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राहुल या तो अध्यक्ष बनें या कांग्रेस को भूल जाएं

साथ ही यह भी कहा गया है कि सीडब्ल्यूसी में सबने एकमत से राहुल के अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई। सबने का मतलब इसमें वे लोग भी शामिल है जो बगावत की मुद्रा में थे।

 Shiv Kumar Mishra |  27 Aug 2020 3:11 AM GMT  |  दिल्ली

राहुल या तो अध्यक्ष बनें या कांग्रेस को भूल जाएं
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शकील अख्तर

राहुल गांधी के अनिर्णय ने आखिर गांधी नेहरू परिवार को ऐसा झटका लगवा दिया जो इससे पहले शायद ही कभी लगा हो! परिवार के आगे बढ़ाए लोगों ने ही उसके खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। बगावत पहले भी हुई। मगर दो बातें कभी नहीं हुईं। एक उन लोगों ने कभी बगावत का झंडा नहीं उठाया जिन्हें परिवार ने ही आगे बढ़ाया हो। दूसरे कमजोरी के टाइम में नहीं हुई। पार्टी 6 साल से विपक्ष में है और सामने प्रतिद्वंद्वी मजबूत है। ऐसे में जरूरत थी नेताओं को एकजुट रहने की। लेकिन इसी समय राहुल के बाद एक अच्छे रिटायरमेंट की हकदार सोनिया को भी चुनौती दे दी गई।

इतिहास में बहुत गहरे जाने का इस समय कोई मतलब नहीं है। मगर नेहरू के खिलाफ भी पार्टी में बहुत लोग थे। इन्दिरा के भी और राजीव गांधी के भी। मगर ये विरोध तब था जब ये तीनों सत्ता में थे। मगर इस समय कमजोर कांग्रेस और अस्वस्थ सोनिया पर हुआ हमला कांग्रेस इतिहास का सबसे काला अध्याय है। और निश्चित ही रूप से इसके लिए हौसला राहुल के फैसला न ले पाने की राजनीति की वजह से आया। क्या कोई सोच सकता था कि वे गुलामनबी आजाद जिन्हें इन्दिरा गांधी ने उंगली पकड़कर आगे बढ़ाया हो, जिन्हें पार्टी ने चालीस साल तक अलग अलग राज्यों से चुनाव लड़वाकर हमेशा संसद में रखा हो। हमेशा मंत्री, महासचिव, मुख्यमंत्री बनाया हो। और आम धारणा थी कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो उन्हें राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति बनाया जाएगा, वे परिवार के खिलाफ पत्र लिखने वालों में शामिल होंगे। कम लोगों को मालूम होगा कि जम्मू कश्मीर से तो आजाद बहुत बाद में संसद में आए हैं। उससे पहले कांग्रेस उन्हें महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से संसद में लाती रही। 90 के दशक में फारूक अब्दुल्ला की मदद से उन्हें पहली बार अपने गृह राज्य से राज्यसभा मिली थी। कहा जा रहा है कि उनकी राज्यसभा की अवधि खत्महो रही थी इसलिए वे पत्र कांड में शामिल हुए।

अगर यह सच है तो बहुत हैरानी की बात है कि इतना सब पाने के बाद भी एक संसद सदस्यता के लिए कोई उसी पेड़ को काटने के लिए कुल्हाड़ी रूपी कलम उठा सकता है जिसने हमेशा उसे सिर्फ छांव दी हो? हालांकि एक यही कारण नहीं बताया जा रहा। दूसरी बातें भी कही जा रही जो इससे ज्यादा सनसनीखेज हैं। मीडिया द्वारा बताई एक कहानी पर विश्वास करते हुए आजाद ने कहा था कि अगर पत्र भाजपा ने लिखवाया है साबित हो जाए तो वे कांग्रेस छोड़ देंगे। यहां यह सवाल उठाया जा रहा है कि ऐसे में अमूनन आदमी राजनीति छोड़ने की बात करता है। पार्टी छोड़ने की नहीं। पार्टी छोड़ने के बात करके आजाद क्या संकेत दे रहे हैं। कश्मीर में इस समय भाजपा को और केन्द्र सरकार को भी समर्थन की जरूरत है। वहां की स्थिति बहुत नाजुक बनी हुई है। फारूक और उमर अब्दुल्ला से प्रधानमंत्री मोदी को जितनी उम्मीदें थीं वह शायद पूरी नहीं हो रही हैं। आजाद कश्मीर के लिए एकदम उपयुक्त चेहरा हो सकते हैं। यह कहानी भी कश्मीर से लेकर दिल्ली तक चल रही है।

आजाद के बाद मुकुल वासनिक दूसरे सबसे वरिष्ठ नेता हैं जिन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले पत्र पर हस्ताक्षर किए। इनका भी कोई जनाधार नहीं है केवल परिवार ही आधार रहा है। ये भी उस ओवर रेटेड केटेगरी में शामिल है जो कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद दलित नेता के नाम पर राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति के दावेदार होते। आश्चर्य की बात यह है कि वासनिक की गिनती परिवार के सबसे वफादार लोगों में होती थी। ये भी हमेशा संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका में रहते आए हैं। अभी एक साल पहले जब राहुल ने इस्तीफा दिया था तब गैर नेहरू गांधी अध्यक्ष के लिए वासिनक सबसे बड़े दावेदार थे। अगर सोनिया न मानतीं तो वासनिक बन ही गए थे। ऐसे ही आप पत्र बम फैंकने वाले हर नेता का इतिहास उठा कर देख लीजिए एक भी अपनी दम से बना हुआ नेता नहीं मिलेगा। हर एक परिवार के सरंक्षण से आगे बड़ा है।

