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एक सामान्य इंजीनियर यूपी में कैसे बन गया अरबपति? बड़ा हैरान कर देने वाला खुलासा

यूपीएसआईडीसी का एक सामान्य अभियन्ता कौड़ियों से करोड़पति और फिर अरबपति का सफर

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उस वक्त अरुण मिश्रा यू.पी. औद्योगिक विकास समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। मदन मोहन शर्मा ने ईडी को जो जानकारी दी है उसके मुताबिक, 'उन्हें सूचित किया गया था कि अरुण कुमार मिश्रा के माता-पिता एसपी मिश्रा और श्रीमती तारा देवी सहित उनके भाई अनुराग मिश्रा ने उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून में एक बंगला खरीदा है। इस मामले में बैंक ने आनन-फानन में लोन की मंजूरी भी दे दी। इक्कीस लाख (21,00,000) रुपए के लिए लोन अकाउंट नंबर एनसी 5962, 20 लाख 90 हजार का लोन एनसी 5941 और 21 लाख 10 हजार का लोन एनसी 5950 से स्वीकृत किया गया। खास बात यह है कि 63 लाख,16 हजार की यह रकम एक ही दिन 6 अगस्त 2004 में स्वीकृत कर ली गयी। ऋण राशि पंजाब नेशनल बैंक, विधानसभा मार्ग, देहरादून के खाते में जमा की गई थी।

प्रवर्तन निदेशालय की सूचना रिपोर्ट के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बैंक कर्मियों ने अरुण मिश्रा के काले धन को सफेद में तब्दील करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इस फर्जीवाडे़ के लिए बैंक कर्मियों ने सस्पेंस एकाउंट (असमंजस/दुविधा खाता) संख्या 4422005, खाता संख्या 711320 और शाखा के सिन्ड्री एकाउण्ट (संसूचक खाता) संख्या 4422003171109 का नाजायज इस्तेमाल किया। बैंक कर्मियों ने आर्य वानप्रस्थ आश्रम शाखा पीएबी, जवालपुर, हरिद्वार के इंटरसोल एकाउण्ट नम्बर 1064003171160 में उसी राशि को हस्तांतरित कर दिया। इस इंटरसोल खाते से 72 लाख 82 हजार 105 रुपया पंजाब नेशनल बैंक, आर्य वानप्रस्थ शाखा, ज्वालापुर, हरिद्वार में अंजान व्यक्तियों के खातों में स्थानान्तरित कर दिया। गौरतलब है कि ये वही खाते थे जिन्हें अरुण मिश्रा ने फर्जी तरीके से बैंक कर्मियों पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर खुलवाए थे।

कहा तो यह भी जा रहा है कि बैंक कर्मियों ने इस काम के लिए मोटी रकम रिश्वत के रूप में ली थी। इस मामले में बैंक अधिकारी ए.के. बंसल पूरी तरह से दोषी माने जा रहे हैं। जो पांच खाते फर्जी तरीके से खोले गए थे उनमें से पहला खाता संख्या 106400101206702 किसी रामेश्वर के नाम पर था। दूसरा खाता संख्या 106400101206641 श्रीप्रकाश के नाम से खोला गया था। तीसरा खाता संख्या 106400101206687 श्रीमती किरनोदेवी के नाम पर, चौथा खाता संख्या 106400101206669 कौशिक ए. कुमार के नाम पर और पांचवा खाता संख्या 1064001206596 सुश्री तारा देवी के नाम पर खोला गया था। उपरोक्त समस्त खाते केवाईसी के बगैर ही खोले गए थे। बताया जाता है कि जब कि इन खाताधारकों का भौतिक सत्यापान किया गया तो सभी खातों के फर्जी होने की पुष्टि हुई। खाता खोलेन के लिए जो फार्म भरवाए गए थे उन फार्मों पर कोई नमूना हस्ताक्षर नहीं थे। बिना नमूना हस्ताक्षर के बावजूद खातों से रकम का आदान-प्रदान होता रहा। प्रवर्तन निदेशालय की रिपोर्ट बताती है कि 28 नवम्बर 2005 को 75 लाख रुपए पीएनबी की मुद्रा केन्द्र में जमा किया गया था। फिर इस रकम को पीएनबी, विधानसभा शाखा के अंतर्सल खाते में स्थानान्तरित किया गया। 30 नवम्बर 2005 में 72 लाख 82 हजार 105 रुपया शाखा के सस्पेंस एकाउण्ट में मौजूद शो करता रहा। उस शाखा के खाते को तत्कालीन प्रबंधक एम.एम. शर्मा और तत्कालीन बैंक मैनेजर हरीश कंबोज (उस वक्त उप प्रबंधक के रूप में तैनात थे) ने पर्दा डालने की नीयत से समायोजित कर दिया था। इस गोलमाल में बैंक के बाबू ए.के. चड्ढा की भूमिका महत्वपूर्ण बतायी गयी है।

