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दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनावों (DUSU) में ABVP की जीत मोदी का पलटवार है: भावी रणनीति क्या होगी?

 Special Coverage News |  16 Sep 2018 5:01 AM GMT  |  दिल्ली

दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनावों (DUSU) में ABVP की जीत मोदी का पलटवार है: भावी रणनीति क्या होगी?
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दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव ABVP ने धांधली से जीता। सच्ची तस्वीर सामने आई मतगणना के छठे राउंड में। ABVP के उम्मीदवार NSUI से पीछे चल रहे थे। अचानक ईवीएम ने काम करना बंद कर दिया। कौटिंग रोक दी गयी। कुछ घंटो बाद जब कौटिंग शुरू हुई तो ABVP ने 4 में से 3 सीटें जीत ली!

2017 और 2018 में लगभग सभी छात्रसंघ चुनावों ABVP की करारी हार और देशभर में भाजपा की नीतियों के खिलाफ नाराजगी के माहौल को देखते हुए यह एक अप्रत्याशित झटका है।

अपनी लोकप्रियता के गिरते ग्राफ को थामने के लिए मोदी ने यह शुरूआती पलटवार किया है। साथ ही यह 2019 में होने वाले संभावित घटनाक्रम की एक झांकी भी है।

मोदी ने पहले देश के कुछ बुद्धिजीवियों पर 'शहरी नक्सल' का ठप्पा लगाकर उन्हें गिरफ्तार करके अपना पैंतरा दिखाया। उसके बाद अचानक पूर्व आईपीएस अफसर संजीव भट्ट को 1996 के एक पुराने अजीबोगरीब केस फंसाकर गिरफ़्तार कर लिया गया।

निचली अदालत ने गुजरात पुलिस को संजीव भट्ट की पुलिस हिरासत देने से मना कर दिया। इसके बावजूद गुजरात हाई कोर्ट ने डिफेन्स का मौक़ा दिए बिना भट्ट को पुलिस हिरासत में भेज दिया।

नरेंद्र मोदी की दुरंगी चालें

समाज के असली मुद्दों और अंतरविरोधों को छिपाने के लिये मोदी छद्म अंतरविरोध गढ़ रहा है। मोदी चाहता है कि उसकी कोरपरेट-यारा (crony) पूंजीवाद (capitalist) परस्त नीतियों और झूठे राष्ट्रवाद के खिलाफ किसान-मज़दूर-मध्य वर्ग न खड़ा हो। इसिलिए वो एक फेक दुश्मन, नकली विलेन, जनता के सामने खड़ा करना चाहता है। अर्बन नक्सल/भीमा कोरेगाओं/अरुणधती राय या JNU सरीखे पश्चिम से प्रभावित उदारवादी या वाम्पन्थी संख्या मे बहुत कम हैं। संजीव भट्ट भी एक आलोचना की आवाज़ हैं बस। फिर भी मोदी इनको गिरफ्तार कर--इन ताक़्तों को एक बड़े हौव्वे के रूप मे पेश कर रहा है।

मोदी चाहते हैं कि एक तरफ उनका कोर्पोरेट और साम्राज्यवादी परस्त फासीवाद... और दूसरी तरफ पश्चिम से आयातित उदारवाद आपस में भिड़े रहें।

सनातनी प्रतिरोध

जो राजनीति सनातन धर्म से प्रेरणा लेकर चलती है, आरएसएस-विरोधी है या भाजपा का विरोध करती है, वह राजनीति मोदी को फूटी आंख नहीं सुहाती। आज की परिस्थिती मे, वही उसको परास्त कर सकती है।

यही वह रास्ता है जिस पर अब राहुल गांधी और कांग्रेस चलने की कोशिश कर रहे हैं।

सच्चाई तो यह है कि राहुल के मंदिर – दर्शन, मानसरोवर यात्रा, एससी/एसटी एक्ट में संशोधन पर सवर्ण-ओबीसी- सनातनधर्मियों की खिलाफत, मंगल पांडे की मूर्ति स्थापना के आन्दोलन ने मोदी ब्रांड पोलिटिक्स (इसमे योगी भी शामिल है) को जितना भारी नुकसान पहुंचाया है उतना महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी नहीं पहुंचाया।

मोदी की राजनीति के खिलाफ लगातार बढ़ते हुए सनातनी प्रतिरोध का ही नतीजा है जो मोदी ने अरुंधती रॉय, छद्म उदारवादी, झोलाछाप जेएनयू जैसे मरी पड़ी व्यंग्योक्तियों को फिर से ज़िंदा करना शुरू कर दिया है।

