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शिवसेना के मुख्य पत्र "सामना" के जरिये अमित शाह सवालों के घेरे में, तो साथ में एक, दो नही लगाये कई गंभीर आरोप

सामना ने लिखा- 'तीन दिनों बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शांति बनाए रखने की अपील की. एनएसए अजीत डोभाल चौथे दिन अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली की सड़कों पर लोगों से चर्चा करते दिखे. इससे क्या होगा? सवाल यह है कि इस दौरान गृह मंत्री कहां थे?'

 Sujeet Kumar Gupta |  28 Feb 2020 7:19 AM GMT  |  नई दिल्ली

शिवसेना के मुख्य पत्र सामना के जरिये अमित शाह सवालों के घेरे में, तो साथ में एक, दो नही लगाये कई गंभीर आरोप
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नई दिल्ली। दिल्ली में हुई हिंसा पर अब राजनीतिक सियासत होना शुरु हो गया है। जहां पर 39 लोगों की मौत तो लगभग 200 लोग अभी भी अस्पताल में है। लेकिन इसी बीच शिवसेना ने मुखपत्र 'सामना' के जरिए गृहमंत्री अमित शाह पर निशाना साधे हुए सवालों की झड़ी लगा ही है। शिवसेना ने 'सामना' में लिखा है कि जब दिल्ली जब जल रही थी, लोग जब आक्रोश व्यक्त कर रहे थे तब गृहमंत्री अमित शाह कहां थे? क्या कर रहे थे? ऐसा सवाल पूछा जा रहा है। दिल्ली के दंगों में अब तक 37 लोगों की बलि चढ़ गई है और सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचा है। मान लें केंद्र में कांग्रेस अथवा दूसरे गठबंधन की सरकार होती तथा विरोधी सीट पर भारतीय जनता पार्टी का महामंडल होता तो दंगों के लिए गृहमंत्री का इस्तीफा मांगा गया होता।

सामना में दिल्ली हिंसा को लेकर लिखा गया है, 'दिल्ली के दंगों में अब तक 38 लोगों की बलि चढ़ गई है और सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचा है. मान लें केंद्र में कांग्रेस या दूसरे गठबंधन की सरकार होती और विपक्ष के तौर भारतीय जनता पार्टी होती तो दंगों के लिए गृहमंत्री का इस्तीफा मांगा गया होता.'

सामना में आगे लिखा है- 'अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि भाजपा सत्ता में है और विपक्ष कमजोर हैं. फिर भी सोनिया गांधी ने गृहमंत्री का इस्तीफा मांगा है. देश की राजधानी में 38 लोग मारे गए उनमें पुलिसकर्मी भी है. केंद्र का आधा मंत्रिमंडल उस समय अहमदाबाद में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को सिर्फ नमस्ते कहने के लिए गया था.'

सामना ने लिखा- 'तीन दिनों बाद प्रधानमंत्री मोदी ने शांति बनाए रखने की अपील की. एनएसए अजीत डोभाल चौथे दिन अपने सहयोगियों के साथ दिल्ली की सड़कों पर लोगों से चर्चा करते दिखे. इससे क्या होगा? सवाल यह है कि इस दौरान गृह मंत्री कहां थे?'

दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस एस.मुरलीधर के ट्रांसफर का जिक्र करते हुए सामना में लिखा गया है, 'न्यायाधीश मुरलीधर ने जनता के मन के आक्रोश को आवाज दे दी और अगले 24 घंटे में राष्ट्रपति भवन से उनके तबादले का आदेश निकल गया. केंद्र व राज्य की सरकार की अदालत ने आलोचना की थी. यह इसी का परिणम है. सरकार ने अदालत द्वारा व्यक्त किये गए 'सत्य' को मार दिया. अदालत को भी सत्य बोलने की सजा मिलने लगी क्या?'

देश का विपक्ष बेबस है अन्यथा दिल्ली में 38 लोगों की हत्या के लिए सरकार की गर्दन पर बैठकर सवाल पूछा गया होता कि 37 लोगों की बलि चढ़ी या उन्हें बलि चढ़ाने दिया गया वो भी राष्ट्रपति ट्रंप की मौजूदगी में। ये उलझन ही है। शाहीन बाग का मामला भी सरकार खत्म नहीं कर सकी। वहां सर्वोच्च न्यायालय के मध्यस्थ नाकाम सिद्ध हुए। यदि देश की राजधानी ही सुरक्षित नहीं होगी तो फिर क्या सुरक्षित है, ऐसा सवाल उठता है। 1949 के दंगों की स्थिति इससे अलग नहीं थी।

उन्होंने कहा कि उस समय भी सरकार छुपकर बैठी थी और राजनैतिक दंगाइयों को खुली छूट मिली थी लेकिन 30-35 वर्षों के बाद उन दंगों का नेतृत्व करनेवाले जेल में गए, इसे भूलना नहीं चाहिए। राष्ट्रवाद का उन्माद और धर्मांधता की मदमस्ती ये दो प्रवृत्तियां देश को 300 वर्ष पीछे धकेल रही हैं। भड़काऊ भाषण ही राजनीति में निवेश बन गए हैं। देश की अर्थव्यवस्था साफतौर पर धराशायी हो रही है लेकिन भड़काऊ भाषण का निवेश और उसका बाजार जोरों पर चल रहा है।

केंद्र के एक मंत्री अनुराग ठाकुर, सांसद परवेश वर्मा और कपिल मिश्रा के खिलाफ मामला दर्ज करने का आदेश अब दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया है, जिन्होंने ये आदेश दिया है उस न्यायमूर्ति को ही सरकार ने सजा दे दी। वीर सावरकर के गौरव के लिए जो लोग राजनैतिक नौटंकी कर रहे हैं वे देश के गौरव के बारे में सोचें। राजधानी की हिंसा का धुआं देश का दम घोंट रहा है। उस धुएं में देश के गृहमंत्री कहीं भी दिखाई नहीं देते। चिंता करने जैसा ये मामला है!

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