आर्य वानप्रस्थ आश्रम, शाखा जुवालपुर, हरिद्वार के तत्कालीन प्रबन्धक ए.के. बंसल की भूमिका भी अरुण मिश्रा के काले धन को सफेद में बदलने में सामने आयी। खेल कुछ इस तरह से हुआ। पीएनबी की इस शाखा के सिंदरी एकाउण्ट (संसूचक खाता) में 60 लाख की रकम जमा की गयी। इसके बाद उक्त रकम को बिना किसी नियमित प्रक्रिया (हस्तांतरण आदेश, जमा राशियों की पर्ची के बगैर और बाउचर-चालान के बगैर) का पालन किए दोबारा वितरित करके उपरोक्त पांच फर्जी खातों में जमा कर दिया गया, जिसका संचालन स्वयं अरुण मिश्रा के द्वारा करना बताया गया है। इसी तरह से एक करोड़ से भी ज्यादा की धनराशि के साथ भी कुछ ऐसा ही खेल किया गया। यह राशि पर उपरोक्त नियमों का पालन किए बगैर उन्हीें पांच खातों में वितरित करके जमा दिखायी गयी तो खाता श्री मिश्रा ही संचालित करते रहे हैं।

इसके बाद 19 दिसम्बर 2005 में उन्हीं काल्पनिक खातों में कुछ अज्ञात व्यक्तियों ने 25 लाख की रकम जमा करवायी। जांच के दौरान बैंक कर्मी कोई भी रिकार्ड प्रस्तुत नहीं कर सके। तत्कालीन शाखा प्रबन्धक श्री बंसल के निर्देश पर ही उपरोक्त खातों से 3 करोड़ 41 लाख 71 हजार 92 रुपए और मूल राशि का ब्याज जो लगभग 10 लाख के आस-पास था, उसे विड्राल फार्म से ही निकाल लिए गए। इतना ही नहीं मामले को दबाने की गरज से खाते भी बन्द कर दिए गए। खाता बन्द करने के लिए किसी से अनुरोध/प्रार्थना पत्र तक नहीं लिया गया, वैसे भी अनुरोध पत्र लेते भी किन व्यक्त्यिों से जब खाता ही फर्जी नामों पर खोला गया था तो अनुरोध पत्र किस व्यक्ति से लिया जाता? बस यहीं से ईडी ने पूरे मामले को शीशे की तरह साफ कर दिया। कहने में कतई संकोच नहीं है कि अरुण मिश्रा के करोड़ों के काले धन को सफेद करने में बैंक कर्मियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। साफ जाहिर है कि अरुण मिश्रा की काली कमाई को सफेद करने में बैंक कर्मी इतने अन्धे हो गए थे कि उन्होंने भविष्य को ध्यान में रखते हुए स्वयं के बचाव के लिए कोई तैयारी तक नही की थी। शायद उन्हें अरुण मिश्रा के राजनीतिक और प्रशासनिक रुतबे पर पूरा भरोसा था कि भविष्य में कोई जांच नहीं होने वाली।

