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अगर 2004 और 2019 के चुनाव की तुलना की जाए या सन् 1971 और 2019 के चुनावी समीकरण की तुलना!

सन् 1971 और 2019 के चुनावी समीकरण की तुलना यहां ज्यादा सटीक बैठती है. इसकी कई वजह हैं. पहली यह कि सन् 1971 के चुनाव की तरह ही यह चुनाव भी सिर्फ एक चेहरे पर लड़ा जा रहा है, फर्क बस इतना है की तब इंदिरा गांधी थी और अब नरेंद्र मोदी।

अगर 2004 और 2019 के चुनाव की तुलना की जाए या सन् 1971 और 2019 के चुनावी समीकरण की तुलना!
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लेखक- आशुतोष मुकुंद

लोकसभा के आम चुनाव नजदीक हैं और राजनीतिक माहौल भी देश में चरम पर है. आगामी चुनाव को लेकर भारतीय राजनीति में जो स्थिति बनी हुई है वह कोई नई नहीं है. जिस परिस्थिति कि यहां बात की जा रही है वह है महागठबंधन की राजनीति. किसी नेता के खिलाफ सभी पार्टियों का एकजुट होकर खड़ा होना भारतीय राजनीति में नया तो नहीं है. जिस प्रकार से देश की लगभग सभी बड़ी पार्टियों ने मिलकर महागठबंधन बनाया है, कमोबेश उन्हीं हालात से देश की राजनीति पहले भी निकल चुकी है. किसी शक्तिशाली नेता या लोकप्रिय सरकार के खिलाफ महागठबंधन भारतीय राजनीति में पहले भी होता रहा है. लेकिन यहां पर जिन महागठबंधनों कि बात हो रही है, वह है 1971 और 2004 का गठबंधन.

सन् 1971 में देश की कुछ बड़ी पार्टियों ने मिलकर इंदिरा गांधी के खिलाफ महागठबंधन बनाया. इस महागठबंधन में कांग्रेस के इंदिरा गांधी खेमे से निकले मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में इंडियन नेशनल कांग्रेस (ओ), संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जन संघ हिस्सा थे. हालांकि यह महागठबंधन कामयाब नहीं रहा और इंदिरा गांधी चुनाव में जीती थी. इस चुनाव में "गरीबी हटाओ" के नारे के साथ-साथ इंदिरा गांधी का लोकप्रिय चेहरा केंद्र बिंदु था.

सन् 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता आम जनता में चरम पर थी, कांग्रेस पार्टी ने चुनाव में जाने से पहले महागठबंधन की नीति अपनाई. हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर उस समय कांग्रेस के नेतृत्व में किसी प्रकार का सयुंक्त विपक्ष नहीं बन सका. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने राज्य स्तर पर कई गठबंधन किए. इस संयुक्त मोर्चें में कांग्रेस के साथ लालू प्रसाद यादव की आर.जे.डी., शरद पवार की एन.सी.पी., झारखण्ड मुक्ति मोर्चा और डी. एम्. के. शामिल थी.

हालांकि 1971 के चुनाव की तुलना में 2004 के चुनाव में महागठबंधन कामयाब रहा. इसके आंकलन में एक वजह जो मुख्य रूप से निकल कर आती है, वह है इस समय क्षेत्रीय पार्टियों के जनप्रिय नेताओं का साथ होना. सन् 1971 के महागठबंधन में इंदिरा गाँधी के सामने किसी बड़े चेहरे या कहें तो लोकप्रिय नेता का ना होना गठबंधन के असफल होने की वजह बनी. कांग्रेस के इंदिरा गाँधी खेमे से निकले मोरारजी देसाई के अलावा कोई बड़ा लोकप्रिय चेहरा इस गठबंधन में नही था. और दूसरी वजह यह बनी कि इस गठबंधन को असफल करने के लिए इंदिरा गाँधी ने क्षेत्रीय पार्टियों को अपने पाले में लिया, जो की अंत में उनकी सरकार बनाने में मददगार रहा.इंदिरा के इस क्षेत्रीय पार्टियों के समीकरण में तमिलनाडु की डी.एम्.के. और केरल की सी.पी.आई. जैसी पार्टियाँ तक शामिल थी.

अब बात आती है 2019 के महागठबंधन की. सन् 1971 और 2004 के चुनाव की तरह ही किसी जनप्रिय नेता के खिलाफ पूरा विपक्ष एक महागठबंधन बना रहा है. लगभग दर्जन भर से भी ज्यादा पार्टियों ने मिलकर इस गठबंधन को बनाया है. देखने में यह ऐसा ही लग रहा है कि सभी विपक्षी पार्टियों ने मिलकर एक गठबंधन बना लिया है. यह गठबंधन भी बड़ा ही अजीब किस्म का है क्योंकी इसका कोई नेता तो दूर, संयोजक तक नहीं है. सपा, बसपा, आरएलडी, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, तेलगु देसम, टीआरएस, और आम आदमी पार्टी जैसी दर्जनों भर क्षेत्रीय पार्टियों से मिलकर बना यह महागठबंधन देखा जाए तो गठबंधन है ही नही. यह एक "हाइब्रिड गठबंधन" है जो कि चुनाव के बाद ही अपना असर दिखा पाएगा. यह गठबंधन वैसे भी कई प्रदेशों में काम नहीं करेगा. दिल्ली का उदाहरण लें तो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस मिलकर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. एक और उदाहरण अगर उड़ीसा का ही लें तो वहां भी 20 संसदीय सीटें होने के बावजूद कांग्रेस और बिजू जनता दल अलग अलग चुनाव लड़ेंगे. साफ़ तौर पर यह महागठबंधन पिछले गठबधनों की तरह तो नहीं ही है. यहां इस उम्मीद में कुछ पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं की वो "किंगमेकर" बनेंगी और कुछ इस उम्मीद में की वो खुद "किंग" बनेंगे. जिसमे अंत में उठापोह और हंगामा तो निश्चित ही है.

