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न्यायपालिका में इस रात की सुबह कब होगी?

 Special Coverage News |  6 Oct 2018 7:58 AM GMT  |  दिल्ली

न्यायपालिका में इस रात की सुबह कब होगी?
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अनिल जैन

न्यायपालिका में उच्च और सर्वोच्च स्तर पर न तो भ्रष्टाचार कोई नई बात है और न ही यह कोई दो-चार हाई कोर्टों या कुछ जजों तक सीमित है। लगभग सभी हाई कोर्टों की अपनी-अपनी कलंक कथाएं-उपकथाएं हैं। बीती शताब्दी के आखिरी दशक में न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी से लेकर कुछ समय पहले कर्नाटक और सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरण और कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सौमित्र सेन तक कई उदाहरण हैं, जिनमें निचली अदालतों से लेकर उच्च अदालतों तक के जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। इस सिलसिले में नवंबर 2010 में गुजरात हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसजे मुखोपाध्याय ने तो अपने ही मातहत कुछ जजों के भ्रष्टाचरण पर बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा था- 'गुजरात में न्यायपालिका का भविष्य संकट में है, जहां पैसे के बल पर कोई भी फैसला खरीदा जा सकता है।' इसी दौरान मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ के कुछ जजों के बारे में भी कुछ ऐसी ही शिकायतें ग्वालियर अभिभाषक संघ के अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट को भेजी थी। इससे पहले देश के पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण ने तो सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर देश के आठ पूर्व प्रधान न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे, लेकिन उस विचार करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट ने उलटे शांति भूषण पर दबाव डाला था कि वे अपने इस हलफनामे को वापस ले लें।

न्यायपालिका में लगी भ्रष्टाचार की दीमक और न्यायतंत्र पर मंडरा रहे विश्वसनीयता के संकट ने ही कुछ साल पहले देश के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिया को यह कहने के लिए मजबूर कर दिया था कि जजों को आत्म-संयम बरतते हुए राजनेताओं, मंत्रियों और वकीलों के संपर्क में रहने और निचली अदालतों के प्रशासनिक कामकाज में दखलंदाजी से बचना चाहिए। 16 अप्रैल 2011 को एमसी सीतलवाड स्मृति व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति कपाडिया ने कहा था कि जजों को सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति के लोभ से भी बचना चाहिए, क्योंकि नियुक्ति देने वाला बदले में उनसे अपने फायदे के लिए निश्चित ही कोई काम करवाना चाहेगा। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने जजों के समक्ष उनके रिश्तेदार वकीलों के पेश होने की प्रवृत्ति पर भी प्रहार किया और कहा कि इससे जनता में गलत संदेश जाता है और न्यायपालिका जैसे सत्यनिष्ठ संस्थान की छवि मलिन होती है। न्यायमूर्ति कपाडिया ने राजनेताओं की बिरादरी से भी कहा था कि वे भ्रष्ट और बेईमान जजों को संरक्षण न दे।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की चर्चा के इस सिलसिले में मद्रास और कलकत्ता हाई कोर्ट के जज रहे सीएस कर्णन को भी नहीं भूला जा सकता। जस्टिस सीएस कर्णन ने 23 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री को लिखे एक पत्र में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्टों के 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए जांच कराने का अनुरोध किया था। उनके इस पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की अवमानना करार देते हुए जस्टिस कर्णन की न्यायिक शक्तियां छीन कर उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी। जब कर्णन ने इस कार्रवाई को चुनौती दी तो सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने उनकी मानसिक हालत की जांच करने का आदेश दे दिया और फिर अंतत: उन्हें अवमानना का दोषी मानते हुए छह महीने के लिए जेल भेज दिया। किसी पदासीन जज को जेल की सजा सुनाए जाने का यह अपने आप में पहला मौका था। होना तो यह चाहिए था कि प्रधानमंत्री को लिखे जस्टिस कर्णन के पत्र का सुप्रीम कोर्ट स्वत: संज्ञान लेती और बीस जजों पर कर्णन के लगाए आरोपों की जांच कराती। लेकिन उसने ऐसा करने के बजाय अवमानना कानून के डंडे से जस्टिस कर्णन को हकालते हुए जेल पहुंचा दिया। डरे हुए और बिके हुए मीडिया तथा नागरिक समाज ने भी जस्टिस कर्णन के मामले में अपनी भूमिका का ठीक से निर्वाह नहीं किया। ऐसे में कहा जा सकता है कि इस सबके पीछे जातीय पूर्वाग्रह की भी अहम भूमिका रही। जस्टिस कर्णन खुद भी मद्रास हाई कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान मुख्य न्यायाधीश और अन्य साथी जजों पर अपने को दलित होने की वजह से प्रताडित करने के आरोप लगाते रहे थे।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात को सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रहे वीएन खरे ने तो बडे ही सपाट अंदाज में स्वीकार किया था। 2002 से 2004 के दौरान सर्वोच्च अदालत के मुखिया रहे जस्टिस खरे ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था- 'जो लोग यह दावा करते हैं कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार नहीं है, मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। मेरा मानना है कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का यह नासूर ऐसा है, जिसे छिपाने से काम नहीं चलेगा, इसकी तुरंत सर्जरी करने की आवश्यकता है।' जस्टिस खरे ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए महाभियोग जैसे प्रावधान और उसकी प्रक्रिया को भी नाकाफी बताया था।

