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भगवा योद्धा को सैल्यूट! लोकतांत्रिक मूल्यों के बेमिसाल योद्धा स्वामी अग्निवेश आज नहीं रहे

जाने-माने समाज सुधारक स्वामी अग्निवेश का आज हृदयाघात के बाद निधन हो गया उनके निधन से उनके समर्थकों में शोक की लहर दौड़ गई

 Shiv Kumar Mishra |  11 Sep 2020 6:48 PM GMT  |  दिल्ली

भगवा योद्धा को सैल्यूट! लोकतांत्रिक मूल्यों के बेमिसाल योद्धा स्वामी अग्निवेश आज नहीं रहे
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वीरेंद्र सिंह सेगर

भगवा योद्धा को सैल्यूट! लोकतांत्रिक मूल्यों के बेमिसाल योद्धा स्वामी अग्निवेश आज नहीं रहे।वेअनंतयात्रा के लिए रवाना हो गये।लंबे समय से वे लीवर की बीमारी से जूझ रहे थे।81वर्षीय अग्नि वेश जी ने सही मायने अंतिम समय तक जन सेवा की।यूं तो चालू अर्थों में आजकल भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे नेता भी अपने को जनसेवक या महासेवक कहलाते हैं।लेकिन इन जन सेवकों ने किस कदर देश सेवा की है?इसे बच्चा बच्चा जान गया है।स्वामी जी इस कोटि के जन सेवक नहीं थे।वे पूरी जिंदगी हर तरह के पाखंड से जूझते रहे।उनकी छवि आधुनिक विवेकानंद की मानी जाती है।उच्च शिक्षा प्राप्त स्वामी जी तेलुगु, बांग्ला, उड़िया,हिंदी, अंग्रेजी व संस्कृत धाराप्रवाह बोल और लिख लेते थे।कोलकाता में उनकी उच्च शिक्षा हुई।उन्होंने एम बीए और कानून की डिग्री ली थी।बाद में कोलकाता के सबसे प्रतिष्ठित कालेज में ला के प्राध्यापक रहे।दक्षिण भारतीय परिवार में जन्मे स्वामी के पिता छत्तीसगढ़ के एक बड़े रजवाड़े के दीवान थे।वे छत्तीसगढ़ में ही पैदा हुए थे।