दुर्भाग्य ने बैंक कर्मियों का साथ दिया और सारे के सारे ईडी की जांच में फंस गए। मुख्य अभियन्ता अरुण मिश्रा का प्रकरण खुलने के बाद श्री मिश्र के साथ ही उक्त बैंक कर्मियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया था। पुख्ता प्रमाण के बावजूद अरुण मिश्रा के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई तो दूर की बात वह अभी तक यूपीएसआईडी में मुख्य अभियन्ता के पद पर विराजमान है। हाल ही में तबादले का शिकार हुए एमडी ने श्री मिश्रा से परियोजना का सारा काम छीन लिया था लेकिन श्री मिश्र न्यायपालिका की शरण में जाकर दोबारा काबिज हो गए। विभागीय कर्मचारियों को वर्तमान योगी सरकार से न्याय की उम्मीद है। कर्मचारियों ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि यदि अरुण मिश्रा को जल्द से जल्द यूपीएसआईडी से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया गया तो निश्चित तौर पर यूपीएसआईडी में इसी तरह से सरकारी योजनाओं का धन डकारा जाता रहेगा।

सरकारी खजाने को पहुंचायी चोट
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, ट्रॉनिका सिटी गाजियाबाद में 96,600 वर्ग मीटर ग्रुप हाउसिंग के प्लॉट और 76,640 वर्ग मीटर कमर्शियल प्लॉट एलॉट किए गए। ग्रुप हाउसिंग प्लॉट का रिजर्व प्राइज 12-13 हजार रुपये के बीच रखा गया था। अरुण मिश्रा ने अवैध कमाई की गरज से उन प्लॉटों को 3,200 से 4,475 की दर पर बेच दिया। इसी तरह से कामर्शियल प्लाट का रेट 15 हजार रुपये प्रति वर्ग गज तय किया गया था। अरुण मिश्रा ने इसमें भी कमाल दिखाया। 15 हजार की कीमत वाले प्लाटों को मात्र 5,500 से 11,500 रुपये की दर पर बेच दिया। सरकार को नुकसान हुआ 152 करोड़ से भी ज्यादा। कमाई का एक बड़ा हिस्सा अरुण मिश्रा की जेब में चला गया जबकि शेष रकम संतरी से लेकर मंत्री तक बंट गयी। इस मामले में चीफ इंजीनियर अरुण मिश्रा को सीधे तौर पर दोषी माना गया।

मुम्बई वाले नेता का सानिध्य काम आया
मुम्बई वाले नेता, यानी अमर सिंह। समाजवादी पार्टी में अमर सिंह की हैसियत किसी समय मुलायम सिंह यादव के बाद नम्बर दो की मानी जाती रही है। अमर सिंह से बेहद करीब का रिश्ता रखने वाले अरुण मिश्रा ने अपना कद बढ़ाने और भ्रष्टाचार में नए-नए आयाम स्थापित करने के लिए अमर सिंह को विश्वास में लिया। अमर सिंह के सहारे ये सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के करीब पहुंच गया। यही यह कहा जाए कि मुलायम ने भी अरुण मिश्रा के कथित भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से आंखें बन्द कर ली थीं तो शायद कुछ भी गलत नहीं होगा। दो शीर्ष नेताओं से करीब का रिश्ता रंग लाया और एक सहायक अभियन्ता न सिर्फ मुख्य अभियन्ता के पद तक पहुंच गया बल्कि असीमित अधिकारों का मालिक बन गया। विधानसभा में रखी गई सीएजी रिपोर्ट भी इन आरोपों की पुष्टि करती हैं। नियमविरुद्ध तरीके से श्री मिश्रा को लैंड एक्विजिशन और मैप अप्रूवल का अधिकार मिला हुआ था। जमकर लूट खसोट हुई। इस दौरान शिकायत दर शिकायत का सिलसिला भी चला।

