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लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 147 सीटों पर और कांग्रेस को 140 सीटों पर करना पड़ेगा संतोष

 Special Coverage News |  16 Dec 2018 9:57 AM GMT  |  दिल्ली

कांग्रेस बीजेपी राजस्थान
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कांग्रेस बीजेपी राजस्थान

हरिशंकर व्यास

एक साल पहले मेरा अनुमान 194 सीटों का था। गुजरात विधानसभा और कैराना उपचुनाव के बाद मेरे चार्ट में 150 सीटे थी। पांच विधानसभाओं के ताजा चुनाव नतीजों के बाद 147 सीटों का है, जबकि कांग्रेस को ले कर अनुमान है कि यदि आज चुनाव हो तो वह 140 सीटों पर होगी। बाकि अन्य पार्टियों का हिसाब 256 सीटों का है। सो भूल जाए कि मोदी-शाह दो महीने बाद अपनी आंधी वाली स्थितियां लिवा लाएंगे। ले देकर अब सिर्फ 50-55 दिन बचे है। हां,लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया फरवरी आखिर में आचार संहिता लगने के साथ शुरू हो जाएगी।


सवाल है ताजा विधानसभा चुनावों से भाजपा के लिए खतरे की बड़ी घंटी क्या बजी? अपना मानना है कि ब्राह्मण-बनियों के उस कोर वोट का बिदकना है जो देहात-शहरों में भाजपा की हवा बनाता था। दूसरी बात कांग्रेस का इतना उभार है कि मायावती हो या ममता बनर्जी, सब अब कांग्रेस के साथ एलायंस बनाएगें। सम्मानजनक अंदाज में व्यवहार रहेगा। तीसरा तथ्य है कि दलित वोट बुरी तरह भाजपा विरोधी है और वह स्थाई है। छत्तीसगढ़ में आदिवासी-दलित आबादी ने भाजपा का जैसे सूपड़ा साफ किया है वैसे झारखंड में भाजपा का सूपड़ा साफ होगा। अब हेमंत सोरेन भी कांग्रेस से एलायंस अनिवार्यतः करेंगे।





इस सबसे भाजपा के सूपड़ा साफ होने की गणित उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक है। योगी आदित्यनाथ वोट नहीं दिला सकते है, इसका यूपी में भी प्रचार बना। उधर पूर्वी उत्तर प्रदेश में पहले से ही गंवार ठाकुर राज से ब्राह्मण खदबदाया हुआ है। इससे ब्राह्मणों का मोदी से मोहभंग और पैठा। तभी अब भाजपा को दो अंक याकि मई 2019 में दस से भी नीचे सीटे मिले तो आश्चर्य नहीं होगा। मैने छह महीने पहले यूपी की 80 सीटों में से भाजपा की 27 सीटे कूती थी। तब मैं केवल बसपा-सपा का एलायंस तय मान रहा था। अब दोनों के साथ कांग्रेस और लोकदल का साझा तय मान रहा हूं। यही नहीं भाजपा से अभी जुड़ी हुई राजभर पार्टी और अपना दल को भी ऐन मौके पर इस एलायंस से जुड़ने की संभावना मानता हूं। इसी के चलते आज के चार्ट में भाजपा की सिर्फ सात ( हां, दो अंक से नीचे) सीट आप देखेगें। नोट करके रखे कि बनारस में भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ ब्राह्मण, बनिए, भूमिहार में माहौल फैल रहा है।

इसका अर्थ यह नहीं कि 55 दिनों में योगी आदित्यनाथ, मोदी-शाह की टीम हिंदू बनाम मुस्लिम धुव्रीकरण नहीं बनवा सकती है। इन पचपन दिनों में ही वह होना है जिसमें मुसलमानों से योगी, मोदी पर खतरा आया देख हिंदू अपने आपको असुरक्षित समझने लगे। मतलब मोदी, योगी की जान को खतरे की खबरें, घटनाओं से ले कर मंदिर के लिए कूंच करते हुए हिंसा, गौहत्या जैसे मामलों में बुलंदशहर जैसा बवाल सब संभव है। बावजूद इसके अपनी यह भी थीसिस है कि जितनी ऐसी कोशिश होगी उतना बसपा, सपा, कांग्रेस, लोकदल का एलायंस पुख्ता बनेगा। इस पुख्ता एलायंस के आगे भाजपा ज्यादा से ज्यादा 15-20 सीटे जीत सकेगी। यह नामुमकिन लगता है कि कुल मतदान में भाजपा 51 प्रतिशत वोट ले कर अपनी आंधी निकलवा ले।

विधानसभा चुनाव के ताजा मनौविज्ञानिक असर में अपना मानना है कि दलित वोटों की भाजपा विरोधी उग्रता और आगे के सिनेरियों को बूझते हुए रामविलास पासवान ऐन वक्त पाला बदलेगें। पासवान का कांग्रेस-तेजस्वी स्वागत करने से हिचकेगे नहीं। मैंने इसी कॉलम में 21 दिसंबर 2017 को मुख्य आईटम की हैडिंग दी थी-'2019 में तो भाजपा को लाले!' फिर जून में यूपी के कैराना उपचुनाव के नतीजे के बाद 'आज चुनाव तो भाजपा 150!' में लिखा था कि- गुजरात विधानसभा चुनाव नतीजों और कैराना के उपचुनाव नतीजे के बाद बना फर्क तीन कारण लिए हुए है। एक, विपक्ष सचमुच एलायंस बनाने का संकल्प ले बैठा है। दूसरे, हिंदू और खासकर उत्तर प्रदेश का ब्राह्यण, पिछड़ी किसान जातियों में योगी आदित्यनाथ को ले कर खुन्नस हो गई है। तीसरा, नरेंद्र मोदी और उनका प्रचार भाजपा के लिए अब लायबिलिटी है न कि पूंजी!'

जून के कालम में मेरी लिखी लाइने थी- 'तय माने और मैं फिर वापिस दिसंबर की इस लाइन को दोहरा रहा हूं कि – 'किसी भी एंगल से सोचे मतलब प्रदेशवार मूड, एंटी इनकंबेसी, मोदी के ग्राफ, लोगों की मनोदशा की कोई भी कसौटी अपनाए 2019 का लोकसभा चुनाव 2014 जैसा कतई नहीं होगा। अगले सवा साल लोगों की मनोदशा और बिगड़नी है।'

'दिसंबर में लिखी यह लाइन छह महीने बाद जून की दो तारीख में भी जस की तस प्रासंगिक है। और सोचिएगा छह महीनेे बाद, विधानसभा चुनाव के बाद दुबारा इस लाइन पर!'

और अब विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने है। इनका अर्थ है कि पिछली दिसंबर से इस दिसंबर के एक साल में मोदी-शाह-योगी बिगड़ती हवा को सुधारने में कुछ नहीं कर सके। उलटे कांग्रेस, राहुल गांधी दमखम से उठ खड़े हुए है। भला तब अगले 55 दिन में मोदी-शाह क्या करेंगे?


लेखक हरिशंकर व्यास जी वरिष्ठ पत्रकार और नया दुनिया अखबार के संपादक है.

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