1970उन्होंने आर्यसमाज के आंदोलन से जुड़कर संयास ले लिया था।इस तरह वे भगवाधारी हो गये।आमतौर पर भगवाधारी संत ,धार्मिक कर्मकांडों में फंसकर लोगों को भाग्यवादी बनाने के काम में जुट जाते है।लेकिन स्वामी जी ने स्वामी विवेकानंद का माडल अपनाया।सुंदर व्यक्तित्व के धनी अग्नि वेश जी दशकों से मानवाधिकारों के योद्धा बने रहे।बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाकर स्वामी जी ने बंधुआ मुक्ति को देश व्यापी आंदोलन बना दिया। इस आंदोलन के दबाव में ही सरकार को अस्सी के दशक में बंधुआ उन्मूलन का कारगर कानून बनाना पड़ा था।इस आंदोलन के दौर में स्वामी जी पर क ई बार जानलेवा हमले हुए।लेकिन वे कभी डरे नहीं।इसी के साथ बाल मजदूरी के खिलाफ स्वामी जी ने जुझारू अभियान शुरू किया।इस आंदोलन में स्वामी जी ने एक नव जवान कैलाश सत्यार्थी को भी जोड़ा था।स्वामी की शागिर्दी में ही कैलाश बचपन बचाओ आंदोलन के बड़े स्टार बने। यह अलग बात है की अति महत्वाकांक्षी कैलाश कुछ साल पहले स्वामी जी के अभियान से अलग हो गये थे।उन्होंने अपनी अलग पहचान बनायी।बाद में नोबेल शांति पुरस्कार तक मिला।लेकिन दोनों के करीबी अच्छी तरह जानते हैं कि कैलाश सत्यार्थी को नायक बनाने वाले अग्नि वेश जी ही थे।मेरे रिश्ते कैलाश जी से भी हैं।पिछले 35सालों से स्वामी जी से भी करीबी रही। . ... स्वामी जी निष्ठावान आर्य समाजी रहे।ऐसे में वे मूर्ति पूजा और धार्मिक कर्मकांडों के धुर खिलाफ रहे।कुछ मौकों पर उन्होंने शंकराचार्यों को चुनौती दी।शास्त्रार्थ किया।एक ऐसे मुकाबले के शास्त्रार्थ की मैंनें दो दिन रुककर कवरेज भी की थी ।ये आयोजन मेरठ के पुरादेवा मंदिर प्रांगण में हुआ था।धाराप्रवाह संस्कृत में स्वामी जी ने वेद वाणी की व्याख्या शुरु की ,तो स्वनामधन्य शंकराचार्य जी के चेलों ने भद्द पिटने की आशंका में वहां हंगामा करा दिया था। जातिवाद, सांप्रदायिकता व रूढ़वादिता के खिलाफ स्वामी जी पूरे देश में डंका बजाते रहे।दलितों को क ई प्रसिद्ध मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।80 के दशक मे स्वामी ने इस मुद्दे पर व्यापक आंदोलन चलाया।पद यात्राएं की।सैकड़ों दलितों को मंदिरों में ले गये।इससे पोंगापंथी संत समाज उनसे नाराज रहा। स्वामी जी को नोबल जैसा प्रतिष्ठित राइट लाइवीहुड अवार्ड बहुत पहले मिल गया था।उनकी अंतरराष्ट्रीय जबरदस्त पहचाना रही है।यह जरूर रहा कि नोबेल पुरस्कार उनके सुयोग्य चेले कैलाश सत्यार्थी के हिस्से हीआया। स्वामी जी का खाना पीना एक संत वाला ही रहा।जीवनचर्या बहुत नियमित रही।75की उम्र में मैंनें उन्हें 500दण्ड बैठक लगाते देखा।वे कभी बीमार नहीं पड़े।शारीरक रूप से वे पहलवान ही रहे। लेकिन बिडंबना देखिये! उनकी मौत का कारण बनी लीवर सिरोसिस की बीमारी।यह आमतौर पर शराबियों को ज्यादा होती है।लेकिन स्वामी ने तो कभी दारू छूई भी नहीं। दरअसल, स्वामी जी की एक तरह से हत्या हुई है।यह आरोप मैं पूरी जिम्मेदारी से लगा रहा हूं। इस प्रकरण के पहले यह जान लीजिए की स्वामी जी समाज सुधारक के साथ लोकतंत्र के भी मजबूत प्रहरी थे।उनका मानना रहा है कि राजनीति में गंदे लोग ज्यादा हैं।भले लोग इसमें पड़ना नहीं चाहते।ये पृवत्ति खतरनाक है।इससे देश का लोकतंत्र भी खतरे में पड़ सकता है। स्वामी जी सियासत में भी उतरे थे।इमरजेंसी में दस महीने जेल में भी रहे।जेपी आंदोलन के दौर में फायर ब्रांड भगवाधारी होते थे। इमरजेंसी के बाद हरियाणा सरकार में वे मंत्री भी बने थे।जनता पार्टी में रहे।भोपाल से संसदीय चुनाव लड़ा था।तरीका धुर आदर्शवाद का था ।ऐसे में हार तय ही थी।पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के सवाल पर वे तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष चंद्रशेखर से भी भिड़ गये थे।अन्ना आंदोलन में भी स्वामी जी अगुवा भूमिका में थे।लेकिन केजरीवाल जैसे महत्वाकांक्षी नेताओं की वजह से उन्हें अलग होना पड़ा था। मोदी सरकार की अलोकतांत्रिक शैली को लेकर वे बहुत आक्रोशित रहे।इस बीच हर मुलाकात में वे यही कहते थे ,वीरेंद्र जी !आप जैसे जागरुक लोग भी इस दौर मे ं शिथिल रहे या डर गये तो इतिहास आप जैसों को भी माफ नहीं करेगा। यह बात पिछले दिनों की है।उन्हें अहसास हो गया था कि अब उनके पास ज्यादा समय नहीं है। आइये!अब बात करते हैं उनके लीवर की।करीब तीन चार साल पहले झारखंड में उनपर जानलेवा हमला हुआ था।स्वामी जी वहां आदिवासी समाज की बड़ी रैली में हिस्सा लेने गये थे।वे हर जगह क्रांतिकारी भाषण ही देते थे।संघ परिवार की पाखंडी राजनीति पर तीखा हमला करते थे।रांची में संघ परिवार से जुड़े लंपटों ने उन्हें घेरकर पीटा था।वे माबलिंच करने की योजना से जुटे थे।इस हमले से किसी तरह बचे थे।इसी हमले में उनका लीवर फट गया था।इलाज चलता रहा।इस हमले के कुछ महीने बाद ही संघ परिवारी मुसटंड़ों ने दिल्ली में फिर हमला बोला था।वे अटलजी के निधन के बाद अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे थे।वैचारिक मतभेदों के बाद भी स्वामी जी के अच्छे रिश्ते अटल जी से थे।लेकिन यह भाजपा गिरोहियों का अच्छा नहीं लगा।इस हमले में उनका घायल लीवर और जख्मी हो गया। यही लीवर सिरोसिस में बदला।अंततः सांप्रदायिक हिंसक राजनीति का ही ये योद्धा शिकार हो गया।स्वामी जी !आप लंबे समय तक बहुत याद आंएगे।सादर नमन!

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