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क्यों टूटा देश के धैर्य का बाँध.? जो बीजेपी ने लहराया जीत का परचम! - सतीश चन्द्र मिश्र

 शिव कुमार मिश्र |  2017-04-16 09:52:59.0

क्यों टूटा देश के धैर्य का बाँध.? जो बीजेपी ने लहराया जीत का परचम! - सतीश चन्द्र मिश्र

मई 2014 में भाजपा को मिली ऐतिहासिक चुनावी सफलता के लगभग तीन साल (34 महीनों) बाद देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में भाजपा को मिले जनादेश ने एक बार पुनः इतिहास रच दिया है. उत्तरप्रदेश के 65 वर्ष लम्बे चुनावी इतिहास में जनता ने किसी राजनीतिक दल को पहली बार 80% से अधिक बहुमत देकर प्रदेश की सत्ता सौंपी है. 2014 से 2017 के मध्य जारी रही भाजपा की इस तूफानी विजय यात्रा का परिणाम यह हुआ है कि देश के 13 राज्यों में उसकी सरकार है तथा देश के 4 अन्य राज्यों में अपने सहयोगी दलों के साथ उसकी सरकार है. कुल मिलाकर भाजपा आज देश के 17 राज्यों में शासन कर रही है. तथा इन्हीं तीन वर्षों के कालखण्ड में भाजपा केवल देश की ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन चुकी है.
क्या कारण है कि 1990 तक देश के कुछ हिंदी भाषी राज्यों की एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पार्टी मात्र रही भाजपा के राजनीतिक दबदबे ने पिछले ढाई दशकों में इतनी लम्बी और ऊंची छलांग लगाई है कि आज वो देश के 17 राज्यों में शासन कर रही है तथा दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल बन चुकी है.?


इस सवाल पर पिछले ढाई तीन वर्षों से, विशेषकर मई 2014 में भाजपा को मिली ऐतिहासिक विजय के बाद से देश में गहन चिंतन मंथन और चर्चा हो रही है. लगभग 60 वर्षों तक इस देश पर शासन कर चुकी कांग्रेस द्वारा पोषित बौद्धिक वैचारिक और मीडियाई खेमे ऐसी चर्चाओं का बाजार गर्म किये हैं. देश की राजनीति में भाजपा के प्रचण्ड उभार के कारणों की असत्य अराजक व्याख्यायों का अश्लील दौर तथाकथित सेक्युलरिज्म की आड़ में देश में पिछले ढाई तीन वर्षों से जोरशोर से जारी है. भाजपा के बढ़ते राजनीतिक प्रभुत्व को कभी कट्टरता, कभी साम्प्रदायिकता कभी असहिष्णुता का उभार कहकर परिभाषित किया जाता रहा है. किन्तु यह सत्य नहीं है.


दरअसल देश के जनादेश में यह ऐतिहासिक परिवर्तन अनायास या अकस्मात नहीं हुआ था. यह जनादेश किसी एक घटना या दुर्घटना का तात्कालिक परिणाम भी नहीं था. इस ऐतिहासिक परिवर्तन की नींव 2014 से वर्षों पहले तैयार होने लगी थी. पिछले ढाई से तीन दशकों के दौरान देश में तथाकथित सेक्युलरिज्म की विकृत विषाक्त विचारधारा जमकर पुष्पित पल्लवित प्रचारित हुई. इस विचारधारा ने देश के बहुसंख्यक हिंदुओं की आत्मा को, आस्था को, अस्मिता को, उसकी राष्ट्रीय भावनाओं को लगातार आहत और अपमानित किया, उसके राष्ट्रीय सम्मान स्वाभिमान को बुरी तरह क्षत विक्षत किया. यही वह कालखण्ड था जब देश ने अपने लिए नए राजनीतिक विकल्प की खोज प्रारम्भ की. इस दौरान देश मौन नहीं रहा था. उसकी आत्मा आस्था अस्मिता तथा उसके राष्ट्रीय सम्मान स्वाभिमान पर प्रहार करनेवालों को वो निरन्तर चेतावनी दे रहा था. किन्तु तथाकथित सेक्युलरिज्म की विकृत विषाक्त विचारधारा के कुटिल कर्णधार इस दौरान देश के धैर्य की कठोर परीक्षा लगातार ले रहे थे. किन्तु अपने लिए नए विकल्प की तलाश कर रहे देश ने अपनी तलाश पूरी होने तक अपने धैर्य के बाँध को टूटने नहीं दिया था.
इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब देश का तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुलेआम एलान करता घूम रहा था कि 120 करोड़ की जनसँख्या वाले देश के सब संसाधनों पर पहला हक़ देश के 20 करोड़ मुसलमानों का है.



इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब देश के सेक्युलर शासकों ने देश के 100 करोड़ हिंदुओं पर वह एकतरफा यमराजी कानून थोपने की कोशिश की थी जिसके अनुसार साम्प्रदायिक दंगा होने पर किसी मुस्लिम द्वारा नामजद हिन्दू को गैर जमानती धाराओं के अंतर्गत तत्काल गिरफ्तार कर उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर ली जाती तथा स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने का दायित्व भी उसपर ही होता, किन्तु मुस्लिम दंगाइयों को सेक्युलर शासकों ने अपने इस तुगलकी कानून के दायरे से बाहर रखा था.
इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थल पर उनके मन्दिर के निर्माण की मांग कर रहे सौ करोड़ हिंदुओं से देश के सेक्युलर शासकों ने भगवान राम के अस्तित्व का सबूत माँगा था. उन्होंने वामपंथी इतिहासकारों के माध्यम से हिंदुओं को यह समझाने का घृणित प्रयास किया था कि माँ सीता भगवान श्रीराम की पत्नी नहीं बल्कि बहन थीं तथा भगवान श्री हनुमान जी की प्रेमिका थी


इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब इस देश के सेक्युलर भाग्यविधाता देश की सर्वोच्च अदालत में बाकायदा हलफनामा देकर यह एलान कर आये थे कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था श्रद्धा के सर्वोच्च शिखर भगवान श्रीराम केवल एक ऐसी गप्प हैं, अफवाह हैं जिसका कहीं कोई साक्ष्य नहीं है.


इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब भगवान श्रीराम के दर्शन कर अयोध्या से वापस लौट रहे ५९ रामभक्तों को ट्रेन के डिब्बे में दंगाई मुस्लिम गुंडों ने जिन्दा जलाकर मौत के घाट उतार दिया था किन्तु इस देश के सेक्युलर शासकों ने बाकायदा एक न्यायिक जाँच का ढोंग कर के यह सिद्ध करने का कुकर्म किया था कि, उन रामभक्तों को किसी ने नहीं जलाया था और वो खुद अपनी लगाई आग में जलकर मर गए थे.


इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब हिन्दू देवी देवताओं के साथ ही साथ भारत माता के अश्लील नग्न चित्र बना रहे एमएफ हुसैन नाम के धूर्त को उसके कुकर्म के लिए दण्डित करने के बजाय इस देश के सेक्युलर भाग्यविधाता उस धूर्त हुसैन को पद्मश्री और पद्मविभूषण सरीखे शासकीय सम्मानों से सम्मानित कर रहे थे.

स देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब इस देश के तथाकथित सेक्युलर भाग्यविधाताओं के शासन में सरकारी पाठ्यपुस्तकों में भगवान शंकर का परिचय शराबी और बलात्कारी तथा देवी माँ दुर्गा का परिचय शराब के नशे में धुत्त रहनेवाली व्यभिचारिणी लिखा गया था.


इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब भगवान बजरंगबली को इस धरती का पहला आतंकवादी लिखनेवाले धूर्त राजेन्द्र यादव को दण्डित करने के बजाय इस देश के सेक्युलर भाग्यविधाता उस धूर्त राजेन्द्र यादव को पद्मश्री से सम्मानित कर रहे थे.

इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब बाकायदा संसद के भीतर कट्टर धर्मान्ध साम्प्रदायिकता के ठेकेदार देश के राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम का खुलेआम अपमान कर रहे थे.

इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब उन ठेकेदारों के विरुद्ध कार्रवाई करने के बजाय देश के सेक्युलर शासक उन ठेकेदारों का निर्लज्ज बचाव कर रहे थे.

इस देश के धैर्य का बाँध तब भी नहीं टूटा था जब दंगाई मुस्लिम गुंडों ने काश्मीर में सदियों से रह रहे 3 लाख कश्मीरी पण्डितों से रातोंरात उनके घर उनकी जमीन छीन लिए थे. सड़कों पर खुलेआम उनका कत्लेआम किया था. उनकी माँ बहन बेटियों की इज़्ज़त आबरू के साथ बर्बर व्यवहार किया था. किन्तु देश के सेक्युलर शासकों ने ऐसा करनेवाले उन दंगाई मुस्लिम गुंडों में से किसी एक को भी इसके लिए दण्डित नहीं किया था. वो 3 लाख कश्मीरी पण्डित अभीतक दर दर भटकते रहे हैं. इनदिनों केंद्र की मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों से उनकी घरवापसी की उम्मीदें अवश्य बढ़ गयी हैं.


उपरोक्त घटनाक्रम तो कुछ उदाहरण मात्र हैं. पिछले 25 वर्षों के दौरान घटे ऐसे घटनाक्रमों से सम्बन्धित तथाकथित सेक्युलरिज्म के ठेकेदारों की यह कुकर्मगाथा बहुत लम्बी है.