जब विपक्ष तत्कालीन सरकार पर आरोपी की झड़ी लगा बैठा, तब कहीं जाकर वर्ष 2007 में मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की गयी। एसआईटी जांच रिपोर्ट में आरोप सिद्ध होने पर अरुण मिश्रा को सस्पेंड किया गया, साथ ही 2 एफआईआर भी दर्ज की गयीं। कानपुर में उनके 65 बैंक खाते सीज किए गए। इतना सब कुछ होने के बावजूद श्री मिश्रा को तत्कालीन मायावती सरकार के कार्यकाल वर्ष 2008 में पुनरू बहाल कर दिया गया। इसके बाद वर्ष 2011 में सीबीआई ने अपनी जांच में 100 फर्जी बैंक खातों का पता लगाया। सीबीआई ने अपनी जांच में आरोप लगाया था कि ये सभी खाते अरुण मिश्रा के हैं। आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में वर्ष 2011 में ईडी ने अरुण मिश्रा के खिलाफ केस दर्ज किया। 2011 में ही सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा। लगभग छह महीने जेल में बिताने के बाद अरुण मिश्रा जमानत पर बाहर आए। जेल से बाहर आते ही उन्होंने एक बार फिर से मुलायम परिक्रमा शुरू की। मुलायम परिक्रमा परिणाम भी जल्द नजर आ गया। मुलायम के निर्देश पर अखिलेश सरकार ने नवम्बर-2012 में उनका सस्पेंशन खत्म करके फिर से उन्हें उनके स्थान पर तैनाती दे दी। सत्ता से करीब का रिश्ता रखने वाले अरुण मिश्रा के हौसले सातवें आसमान पर पहुंच चुके थे। सत्ता के सम्बन्ध ने अपना रंग दिखाया और विभागाध्यक्ष की अनुमति के बगैर ही 6 सितंबर 2013 को उन्होंने खुद को आर्किटेक्चरल एंड टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट का मुखिया घोषित कर दिया। इसकी एक कॉपी उन्होंने तत्कालीन एमडी मनोज सिंह को भेजी, वह भी सिर्फ सूचना देने के लिए।

जलवा कायम है...
सीबीआई की जांच और प्रवर्तन निदेशालय की जांच में भी यह अभियन्ता दोषी पाया जा चुका है। यहां तक कि इसके काले धन को सफेद करने वाले वह बैंक अधिकारी भी कानून की जद में आ चुके हैं जिन्होंने अरुण मिश्रा को काले धन को सफेद करने में बैंक नियमों का जमकर उल्लंघन किया। फर्जी बैंक एकाउण्ट और उन खातों से करोड़ों का लेन-देन सम्बन्धी रिकॉर्ड भी जांच एजेन्सियों के पास हैं फिर भी यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियन्ता (परियोजना) अरुण मिश्रा को बर्खास्त नहीं किया गया। गौरतलब है कि मायावती सरकार के कार्यकाल में अरुण मिश्रा जेल भी जा चुके हैं। वे जमानत पर बाहर हैं। सरकारी सेवानियमावली तो यही कहती है कि जिसके खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच चल रही हो उसे जांच पूरी होने और निर्दोष सिद्ध होने तक सेवा में नहीं रखा जाना चाहिए, अन्यथा वह जांच प्रभावित कर सकता है लेकिन अरुण मिश्रा के मामले में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता। ऐसा लगता है कि एक कथित भ्रष्ट अभियन्ता के समझ पूरी नौकरशाही और यहां तक कि वर्तमान योगी सरकार भी नतमस्तक नजर आ रही है।

