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सुप्रीम कोर्ट ने फ़तवे पर रोक से संबंधित उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थगन आदेश (स्टे) दिया

जमीयत उलमा-ए-हिंद महमूद गुट के महासचिव मौलाना महमूद मदनी की याचिका पर फैसला, अदालत में वरिष्ट अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने कहा कि कोई भी अदालत भारतीय संविधान के मूल से हटकर फैसला नहीं सुना सकती।

 Special Coverage News |  12 Oct 2018 11:47 AM GMT  |  दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने फ़तवे पर रोक से संबंधित उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थगन आदेश (स्टे) दिया
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तौसीफ कुरैशी

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने फतवा पर प्रतिबंध से संबंधित उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले पर स्थगन (स्टे) का आदेश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति मदान बी लोकुर तथा न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की दो सदस्यीय बेंच ने यह फैसला जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।


उल्लेखनीय है इस साल 30 अगस्त को उत्तराखंड हाईकोर्ट के इस आदेश जिसमें धर्मिक संस्थाओं को फतवा जारी करने पर रोक लगा दी थी, के बाद पूरे देश में बैचेनी महसूस की जा रही थी। इस आदेश से देश में मौजूद हजारों दारुल इफ्ता और धार्मिक संस्थाएं प्रभावित हो रहीं थीं।मामले की गंभीरता को देखते हुए 4 सितम्बर को जमीयज उलमा-ए-हिंद ने उक्त फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसकी सुनवाई आज हुई।



जमीयत उलमा -ए- हिंद की ओर से मामले की पैरवी करने के लिए वरिष्ट अधिवक्ता राजू रामचंद्रन, एडवोकेट शकील अहमद सैयद, एडवोकेट नियाज अहमद फारूकी, एडवोकेट तैयब खां, एडवोकेट मुजीबुद्दीन खान, एडवोकेट उजमी जीमल हुसैन, एडवोकेट मौ परवेज डबास पेश हुए।वरिष्ट अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि हाईकोर्ट का यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 और विश्वालोचन मदान केस बनाम भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विपरीत है याचिका में कहा गया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 बी, में सभी को अपनी धार्मिक समस्याओं में स्वयं के प्रबंध का अधिकार दिया गया है इसलिए इसे कोई भी अदालत खत्म नहीं कर सकती है। इसके अलावा हाई कोर्ट का उपरोक्त निर्णय संविधान की धारा 141 के भी विपरीत है जिसके तहत किसी भी अदालत को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ फैसले का हक नहीं दिया गया है।


इस बात की भी शिकायत की कि हाईकोर्ट ने लक्सर पंचायत के फरमान को फतवा समझने की गलती की है और इस सिलसिले में सिर्फ हिंदी के एक अखबार को आधार बनाकर फैसला दे दिया हालांकि अखबार के अध्ययन से यह प्रकट होता है कि वह सिर्फ पंचायती फरमान है और इसका फतवे से दूर-दूर तक संबंध नहीं है फतवा किसी पंचायत से नहीं बल्कि दारुल इफ़्ता (फ़तवा विभाग), या किसी विद्वान मुफ्ती के माध्यम से ही दिया जाता है और इसकी हैसियत सिर्फ पूछने वाले की शरई मसले पर मशवरा और मार्गदर्शन है।


याचिकाकर्ता एवं जमीयत उलमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने स्थगन आदेश (स्टे) मिलने पर संतुष्टि का इजहार करते हुए कहा कि देश के कोने-कोने में दारुल इफ़्ता, धार्मिक मार्गदर्शन का कर्तव्य अंजाम दे रहा है। यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि फ़तवा कोई फरमान नहीं है। उन्होंने अदालत का आभार व्यक्त किया। उन्होंने मौके की नजाकत को समझते हुए तुरंत स्थगन आदेश (स्टे) जारी किया है। उन्होंने आशा व्यक्त करते हुए कहा कि अदालत सकारात्मक एवं रचनात्मक फैसला सुनायेगी।

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