इस दौरान देश ने अपने सब्र के बांध को टूटने भी नहीं दिया था तथा अपने लिए एक सशक्त विकल्प की तलाश भी जारी रखी थी. जो 2002 में उसको तब पूरी होती हुई दिखी थी जब देश के पश्चिमी कोने के राज्य गुजरात का तत्कालीन शासक नरेंद्र मोदी उन सेक्युलर शासकों के विरोध में उनके समक्ष स्वाभिमान के साथ तनकर खड़ा हो गया था और आगे बढ़कर उनको आइना दिखाने में कोई संकोच नहीं कर रहा था. यह वह निर्णायक कालखण्ड था जब पूरे देश के तथाकथित सेक्युलर गिरोह 28 फरवरी 2002 को गोधरा में 59 रामभक्तों को जिन्दा जलाकर मौत के घाट उतारनेवाले मुस्लिम दंगाई गुंडों के बचाव में लामबन्द हो गए थे और उनका शिकार बने 59 रामभक्तों की मौत का जिम्मेदार उन रामभक्तों को ही सिद्ध करने में जुट गए थे. किन्तु नरेंद्र मोदी नाम का गुजरात का वह तत्कालीन शासक उस देशव्यापी सेक्युलरी षड्यन्त्र से ना तो भयभीत हुआ था ना ही भ्रमित हुआ था. उसकी दृढ इच्छाशक्ति का ही परिणाम था कि देश के सेक्युलर शासक अपनी न्यायिक जाँच के पाखण्डी षड्यन्त्र से जिन 59 रामभक्तों कि मौत का जिम्मेदार उन रामभक्तों को ही सिद्ध करके उनके हत्यारों को बचाने का कुकर्म करते रहे थे उन्हीं 59 रामभक्तों की हत्या के आरोप में न्यायालय ने 10 मुस्लिम दंगाई गुंडों को मृत्युदण्ड तथा 25 मुस्लिम दंगाई गुंडों को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी.


सोहराबुद्दीन और इशरत जहाँ सरीखे आतंकियों की मौत पर भी देश के तथाकथित सेक्युलर शासकों के देशघाती पाखण्डों षडयन्त्रों के विरुद्ध भी नरेंद्र मोदी जिस प्रकार चट्टान की तरह अडिग होकर खड़े हो गए थे उसे देखकर देश ने तय कर लिया था कि उसको जिस और जैसे विकल्प की तलाश है वो विकल्प नरेंद्र मोदी ही हैं.



तथाकथित सेक्युलर शासकों के देशघाती पाखण्डों और षडयन्त्रों के विरुद्ध भीषड़ संघर्ष करते हुए विपरीत परिस्थितियों में नरेंद्र मोदी ने गुजरात को चतुर्दिक विकास के सतरँगी इंद्रधनुष से जिस प्रकार सज्जित किया था उसके कारण देश ने अपने नए विकल्प के रूप में नरेंद्र मोदी के नाम पर सर्वसम्मति से अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी थी. यही कारण है कि जब 2013 में भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित किया था तब पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज ने सार्वजनिक बयान देकर यह स्वीकार भी किया था कि यह पहला अवसर है जब प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पार्टी के बजाय देश की जनता ने तय किया है. सुषमा स्वराज की यह स्वीकारोक्ति शत प्रतिशत सही भी थी.


उल्लेखनीय है कि अपने जन्मकाल से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा हिंदुत्व केंद्रित ही रही है. देश की स्वतन्त्रता के पश्चात् जनसंघ के रूप में हुए उसके राजनीतिक अवतार की देश में पहचान और पैठ एक हिन्दूवादी राजनीतिक दल के रूप में ही हुई थी. स्वतन्त्रता के पश्चात् जनसंघ का राजनीतिक विस्तार तो हुआ था किन्तु वह एक ऐसी राजनीतिक शक्ति नहीं बन सका था जो स्वयं के बल पर देश या किसी प्रदेश में पूर्ण बहुमत की अपनी सरकार बना सके. 1977 तक उसकी भूमिका हिंदी भाषी क्षेत्रों में बनते बिगड़ते रहे कांग्रेस विरोधी राजनीतिक गठबन्धनों के महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदारों की तो रही किन्तु ड्राइविंग सीट से वो दूर ही रही.


