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बालिक होने के बाद भी लड़कियों की शादी में रुकावट, शादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर जानिए ये है वजह

शादी का फैसला हर व्यक्ति के जीवन का एक अहम फैसला होता है।

 Sujeet Kumar Gupta |  14 Aug 2019 9:34 AM GMT  |  नई दिल्ली

बालिक होने के बाद भी लड़कियों की शादी में रुकावट, शादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर जानिए ये है वजह

नई दिल्ली। शादी का फैसला हर व्यक्ति के जीवन का एक अहम फैसला होता है. अपनी शादी को लेकर लोग उत्साहित रहते हैं और कई उम्मीदें रखते हैं. लड़कियों को भी शादी से बहुत उम्मीदें होती हैं। अभी तक लड़कियों की शादी 18 की उम्र होने के साथ कर दीजाती थी, क्योकि वो बालिक समझी जाने लगती थी। लेकिन अब उनकी शादी करने की उम्र सीमा बढ़ाने की मांग उठी है। सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी नेता अश्निनी उपाध्याय याचिका दायर कर कहा है कि लड़कियों की शादी के लिए न्यूनतम उम्रसीमा 21 साल होनी चाहिए। याचिका में उन्होंने भारत सरकार को भी पार्टी बनाया है। कहा है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों की कम उम्रसीमा रखना संविधान से मिले समानता, स्वतंत्रता और गरिमामयी जीवन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

अश्निनी उपाध्याय ने याचिका में कहा है कि अभी लड़कों की शादी के लिए न्यूनतम उम्र 21 साल है. जबकि लड़कियों के लिए 18 साल आखिर इसका आधार क्या है, जो आधार है, वह पितृसत्तात्मक सोच है जो लड़कियों के आत्मनिर्भर बनने की राह में बाधक है। अश्निनी उपाध्याय ने याचिका में दलील दी है कि बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन आदि के ही लड़कियों की उम्रसीमा कम तय कर दी गई।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि भारत में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की कम उम्र में शादी की तय की गई उम्रसीमा ग्लोबल ट्रेंड्स के भी खिलाफ है। इतना ही नहीं, इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन होता है. महिलाओं के लिए यह समानता एवं गरिमा के अधिकार के भी खिलाफ है।

अश्निनी उपाध्याय ने कहा है कि दुनिया के 125 से अधिक देशों में महिलाओं और पुरुषों की शादी के लिए समान उम्र है. भारत में भी इसकी मांग उठती रही है. नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन भी पिछले साल 29-30 अगस्त को नई दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में शादी के लिए लड़का और लड़की की उम्रसीमा समान करने की वकालत कर चुका है।

उन्होंने तर्क गिनाते हुए कहा है कि इससे लड़कियों को पढ़ाई करने का समय मिलेगा. लड़कियों को सामाजिक दबाव का सामना करना नहीं पड़ेगा. नहीं तो पुरातनपंथी सोच वाला घर-समाज शादी के बाद से ही महिलाओं से बच्चे की चाहत करने लगता है. कम उम्र में ही लड़कियों के प्रग्नेंट होने से उनकी पढ़ाई के साथ करियर पर भी असर पड़ता है. जिससे लड़कियों के आत्मनिर्भर होने की राह में रोड़े अटकते हैं

उपाध्याय ने याचिका में डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का हवाला भी दिया है. जिसके मुताबिक जो महिलाएं 20 साल की उम्र से पहले प्रग्नेंट होतीं है. उन्हें व उनके बच्चों को कम वजन सहित तमाम तरह की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है. याचिका में कहा गया है कि लड़कों को 21 साल की उम्र मिलने से उन्हें शैक्षिक और आर्थिक रूप से मजबूत मिलने का मौका मिलता है, ऐसे में लड़कियों को ऐसे मौके क्यों नहीं मिलने चाहिए?

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