मगर राहुल के अनिर्णय ने इनके मन में कई शंकाएं पैदा कर दीं। इन्हें लगा कि सोनिया के बाद राहुल खुद न बनकर अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को अध्यक्ष बनवा देंगे। यह बात इन्हें मंजूर नहीं थी। ये चाहते थे कि सोनिया के बाद यदि राहुल खुद नहीं बनते तो उनकी पसंद के किसी व्यक्ति को अध्यक्ष बनना चाहिए। जैसी कि कोशिश वे एक साल पहले कर चुके थे। जिसमें मुकुल वासनिक को अध्यक्ष बनाने की योजना थी। मगर ऐन टाइम पर कांग्रेस के दूसरे नेताओं को इसकी भनक पड़ गई और उन्होंने सोनिया को कुछ समय को अध्यक्ष बनने के लिए

तैयार कर लिया। सोनिया दूसरी पारी खेलने की कतई इच्छुक नहीं थीं। मगर सबके कहने और पार्टी हित में वे मान गईं। लेकिन कांग्रेस ने एक साल में परमानेंट अध्यक्ष बनाने की कोई प्रक्रिया भी शुरू नहीं की। उधर राहुल

अपनी व्यक्तिगत बैटिंग तो खूब कर रहे थे मगर टीम की कमान संभालने को तैयार नहीं थे। मगर इस बड़े झटके के बाद वे भी हिल गए। उन्होंने गुस्से में कहा कि जब सोनिया अस्पताल में थीं तब उनसे जवाब मांगा जा रहा था! ऐसी क्या इमरजेन्सी थी? क्या वे इंताजार नहीं कर सकते थे? सोनिया कोई अपनी मर्जी से अध्यक्ष नहीं बनी थीं। इन्हीं लोगों के कहने से बनी थीं। और अब यही उनसे बीमारी की हालत में, अस्पताल में जवाबतलब कर रहे हैं।

गांव देहात की एक कहावत है कि " बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता !" अगर आपको अपनी मर्जी से पार्टी चलाना है तो यह कांटों का ताज पहनना ही होगा। नहीं तो कभी सिंधिया की, कभी पायलट की कभी 23 लेटर वारियर्स की धमिकयां सुनने को तैयार रहना पड़ेगा। कांग्रेस वर्किंग कमेटी में पारित प्रस्ताव को देखकर अब यह लगता है कि राहुल वास्तविकता को समझ गए हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि सोनिया तब तक अध्यक्ष बनी रहेंगी जब तब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का महाधिवेशन बुलाकर नया अध्यक्ष नहीं चुन लिया जाता। यह महाधिवेशन कोरोना से उत्पन्न स्थितियां समाप्त होते ही तुरंत होगा। साथ ही यह भी कहा गया है कि सीडब्ल्यूसी में सबने एकमत से राहुल के अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई। सबने का मतलब इसमें वे लोग भी शामिल है जो बगावत की मुद्रा में थे।

जाहिर है कि यह प्रस्ताव राहुल की जानकारी में बना होगा। वैसे भी सीडब्ल्यूसी की मीटिंग के बाद राहुल समर्थकों की खुशी बता रही थी कि राहुल वापस अध्यक्ष बनने के लिए तैयार होते दिख रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो यह कांग्रेस के लिए सबसे अच्छी बात होगी। मगर यह अच्छा तभी होगा जब राहुल बिना देर किए अपनी टीम बनाएंगे। इससे पहले जब वे अध्यक्ष रहे तो इस दिशा में कोई काम नहीं किया और बाद में इस्तीफा देते हुए शिकायती अंदाज में कहा की उन्हें काम नहीं करना दिया गया। राजनीति में यह कहना कोरा आदर्शवाद होता है कि पार्टी में सबको साथ लेकर चलना चाहिए। जो आपके साथ नहीं चल सकते उन्हें ढोने का कोई मतलब नहीं होता।

भारतीय राजनीति में दो सबसे ताकतवर प्रधानमंत्रियों के उदाहरण है कि उन्होंने अपनी टीम बनाई और सबसे ज्यादा सफल रहे। पहली इन्दिरा गांधी और दूसरे नरेन्द्र मोदी। भारत में राजनीति व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता से होती है। यहां एक उदाहरण और। कहा जाता है कि रिजनल पार्टियां जाति के आधार पर चलती हैं। मायावती, मुलायम, लालू के नाम इस बात को पुष्ट करने के लिए लिए जाते हैं। लेकिन सच यह है कि ज्यादातर क्षेत्रिय पार्टियां नेता के मजबूत नेतृत्व क्षमता पर चलती हैं। इसके लिए ममता बनर्जी एक बहुत उपयुक्त उदाहरण है। उन्होंने अपनी नेतृत्व क्षमता के बदौलत ही प. बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस जैसी ताकतवर पार्टियों को किनारे करने में सफलता पाई है। और अभी भाजपा से कड़ा मुकाबला कर रही हैं।

राहुल चाहें या न चाहें उन्हें अब पार्टी का नेतृत्व दोबारा संभालना होगा या कांग्रेस को भूल जाना होगा। नहीं तो जैसा कुछ लोग कह रहे हैं कि ये 23 नहीं हैं 300 हैं तो वह बात सही साबित होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। कांग्रेस के बंटने की अगर एक बार शुरूआत हो गई तो फिर वह रूकने का नाम नहीं लेगी। इस समय देश को एक मजबूत विपक्ष की सबसे ज्यादा जरूरत है। और देश में इस समय कांग्रेस के अलावा कोई अखिल भारतीय पार्टी नहीं है जो विपक्ष की भूमिका निभा सके। और कांग्रेस में राहुल के अलावा कोई ऐसा नेता नहीं है जो पार्टी को फिर से खड़ा कर सके।

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