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72 साल से एक ही सवाल हिन्दू एकजुट क्यों नहीं हैं?

72 साल से एक ही सवाल हिन्दू एकजुट क्यों नहीं हैं?
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जिन्ना की मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग को लेकर अविभाजित भारत के मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में हिन्दुओं का नरसंहार करने की शुरुआत 1946 में जिस राजनीतिक आंदोलन के बहाने से की थी , उसे जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन डे यानी सीधी कार्यवाई का दिन कहा था. कहा जाता है कि उस दिन से शुरू हुए दंगे ही पाकिस्तानी और बांग्लादेशी इलाकों में बसे हजारों - लाखों हिन्दुओं की हत्या , उनके धर्म परिवर्तन और शरणार्थी के रूप में भारत में पलायन और अंततः भारत के विभाजन का कारण बने.

मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन डे सर माथे पर लिया गया और इसी के चलते बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का नरसंहार भी मुसलमानों द्वारा इन्हीं इलाकों में किया गया ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो हालांकि उससे भी कई बरस पहले से ही मुस्लिम आक्रमकारियों के आने के बाद उपजे हिन्दुओं के इसी तरह मुसलमानों के हाथों मिट जाने के खतरे को दिखाकर हिन्दुओं को भी इस तरह से एकजुट करने की कोशिश करता रहा है , जैसी एकजुटता जिन्ना के एक इशारे पर अविभाजित भारत की मुसलमान आबादी ने अपने बाहुल्य वाले इलाकों में दिखाई थी ...

यानी कट्टर हिन्दू संगठन कहीं न कहीं यही चाहते थे कि जिस तरह जिन्ना ने एक आवाज देकर हजारों लाखों मुसलमानों को अपने अपने हाथों में चाकू और तलवार आदि हथियार लेकर हिन्दुओं का नरसंहार करने के लिए सड़कों पर उतार दिया , ठीक वैसी ही फितरत हिन्दुओं में भी आ जाए ... इसी आस में तब हिन्दू संगठनों ने न सिर्फ जवाबी दंगे भड़काए और बड़े पैमाने पर भारतीय इलाके में उस मुसलमान आबादी का कतलेआम करने के लिए हिन्दुओं को भी उकसाया, जो उन इलाकों में अल्पसंख्यक थी.

फिर भी , हिन्दुओं में मुसलमानों के कतलेआम या उनके धर्म परिवर्तन अथवा उनको भगाने को लेकर पूरे देश में वह एकजुटता और जोश खरोश नहीं था , जो तब पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों में जिन्ना की एक आवाज पर दिखाई दिया था.

हिन्दुओं की ऐसी ठंडी प्रतिक्रिया , वह भी तब , जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दू नाममात्र को ही रह गए. इससे कट्टर हिन्दू संगठन बौखला गए. इसी बौखलाहट में उन्होंने गांधी को भी मार दिया. क्योंकि उन्हें लगता था कि हिन्दुओं को मुसलमानों की तरह नरसंहार के लिए प्रेरित करने के उनके धर्म युद्ध में गांधी और उनकी अहिंसा , धर्म निरपेक्षता आदि विचार रोड़ा बन रहे हैं.

तब से लेकर आज तक 72 साल गुजर गए. गांधी और उनके विचार भी देश में खत्म हो चुके हैं.मगर कट्टर हिन्दू संगठन आज भी परेशान हैं कि आखिर जिन्ना के उस डायरेक्ट एक्शन डे का जवाब देने लायक हिन्दू कैसे तैयार करे. कभी ये संगठन हिन्दुओं को मुस्लिमों से न लड़ पाने के लिए नामर्द अथवा कायर का ताना देकर जोश दिलाते हैं ... तो कभी हिन्दुओं के अतीत में हुए प्राचीन हिन्दू योद्धाओं की गाथाएं सुना सुना कर जोश दिलाते हैं. या कभी कांग्रेस या अन्य दलों के मिल जुल कर रहने के राजनीतिक विचार को छद्म धर्मनिरपेक्षता का नाम देकर उन्हें ही हिन्दुओं की इस कायरता का जिम्मेदार ठहराते हैं. शायद उन्हें लगता होगा कि गांधी को मारने के बाद अब इन दलों को भी खत्म करके ही हिन्दुओं को भी एक आवाज पर नरसंहार करने वाली भीड़ में बदला जा सकेगा. इसी कारण कट्टर हिन्दू विचारधारा वाले राजनीतिक दल एक सुर में कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देते हैं या उससे सहमत हैं.

जाहिर है , 72 साल से हिन्दू संगठन जिस काम में नाकाम हो रहे हैं, वह है हिन्दुओं को ऐसी कट्टर व उन्मादी भीड़ में बदलना , जो अपने किसी नेता के इशारे पर निकल कर जिन्ना के डायरेक्शन एक्शन डे की याद दिला सके. लेकिन आज जब केंद्र में हिंदूवादी सरकार की पूर्ण बहुमत से वापसी हुई है. तो क्या अब यह मान लिया जाए कि हिन्दू भी वैसे ही हो गए हैं , जैसे कि कभी पाकिस्तान और बांग्लादेश में बसे मुसलमान थे? क्योंकि दो बार प्रचंड बहुमत से हिन्दुओं ने ऐसी सरकार को चुना है जो पूरी तरह से कट्टर हिंदूवादी विचारधारा की सरकार है.

