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रंग बदलती संघ की राजनीति

 Majid Ali Khan |  12 Oct 2018 12:30 PM GMT  |  नई दिल्ली

रंग बदलती संघ की राजनीति
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए असमंजस की स्तिथि में है. इसका इशारा मिलता है विज्ञानं भवन में हुए संघ के एक कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहना भागवत के भाषणों से. मोहन भागवत ने उस कार्यक्रम में जिस प्रकार कांग्रेस की तारीफ की थी उससे साफ़ ज़ाहिर था की संघ के अंदर कुछ खिचड़ी पकनी शुरू हो गयी है. इसके बाद केंद्रीय मंत्री और नागपुर के सबसे प्रिय नितिन गडकरी ने एक चैनल की दिए इंटरव्यू में जिस प्रकार मोदी सरकार यानि अपनी सरकार की मज़ाक बनायीं है उससे भी ये साफ़ पता चलता है की मोदी सरकार संघ के पसंदीदा अब नहीं रही है.

इसकी वजह भी कई हैं जिससे संघ को इस सरकार से मायूसी हुई है. दरअसल जिस उम्मीद के साथ देश में हिंदूवादी सरकार को लाया गया था उस समय संघ के सामने बहुत से लक्ष्य थे जिन्हे पूरा करना था लेकिन मोदी सरकार ने बारी बारी जैसे जैसे इन लक्ष्यों की हवा निकाली उससे संघ की हवा ही निकल गयी. नोटबंदी जैसे फैसले पर संघ ने जैसे कुतर्क दिए थे और जनता के सामने सरकार की ढाल बना था लेकिन वक़्त गुजरने के साथ नोटबंदी और जीएसटी के बुरे असर पड़ने शुरू हुए वैसे वैसे संघ भी लोगो की आलोचना का शिकार होने लगा. इसके अलावा हिंदुत्व के मुद्दे पर भी लोगो को संघ से मायूसी हाथ लगी. सरकार बनने से पहले जिस प्रकार सघ और भाजपा ने पाकिस्तान को सबक़ सीखने की बात की थी और लोगो में एक जोश भरा था लेकिन सरकार बनने के बाद स्थिति और ख़राब हो गयी. ऐसे ही राम मंदिर निर्माण का मुद्दा भी लोगो के लिए मायूसी का सबब बना. सबसे अधिक आलोचना इस बात से हुई की जिस प्रकार दलित एक्ट के मामले में संसद में विधेयक लाया गया लेकिन राम मंदिर मामले को कोर्ट के भरोसे छोड़ दिया गया. ये सब ऐसे मुद्दे थे जो हिंदुत्व का आधार थे लेकिन एक एक करके मोदी सरकार सब मामलों में पीछे हटती नज़र आयी. विज्ञान भवन में मफान भागवत ने हिंदुत्व पर बोलते हुए कह दिया की बिना मुसलमानो के हिंदुत्व की कल्पना नहीं की जा सकती. इस बयान पर भी माहिरीन का कहना था की संघ गरम हिंदुत्व को छोड़ना चाहता है और फिर कांग्रेस के नरम हिंदुत्व के साथ चला चाहता है. संघ के क़रीबी सूत्रों के अनुसार संघ में मोदी सरकार के साथ चलने को लेकर गहरे मतभेद हैं. सियासी माहिरीन का कहना है की संघ अब अपनी चाल और राजनीती बदलने पर मजबूर है. अब देखना है की संघ आने वाले वक़्त में क्या फैसला करता है.

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