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नोट बंदी का लगा भारत को झटका, मोदी कार्यकाल की सबसे बुरी हालत GDP की

यही हाल रहा तो चरमरा सकती है अर्थव्यवस्था!

नोट बंदी का लगा भारत को झटका, मोदी कार्यकाल की सबसे बुरी हालत GDP की
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भारत की विकास दर में पिछले वित्तीय वर्ष में क़रीब एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. केंद्रीय सांख्यिकी विभाग द्वारा बुधवार को जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में पिछले साल के 8 प्रतिशत के मुकाबले इस साल वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत है.



समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2016-17 की चौथी तिमाही में जनवरी से मार्च के बीच भी, पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले विकास दर गिर कर 6.1 प्रतिशत पर आ गई.अर्थव्यवस्था में गिरावट का सबसे बड़ा कारण पिछले साल के अंत में भारत सरकार द्वारा की गई नोटबंदी रही है. जनवरी से मार्च की तिमाही के दौरान बाज़ार में नक़दी का संकट पैदा हो गया था जिसकी वजह से उपभोक्ता सामानों की बिक्री कम हो गई थी.

देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की रफ्तार पिछले वित्त वर्ष में 7.1 फीसदी रही. वहीं, पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में यह 6.1 फीसदी थी. चौथी तिमाही में ग्रोथ का आंकड़ा इतना कम रहने की बड़ी वजह नोटबंदी को माना जा रहा है.वित्त वर्ष 2017 में कृषि सेक्टर की ग्रोथ 0.7 फीसदी से बढ़कर 4.9 फीसदी रही है. सालाना आधार पर वित्त वर्ष 2017 में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 10.8 फीसदी से घटकर 7.9 फीसदी रही है. वित्त वर्ष 2017 में माइनिंग सेक्टर की ग्रोथ 10.5 फीसदी से घटकर 1.8 फीसदी रही है.केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने बुधवार को एक बयान में कहा कि वित्त वर्ष 2016-17 के लिए निरंतर (2011-12) कीमतों पर वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 121. 90 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है, जिसकी रफ्तार 7.1 फीसदी रही है. यह वित्त वर्ष 2015-16 में 113.81 लाख करोड़ रुपये थी.

अर्थशास्त्रियों का अनुमान था कि नोटबंदी की वजह से जीडीपी में कमी आएगी, लेकिन किसी ने इतनी अधिक गिरावट के बारे में नहीं सोचा था. पिछले वित्तीय वर्ष के पहले तिमाही के 7 प्रतिशत के मुकाबले चौथी तिमाही में विकास दर 6.1 प्रतिशत दर्ज की गई. आर्थिक मामलों के जानकारों का कहना है कि ये आंकड़ा और भी बुरा हो सकता था, लेकिन भारत में जीडीपी की गणना में छोटे व्यवसायों और असंगठित क्षेत्रों के आंकड़े शामिल नहीं किए जाते हैं. नोटबंदी के कारण असंगठित क्षेत्रों पर सबसे ज़्यादा मार पड़ी और उनके आंकड़े शामिल न होने से वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा अभी नहीं लगाया जा सकता. पिछले साल 9 नवंबर से 500 और 1000 रुपये के बड़े नोटों को बंद किए जाने के कारण विनिर्माण, मैन्यूफ़ैक्चरिंग और सेवा क्षेत्रों पर काफ़ी असर पड़ा था.

क्या भारत आर्थिक मंदी की तरफ़ बढ़ रहा है?

हम अपने आर्थिक इतिहास के सबसे विचित्र दौर से गुज़र रहे हैं. वित्त मंत्री ने हाल ही में कहा कि इस साल भारतीय जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) की विकास दर 9 फ़ीसदी के आसपास रहेगी. एक सच्चाई ये भी है कि मौजूदा केंद्र सरकार अब तक की अपनी इकलौती उपलब्धि का हवाला देते हुए यही कहती रही है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है. अगर हम सरकारी बयानों पर भरोसा करें तो दुनिया भर की आर्थिक स्थिति संकट में है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था उसमें किसी शांत द्वीप समूह की भांति स्थिर है. इसके मुताबिक़ मनमोहन सिंह की ख़राब अर्थव्यवस्था वाला दौर अब बीत चुका है.

हालांकि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद स्टॉक मार्केट में गिरावट आई है, रुपये का अवमूल्यन हुआ है. यही वजह है कि सरकार के आशावादी रुझान और बाज़ार के रुझान में तालमेल नहीं दिख रहा है.
एनडीटीवी के प्रणय रॉय के साथ एक बेहतरीन साक्षात्कार में मोर्गन स्टेनले के रुचिर शर्मा ने भारतीय आर्थिक परिदृश्य के बारे में कुछ अहम बातें कही हैं. उन्होंने वैश्विक बाज़ार के रुझानों का अध्ययन किया है. उसके आधार पर एकत्रित आंकड़ों और संकेतों के आधार पर रुचिर ने जो बातें कहीं है, उनमें पहली बात तो यही है कि 2015 के दौरान वैश्विक कारोबार में शून्य प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

बता दें कि मोदी सरकार के दौरान अगर देश की विकास दर वापस लौटी तो इस सरकार के लिए अच्छे संकेत नहीं होंगे. हालांकि, सभी पार्टियों के नेता इस बात को दोहरा चुके है कि नोट बंदी के दूरगामी परिणाम बहुत अच्छे नहीं होंगे.

शिव कुमार मिश्र
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