अगर वाकई ऐसा चमत्कार हो चुका है और आज 72 साल बाद कट्टर हिन्दू संगठन अपने मकसद में कामयाब हो चुके हैं तो फिर अब वे लगभग खत्म हो चुकी कांग्रेस या अन्य दलों को गालियां क्यों बक रहे हैं ? क्यों नहीं हिन्दुओं को एक आवाज देकर सड़कों पर निकाल कर दंगा फसाद न सही लेकिन मुसलमानों को अपनी ताकत तो दिखा ही सकते हैं ? आपको यह जानकर हैरत होगी कि ऐसा प्रयास एक बार नहीं बल्कि कट्टर हिन्दू संगठनों ने कई कई बार किया है , जब हिन्दुओं को किसी न किसी बहाने से उद्वेलित करके सड़कों पर आकर अपनी ताकत दिखाने का आह्वान किया गया है. अयोध्या में मंदिर के बहाने या ऐसे ही अन्य राजनीतिक बहानों से जब भी हिंदुओं को बुलाया गया तो कट्टर हिन्दू संगठन निराश ही रहे. क्योंकि हिन्दू उनके लाख बुलाने पर भी उन्मादी और हिंसक भीड़ में नहीं बदला.

बार बार की अपनी इसी नाकामी से मजबूर होकर कट्टर हिन्दू संगठनों को अंततः राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाना पड़ा. ताकि चुनाव तो जीत सकें. चुनाव जीत कर अब वे फिर परेशान हैं यह जानने के लिए कि आखिर हिन्दू एकजुट क्यों नहीं हो रहा ? अब तो 'हिन्दुओं का दुश्मन' गांधी भी अहिंसा से उन्हें कायर नहीं बना रहा. धर्मनिपेक्षतावादियों के मिलजुल कर रहने के विचार को भी जनता ने खारिज करके कट्टर हिंदूवादी सरकार की वापसी कर ही दी ...फिर भी हिन्दुओं का जिन्ना कोई क्यों नहीं बन पा रहा ? हो सकता है कि 72 साल से इस सवाल का जवाब ढूंढ रहे कट्टर हिन्दू संगठन अब निराश भी हो चले हों. मगर मैं इस बात के लिए पूरी तरह आश्वस्त हूं कि अभी 100 साल तक ये कट्टर हिन्दू संगठन कितनी भी माथापच्ची और क्यों न कर लें लेकिन इस सवाल का जवाब कभी ढूंढ़ ही नहीं पाएंगे.

ग़ालिब ने भी इस मौके के लिए क्या खूब ही कहा है . " उम्र भर ग़ालिब यही भूल करता रहा, धूल चेहरे पे थी और आइना साफ करता रहा". बिल्कुल यही काम कट्टर हिन्दू संगठन भी कर रहे हैं ... जो लड़ाई धार्मिक है , उसे वह राजनीतिक हथियार से लड़ रहे हैं. जिन्ना की नकल करने में कभी मुसलमानों तो कभी खुद हिन्दुओं को. तो कभी गांधी या फिर कभी कांग्रेस जैसे धर्मनिपेक्ष दलों को दोषी ठहराने की जिद में अपने चेहरे की धूल यानी हिन्दू धर्म के एकजुट न हो पाने के मूल कारण को ही नहीं देख पा रहे हैं .

सैकड़ों जातियों में बंटे हिन्दू समाज को बराबरी वाले मुस्लिम समाज से लड़ने के लिए एकजुट करने का ख्वाब देखना ही तब तक मूर्खता है , जब तक हिन्दुओं में जातिवाद नहीं खत्म हो जाता . हालांकि कट्टर हिन्दू संगठन दोबारा प्रचंड बहुमत की सरकार बनने की वजह ही आजकल यही बता रहे हैं कि हिन्दुओं में अब जातिवाद की भावना नहीं रही. मगर यह कौन नहीं जानता कि जातिवाद की भावना कुछ वक्त के लिए कम कर लेना या उसे छिपा लेने से जातीय बंटवारा खत्म नहीं होगा. बल्कि जातियों के विनाश से ही खत्म होगा.

और यह किसे नहीं पता कि जाति का विनाश तो दूर जाति को अपना सब कुछ मानने वाले लोग ही कट्टर हिन्दू संगठनों को चलाते हैं. यानी एक तरह से देखा जाए तो जो लोग हिन्दू धर्म के बिखराव और उसके चलते उपजी ' कायरता' के लिए जिम्मेदार हैं. वही इसका कारण भी ढूंढने में 72 साल से परेशान हैं कि आखिर हिन्दू एकजुट होकर अपनी रक्षा क्यों नहीं करता. क्यों नहीं हमले का जवाब एकजुट होकर वैसे ही हमले से देता है? इसी ऊहापोह और उलटबांसी में इन हिन्दू संगठनों ने भारत को अपनी प्रयोगशाला में बदल कर सबको चिंता में और डाल रखा है ....

अश्वनी कुमार श्रीवास्त�
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