लेकिन अगर मान भी लें की यह एक गठबंधन है और यह साथ में समझौतों के साथ चुनाव लड़ने में सफल भी हो जाता है तो आगे क्या? एक बड़ा सवाल, क्या यह गठबंधन बीजेपी सरकार या कहें तो एनडीए को हरा पाएगा?

अगर 2004 और 2019 के चुनाव की तुलना की जाए तो सबसे पहला बिंदु निकल कर आता है अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी का जनता के बीच में लोकप्रिय होना और पार्टी की तुलना में इन नेताओं का लगातार अधिक लोकप्रिय रहना. सन् 2004 के ओपिनियन पोल लगातार वाजपेयी को अजेय और सबसे लोकप्रिय चेहरा बताते रहें और यही स्थिति अभी के ओपिनियन पोल नरेंद्र मोदी की भी दिखा रहे हैं. सन् 2003 में चुनाव से पहले वाजपेयी ने"इंडिया शाइनिंग" के जिस नारे को अपनी सरकार के प्रचार का हिस्सा बनाया था, 2004 आते-आते यह नारा गायब हो चुका था. वाजपेयी खुद 2004 का चुनाव "स्थिर और स्थायी" सरकार के कार्ड पर लड़ रहे थे. लगभग यही स्थिति इस वक़्त नरेंद्र मोदी के साथ है. "अच्छे दिन" के नारे से शुरू हुई नरेंद्र मोदी की सरकार इस वक़्त, वाजपेयी सरकार की तरह ही "स्थायी और मजबूत" सरकार का नारा दे रही है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या 2004 के चुनाव का परिणाम कांग्रेस फिर से दोहरा पाएगी? संभवतः नहीं. सन् 2004 की तुलना में एक तो इस वक़्त कोई पूर्ण रूप से गठबंधन नहीं है और दूसरा यह कि 2004 में कांग्रेस ने जिन पार्टियों के साथ गठबंधन किया था उसमे कुछ पार्टियों के पास बड़े चेहरे थे, जो की अपने क्षेत्र में जनप्रिय थे और लोकसभा चुनाव को राष्ट्रीय तौर पर नहीं तो क्षेत्रीय तौर पर प्रभावित कर सकते थे. लेकिन इस वक़्त पूरे विपक्ष में छोड़िये खुद कांग्रेस में कोई बड़ा और लोकप्रिय चेहरा नही है. प्रियंका गाँधी के चेहरे पर कितना चुनाव लड़ा जा सकता है और यह कितना असर दिखायेगा, इसका जवाब आने में अभी समय लगेगा.

सन् 1971 और 2019 के चुनावी समीकरण की तुलना यहां ज्यादा सटीक बैठती है. इसकी कई वजह हैं. पहली यह कि सन् 1971 के चुनाव की तरह ही यह चुनाव भी सिर्फ एक चेहरे पर लड़ा जा रहा है, फर्क बस इतना है की तब इंदिरा गांधी थी और अब नरेंद्र मोदी। यह दोनों ही चेहरे काफी जनप्रिय रहे हैं. दूसरी वजह है कि आने वाले चुनावों में 1971 के चुनाव की तरह ही गठबंधन तो है लेकिन कोई बड़ा और जनप्रिय चेहरा अभी भी नही है जो की साफ़ दिखता है कि क्यों यह 'गठबंधन'एक बड़े चेहरे के ना होने की वजह से हार का सामना कर सकता है. तीसरी और अंतिम वजह यह है कि इंदिरा गांधी की तरह ही मोदी क्षेत्रीय राजनितिक पार्टियों से गठजोड़ कर रहे है. आगामी चुनाव के लिए भाजपा ने महाराष्ट्र में शिवसेना और तमिलनाडु में एआईएडीएमके के साथ देशभर के अन्य छोटे-छोटे दलों से गठजोड़ किया है. अगर देखा जाए तो 2014 में मोदी लहर होने के बावजूद भाजपा ने 2009 के मुकाबले कम सीटों पर चुनाव लड़ा था. अगर भाजपा यहां भी अपने साथी पार्टियों को ज्यादा सीटें देकर चुनाव से पहले एक मजबूत गठबंधन की तरफ बढती है तो भाजपा को इसका फायदा मिलना लाज़मी है.

यह कुछ समानताएं थी 1971, 2004, और आने वाले 2019 के चुनावों के बीच. देखना यह है की मोदी कौन से चुनाव की याद दिलवाएंगे. वाजपेयी वाली हार की या इंदिरा वाली जीत की.

(लेखक गुजरात केंदीय विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के शोध छात्र हैं।)

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