी संचार का दबाव यह है कि मुख्यधारा की मीडिया के साथ सरकार के मंत्रलय, विभाग, अधिकारी और सार्वजनिक उपक्रम तक इससे जुड़ गए हैं।



भारत की जिस भाषाई विविधता को भारत सरकार आजादी के सात दशक तक देशव्यापी संचार में रोड़ा मानती रही, उसे नई मीडिया की क्रांति ने धता बताकर हर भाषा को अपना जरिया बना लिया और हर भाषा की आवाज बन गई। इसलिए नई मीडिया की संचार की इस ताकत पर किसी भी नियंत्रण के खिलाफ हर उस मौके पर खड़ा होना पड़ेगा और लगाए जा रहे हर अंकुश के खिलाफ लड़ाई को जीतना ही होगी, ठीक वैसे ही जैसे मोईत्र ने पूरी जनता की अभिव्यक्ति की आजादी और मौलिक अधिकारों की लड़ाई को जीता है। देश की न्यायव्यवस्था और प्रणाली पर सवाल कम नहीं हैं, लेकिन देश के नागरिकों के हकों की लड़ाई के मामले में अधिकतर मौकों पर उच्चतम न्यायालय ने न्याय की एक बड़ी लकीर खींची है। यही वजह है कि इस देश में लोकतंत्र तमाम विसंगतियों के बावजूद अपने जिंदा होने के सबूत के साथ मौजूद है। सोशल मीडिया जहां सकारात्मक भूमिका अदा करता है वहीं कुछ लोग इसका गलत उपयोग भी करते हैं। सोशल मीडिया का गलत तरीके से उपयोग कर ऐसे लोग दुर्भावनाएं फैलाकर लोगों को बांटने की कोशिश करते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रामक और नकारात्मक जानकारी साझा की जाती है जिससे कि जनमानस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।


कुंवर सी. पी. सिंह सीनियर टी. वी. पत्रकार

लेखक के अपने निजी विचार है

Tags:    
स्पेशल कवरेज न्यूज़ से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें न्यूज़ ऐप और फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर, Telegram पर फॉलो करे...
Next Story
Share it