1977 में जनता पार्टी में विलय तथा 1980 में जनता पार्टी के विघटन के पश्चात् देश के राजनीतिक रंगमंच पर जनसंघ अपने नए नाम भारतीय जनता पार्टी के साथ अवतरित हुआ था. अगले दस वर्षों तक उसे कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी. 1989 में वीपी सिंह के नेतृत्व में केंद्र में बनी जनता दल की गठबंधन सरकार में भी भारतीय जनता पार्टी शामिल नहीं हुई थी. उसकी भूमिका उस सरकार को बाहर से अपना समर्थन दे रहे राजनीतिक दल की ही रही थी. राममंदिर आंदोलन के पश्चात देश के कुछ राज्यों तथा केंद्र में अपनी सरकार बनाने में भाजपा सफल तो हुई थी किन्तु विकल्प की तलाश कर रहे देश के मन की बात समझने में भाजपा की उस सरकार के तत्कालीन कर्णधार अटलबिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी से बड़ी चूक हुई थी. तथाकथित सेक्युलरिज्म के पाखण्डी भ्रमजाल में फंसने से वो बच नहीं सके थे. वर्ष 2002 में अमरनाथ तीर्थ यात्रा पर गए 40 श्रद्धालुओं को मौत के घाट उतारनेवाले हत्यारे आतंकवादियों के विरुद्ध उन्होंने तत्काल कोई कार्रवाई नहीं की थी. इसके लिए उन्होंने रमजान के कारण स्वयं द्वारा घोषित एकतरफा युद्धविराम को बताया था. अपनी इस कायर कुटिल सेक्युलरी अकर्मण्यता के लिए उन्होंने तथाकथित सेक्युलर गिरोहों की वाहवाही तो अवश्य प्राप्त की थी किन्तु जिस देश ने विकल्प के रूप में उनको अपना कर्णधार चुना था वो देश उनकी इस कायर कुटिल रणनीति से बहुत आहत हुआ था. उन कर्णधारों द्वारा अपने सेक्युलरी पाखण्ड से देश को आहत करने का यह एकमात्र उदाहरण नहीं था. अतः देश ने अपने इस प्रयोग को असफल मानकर अपने लिए विकल्प की तलाश पुनः प्रारम्भ कर दी थी.



अन्ततः उसकी यह तलाश 2014 में अपने पड़ाव पर पहुंची थी. परिणामस्वरूप 16 मई 2014 को घोषित हुए 16वीं लोकसभा के चुनाव परिणामों ने एक नया इतिहास रच दिया था. देश की जनता ने 30 वर्षों के बाद किसी एक दल (भारतीय जनता पार्टी) को पूर्ण बहुमत के साथ देश की सत्ता सौंप दी थी. 62 वर्ष लम्बे देश के चुनावी इतिहास में यह पहला अवसर था जब शुद्ध रूप से एक गैर कांग्रेसी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ था. इससे पहले 1977 में जनता पार्टी को मिली चुनावी विजय की तुलना 2014 में भाजपा को मिली चुनावी विजय से नहीं की जा सकती. 1977 में बनी जनता पार्टी वस्तुतः आम चुनावों से ठीक पहले हुए कई दलों का ऐसा गठबंधन थी जो केवल ढाई वर्ष की समयावधि में ही बुरी तरह टूटकर बिखर गयी थी
भाजपा को 2014 में केंद्र में मिली ऐतिहासिक विजय के पश्चात् 2017 में उसको उत्तरप्रदेश में मिली ऐतिहासिक विजय के साथ ही साथ देश में तथाकथित सेक्युलरिज्म की सबसे बड़ी ठेकेदार कांग्रेस को मिली सीटों की संख्या उसके अबतक के चुनावी इतिहास मे केंद्र में पहली बार दो अंकों (44) पर सिमट गयी है तथा उत्तरप्रदेश में उसको मिली सीटों की संख्या पहली बार दहाई का आंकड़ा पार नहीं कर पायी है और 7 पर सिमट गयी है.


यह स्थिति महाभारत के उस चर्चित प्रसंग की याद दिलाती है जब भगवान श्रीकृष्ण महाभारत से पहले संधि का अंतिम प्रयास करने दुर्योधन के पास यह प्रस्ताव लेकर गए थे कि... पूरे राज्य के बजाय पांचों पांडवों को तुम केवल पांच गांव दे दो तो युद्ध नहीं होगा. भगवान श्रीकृष्ण के इस प्रस्ताव का उत्तर दुर्योधन ने यह कहकर दिया था कि... पांच गांव तो दूर, पांडवों को मैं सुई की नोक के बराबर भूमि नहीं दूंगा...


इतिहास साक्षी है कि दुर्योधन के इस उत्तर का परिणाम क्या हुआ था.?
देश के बहुसंख्यक समाज ने भी सेक्युलर कौरवों से अपने लिए सत्ता का साम्राज्य नहीं बल्कि सुख शांति सुरक्षा सम्मान और स्वाभिमान के वो पांच गाँव ही मांगे थे जिन्हें पिछले 3 दशकों के दौरान उनसे छीन लिया गया था, लूट लिया गया था. अतः महाभारत तो होनी ही थी जो हुई भी. इस लोकतान्त्रिक महाभारत का परिणाम भी वही हुआ जो पौराणिक महाभारत का हुआ था.


लेखक सतीश चन्द्र मिश्रा के निजी विचार है

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