मोदी का बिछाया हुआ जाल

सभी धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक ताकतों के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि वे मोदी के बिछाए जाल में न फंसे। इसके लिए जरूरी है कि हम ऐसे किसी भी राजनीतिक वाद-संवाद से बचें जिसमें 'पाश्चात्यता', 'शहरी नक्सल' या व्यंग्यात्मक जेएनयूवाद की गंध आती हो।

भारत के पास सनातनी प्रतिरोध , सनातनी मध्यवाद और 1857 की क्रान्ति की एक स्वस्थ परम्परा मौजूद है।

विचारों की लड़ाई/संघर्ष

भारत में आज भी राजनीतिक विचारधाराओं के मध्य संघर्ष हो रहा है। मगर किसी भी प्रकार का घोषित-अघोषित, गैर-सनातनी--प्रशांत भूषण, गौतम नवलखा, शशि थरूर, अरविन्द केजरीवाल मार्का--'इंग्लिश मीडियम', 'हार्वर्ड', छद्म उदारवादी, अराजकतावादी रुझान, 'भारत की संकल्पना' के असली विचार को भारी क्षति पहुंचाता है।

विचारधारा की इस लड़ाई में उदारपंथियों को शामिल किया जा सकता है मगर वे उस लड़ाई का नेतृत्व कर पाने में अक्षम हैं।

क्षेत्रीय ताक़तें

क्षेत्रीय ताक़तें जड़ों से जुड़ी हुई हैं मगर उनका इतिहास निष्कलंक नहीं है। मोदी उनकी नस-नस से वाकिफ है। इसके अलावा क्षेत्रीय दलों की विचारधारा भी कहीं न कहीं सनातन-विरोधी स्रोतों से प्रेरित है।

लोहियावाद, अम्बेडकरवाद, नेहरूवाद, गांधीवाद, पेरीयारवाद आदि सभी जमीनी बुद्धिजीवियों (organic intellectuals) की देन हैं। इसी वजह से इन्होने किसानों, मेहनतकशों और आमजन के बीच अपनी जड़ें जमाई। परन्तु आज लगभग सभी 'वाद' अभिजात्य वर्ग की बपौती बने हुए हैं।

आगे का रास्ता

सनातन समाज की पुन: अगुवाई करने के लिए कांग्रेस को अभी बहुत मेहनत करनी होगी। गांधी, नेहरू और पटेल आज प्रसांगिक हैं मगर समय की आवश्यकता के अनुरूप उनका नवीनीकरण करना होगा। मुसलमानों को भी 'लीग' और 'मजलिस' की राजनीति से तौबा करनी होगी। मुसलमानों को जमायत-उलेमा- हिन्द जैसी आजादी से पहले की सोच को फिर से अंगीकार करना होगा जिसमें उन्होंने देश-विभाजन का विरोध किया था।

फासीवाद का विरोध

किसी क्रांतिकारी विचार के अभाव मे, जमीनी मगर सुप्त पड़ी विचारधाराओं को नेस्तनाबूद करने के लिए, फासीवाद जन्म लेता है। नेहरू, लोहिया, आंबेडकर, पेरियार और यहाँ तक कि ईएमएस नम्बूदरीपाद के उत्तराधिकारी स्वयं को विशिष्ट समझने लगे हैं। अब उनके तार किसानों से जुड़े हुए नहीं हैं।

विचारधारा के इसी संकट का फ़ायदा उठाकर फासीवाद ने अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दी हैं।

एक कृषक-हितैषी और 'सबके लिए न्याय' की अवधारणा पर आधारित सनातनी विचारधारा भी फासीवाद से लड़ने के लिए जन्म ले चुकी है। देश का कृषक वर्ग तेजी से इस सनातनी विचारधारा की ओर आकर्षित हो रहा है।

यदि कांग्रेस नाकाम रहती है या सुस्त पड़ जाती है तो ऐसे में मोदी का विरोध करने के लिए सनातन प्रेरित शक्तियाँ आगे आएंगी। भारत की राजनीति शून्यता को ज्यादा देर बर्दाश्त नहीं करती है।

यदि मोदी लोकतंत्र को दफन करने की सोचते हैं तो याद रखिए हमारे पास '1857' हमेशा एक विकल्प के रूप में मौजूद है।

(जारी है)

अमरेश मिश्र

संयोजक, 1857 राष्ट्रवादी मंच

अध्यक्ष, मंगल पांडे सेना/किसान क्रांती दल

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