जस्टिस गोगोई सहित सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश की विवादास्पद और संदेहास्पद कार्यशैली को लेकर उठाए गए सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व न्यायाधीश पीबी सावंत ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में जो कहा था, वह भी गौरतलब है। जस्टिस सावंत ने कहा था कि मीडिया के माध्यम से देश से मुखातिब होने वाले चारों जजों की विश्वसनीयता असंदिग्ध है, लिहाजा माना जा सकता है कि समस्या बहुत गंभीर है, तभी उन्हें इस तरह का कदम उठाना पडा है। चारों जजों का यह कदम देशहित में है और इससे नागरिकों को जानकारी मिली है कि देश की न्याय व्यवस्था किस तरह चल रही है। जस्टिस सावंत ने सबसे अहम बात यह कही थी- ''देश की जनता को यह समझ लेना चाहिए कि कोई भी न्यायाधीश भगवान नहीं होता। अदालतों में अब आमतौर पर फैसले होते हैं, यह जरुरी नहीं कि वहां न्याय हो।''

इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व प्रधान न्यायाधीश राजेंद्र मल लोढा ने तो अपनी बेबाक शैली में दो टूक कहा था कि न्यायपालिका की व्यवस्था दरक रही है और हालात लगातार बिगड रहे हैं। उनका कहना था- ''जब सुप्रीम कोर्ट के जज खुद ही न्यायपालिका की स्वायत्तता की गारंटी या भरोसा नहीं दे पा रहे हैं तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद अशुभ संकेत है। न्यायपालिका में कार्यपालिका का दखल अगर ऐसे ही बढता रहा तो न्यायपालिका की दशा बेहद जर्जर हो जाएगी।''

दरअसल, हाल ही में सेवा निवृत्त हुए सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली को लेकर सबसे ज्यादा सवाल तब उठे थे जब उन्होंने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से जुडे के एक मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई जज बृजगोपाल लोया की संदिग्ध परिस्थिति हुई मौत के मामले की एसआईटी जांच के लिए दायर याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कोर्ट को राजनीतिक लडाई का मैदान नहीं बनाया जाना चाहिए। इस पर दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एपी शाह ने तो साफ-साफ कहा था कि जज लोया की मौत की जांच की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी तरह गलत है, क्योंकि उसने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले पर भरोसा किया जो कायदे से केस का ट्रायल हुआ ही नहीं था। जस्टिस शाह ने यह भी कहा था- सुप्रीम कोर्ट ने याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी तो की कि यह याचिका पॉलिटिकल मोटिवेटेड है, लेकिन उसने अपने फैसले में ऐसा कोई तथ्य नहीं बताया जिससे कि यह साबित हो कि याचिका राजनीतिक मकसद से दाखिल की गई है। जबकि एक बडे राजनीतिक नेता के केस की सुनवाई जज लोया कर रहे थे।

न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति पर जाने-माने वकील और संविधान के गहन जानकार फली एस. नरीमन की टिप्पणी भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उनका कहना है कि हमारे यहां अदालतें बहुत ज्यादा और इंसाफ बहुत कम है। इससे न्याय व्यवस्था में विश्वास का परदा जर्जर होता जा रहा है।

दरअसल, ऐसा नहीं है कि न्यायपालिका में जारी गडबडियों से आम आदमी बेखबर हो, लेकिन न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था में गडबडियां होने की जो बात आमतौर पर अवमानना के डर के चलते कभी भी सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बन सकी, उसे जस्टिस गोगोई और उनके तीन अन्य साथी जजों ने बडे सलीके से उठाकर न सिर्फ देशभर में हलचल मचाई और सोशल मीडिया पर आम लोगों को मुखर होने का मौका दिया, बल्कि उस समूचे न्यायिक तंत्र को अपने गिरेबान मे झांकने पर मजबूर कर दिया, जो अपनी तमाम विसंगतियों और गडबडियों के बावजूद आज भी हमारे लोकतंत्र का सबसे असरदार स्तंभ है और हर तरफ से आहत और हताश-लाचार देशवासियों की उम्मीदों का आखिरी आसरा भी। सवाल यही है कि क्या प्रधान न्यायाधीश के रूप में जस्टिस गोगोई समूची न्याय व्यवस्था पर मंडरा रहे संदेह के बादलों को छांटने की दिशा में कोई पहल कर पाएंगे। यह सही है कि इस पद पर उनका कार्यकाल महज साढे तेरह महीने का ही होगा और इतने कम समय में उनसे किसी बडी पहलकदमी की उम्मीद करना बेमानी होगा। फिर भी इस दौरान वे कोई ऐसी लकीर तो खींच ही सकते हैं जो सुप्रीम कोर्ट में आने वाले उनके उत्तराधिकारियों के लिए एक मिसाल बन सके और जिससे न्यायपालिका में नीचे के स्तर तक एक सार्थक संदेश पहुंचे।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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