कौन है अरुण मिश्रा!
आखिरकार ये अरुण मिश्रा है कौन! जो अब तक की सरकारों के लिए चुनौती साबित होता आया है। जो जांच एजेंसियों द्वारा मुलजिम बनाए जाने के बाद भी अपनी कुर्सी पर डंटा हुआ है, जो महीनों जेल में रहने के बाद भी विभाग में सीना तानकर अपने रुतबे की पहचान कराता है। जिसके आगे विभाग का आला अधिकारी भी नतमस्तक है। जिस किसी ने इस अभियन्ता के खिलाफ सिर उठाया, उसका तबादला कर दिया गया। जो तत्कालीन अखिलेश सरकार की नाक का बाल बना रहा तो दूसरी ओर वर्तमान योगी सरकार के कार्यकाल में भी कथित भ्रष्टाचार की मिसाल बना हुआ है। जब इस सम्बन्ध में 'दृष्टान्त' ने विभाग में खोज-खबर ली तो कई आवाजें एक साथ सुनने को मिलीं, 'अरुण मिश्रा को यदि जानना है या उनके बारे में समझना है तो आपको कानपुर यूपीएसआईडीसी के मुख्यालय में पड़ताल करनी होगी। तभी यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियन्ता (परियोजना) के बारे में जान पाओगे।' आसान नहीं था, फिर भी 'दृष्टान्त' ने विभाग में चोरी-छिपे घुसपैठ बनायी।

बातों-बातों में यहां के कर्मचारियों से पता चला कि 1986 में बतौर सहायक अभियंता (यूपीएसआईडीसी) के पद पर कदम रखने के बाद से अरुण मिश्रा के रुतबे को कोई चुनौती नहीं दे पाया है। यहां तक कि विभाग के एमडी भी अरुण मिश्रा के खिलाफ कुछ भी बोलने से कतराते रहे हैं। नौकरी ज्वाइन करने के महज तीन वर्ष बाद ही श्री मिश्रा को 1989-90 में अनियमितता के मामले में सस्पेंड किया गया था। श्री मिश्रा के रुतबे का ही परिणाम था कि चरित्र पंजिका में प्रतिकूल प्रविष्टि के बाद भी वर्ष 1998 में सेलेक्शन के आधार पर अरुण मिश्रा को एक्जीक्यूटिव इंजीनियर बना दिया गया। महज 5 वर्ष बाद ही वर्ष 2003 में तथाकथित भ्रष्ट अभियन्ता को मुख्य अभियन्ता के पद पर प्रोन्नत कर दिया गया। कथित भ्रष्टाचार के परिचायक अरुण मिश्रा को जब यह लगा कि उसका बाल-बांका करने की हैसियत किसी में नहीं है तो श्री मिश्रा खुलकर भ्रष्टाचार को अंजाम देने में जुट गए। आरोप है कि श्री मिश्रा ने अपना रुतबा बढ़ाने की गरज से तत्कालीन सरकार को विश्वास में लेकर अपना पदनाम तक बदलवा लिया था और स्वयं को डिप्टी एमडी कहलवाने लगे। ये दीगर बात है कि अखिलेश सरकार के कार्यकाल में इस पद को खारिज कर दिया था।

हरित क्रान्ति का दुश्मन
यूपीएसआईडीसी के औद्योगिक क्षेत्र मसूरी गुलावटी रोड, जिला गाजियाबाद में हजारों की संख्या में दशकों पुराने हरे-भरे पेड़ों को अरूण मिश्रा के निर्देश पर कटवा दिया गया। इस काम के लिए श्री मिश्रा ने बेहद चालाकी से समस्त कार्यविधि को अंजाम दिया। बताया जाता है कि क्षेत्र में महज 2950 पेड़ दर्शाए गए जबकि उस वक्त इस क्षेत्र में पेड़ों की संख्या अभिलेखों में 31 हजार 766 के आस-पास थी। श्री मिश्रा ने फर्जी नीलामी के सहारे समस्त पेड़ महज 4 लाख 60 हजार में बेच दिया जबकि अभिलेखों के अनुसार उस वक्त इन पेड़ों की अनुमानित कीमत 8 करोड़ से भी ज्यादा थी। विभागीय कर्मचारियों का आरोप है कि जंगल माफिया ने इस कार्य के लिए श्री मिश्रा को करोड़ों की भेंट चढ़ायी थी। इस अनियमितता की शिकायत भी तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिवों से की गयी थी, लेकिन सत्ता में मजबूत पैठ और धन के बल पर श्री मिश्रा के विरूद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

लेखक अनूप गुप्ता लखनऊ के चर्चित खोजी पत्रकार हैं.
शिव कुमार मिश्र
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