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मोदी के कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान ने जब मोदी की वजह से दिया था मंत्रीमंडल से इस्तीफा

 Shiv Kumar Mishra |  9 Oct 2020 4:04 AM GMT  |  नई दिल्ली

मोदी के कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान ने जब मोदी की वजह से दिया था मंत्रीमंडल से इस्तीफा
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वीरेंद्र सिंह सेंगर

चले गये पासवान मित्रों के अलविदा होने का सिलसिला ही चल पड़ा है। ताजा बारी आई भाई राम बिलास पासवान की। वे 74 की उम्र में ही चले गये। सादर नमन! मित्र। आप बहुत याद आओगे । आपका हंसमुख चेहरा याद आता है। आपके मुंह पर आपकी तीखी आलोचना कर लेता था। आप ऊफ नहीं करते थे।झूठी दलील भी नहीं देते थे। इतना भर कहते थे ,हमारी अनन्त पीढ़ियों ने जलालत की जिंदगी जी है ,वीरेंद्र जी !सत्ता के माध्यम से वंचितों को कुछ दे पा रहा हूं। इसी चक्कर में फौरी समझौता कर लेता हूं। यह न समझना कि तुम्हारा बड़ा भाई बिक गया!देर शाम का वक्त था। पत्रकार मित्र विनोद अग्निहोत्री साथ में थे। दोनों अधिकार भाव से सवाल दागते रहे।

ये उन दिनों की बात है जब वे पाला बदलकर मोदीजी की टीम में आ गये थे। मैंने उन्हें याद दिलाया कि गुजरात दंगों की रिपोर्टिंग के बाद मैं दिल्ली लौटा था। अमर उजाला में धुंआधार रपटें छपी थीं। तब भी आप अटल सरकार में मंत्री थे।देर रात आपका फोन आया था। इतना ही बोले थे,वीरेंद्र भाई!रिपोर्ट पढ़कर तुम्हें गले लगाकर रोने का मन कर रहा है। कितना निष्ठुर था मैं, मैंने यही उलहना दिया था। पासवान जी!आप सियासी सौदागर हो। मंत्री बने बैठे हो। फोन पर नाटक कर रहे हो। आप कैबिनेट मंत्री। मैं अदना सा पत्रकार। आप ने दोस्ताना झिड़क झेल ली थी।आप के हंसने की आवाज बता रही थी कि आप मुझ पर खीझे नहीं हैं ।मैं पांच मिनट तक आपके सेक्यूलिरिज्म को कोसता रहा था।आप चुपचाप सुनते रहे थे।आपने धीरे से कहा था,मेरी आत्मा भी मुझे कचोट रही है। सुबह अच्छी खबर सुनोगे।

अगले दिन गुजरात दंगों को लेकर आपने सरकार से इस्तीफा दिया था।फिर से हम सेक्यूलर पत्रकार मित्रों के आप चहेते बन गये थे। आज सोचता हूं कि आप मन से उतने अवसरवादी नहीं थे।जितना हमारे जैसे साथी आपके बारे में समझने लगे थे। 2019में लोकसभा के चुनाव होने थे। महीनों बाद आपका फोन आया था। अगले दिन हम लोग लंच पर मिले थे। करीब एक घंटे तक बातचीत हुई थी।आप की एक बात मुझे आज भी झकझोरती है।आपने कहा था,वीरेंद्र भाई!आप किसी दलित के घर नहीं पैदा हुए हो। इसी से एक दलित के दंश को शिद्दत से नहीं महसूस कर सकते।स्कूल से कालेज तक मैंने अभाव और जातीय गालियों के दंश झेले हैं। इन्हीं लोगों की जिंदगी में खुशहाली लाने के लिए राजनीति में आया था। वर्ना पुलिस अफसर वाली नौकरी क्यों छोड़ता?अगर केवल पैसा ही कमाना होता।

23साल की उम्र में विधान सभा का उप चुनाव जीता था। वो भी एक कांग्रेसी दिग्गज को हराकर। 1987 में मेरी पहली मुलाकात हुई थी। साउथ ऐवेन्यू फ्लैट में। फिर तो लंबा साथ रहा। एक दिन पत्रकार साथी सरदार गुरु चरण साथ थे। वे भी पासवान जी के करीबी थे। लेकिन फक्कड़ फ्रीलांसर गुरु चरण अपनी फाकामस्ती में भी तीखी टिप्पणियां करने के लिए मशहूर रहे हैं। उस दिन बोले, पासवान सर,वीरेंद्र जी पूछ रहे थे कि पासवान जी ने सौ दो सौ करोड़ तो जरूर बना लिए होंगे। भाई गुरुचरण ने फंसा दिया। मैं चुप रहा। पासवान जी ने चिढ़ने के बजाए यही कहा, वीरेंद्र जी! समझते हैं । पार्टी चलाने में कितना दाम लगता है? मुझ जैसे दलित को कोई धन्नसेठ तो कुछ देगा नहीं। इसी से इधर उधर जो करना होता है ,वो पार्टी फण्ड में चला जाता है। आप लोग मेरे अपने शुभचिंतक हो, आपसे क्या छिपाना?

आपने बड़े दर्द से कहा था। इस साल नये साल पर मोबाइल पर ही बात हुई थी। आपने बगैर कुछ पूछे ही कहा था,मुझे आप जैसे दोस्तों से यही शिकायत है कि मुझे भी भगवा घराने का मान लिया है। जबकि मैं सरकार के भीतर दलितों और वंचितों की लड़ाई लड़ता हूं। मैं आज भी पुराना वाला सेक्यूलर पासवान हूं। मैंनें तंज किया था। यही कि कैबिनेट में मोदी जी के सामने कोई मंत्री मुंह खोलने का साहस नहीं करता। आप कहते हैं, संघर्ष करते हैं। आप बोले थे,किसी दिन दोनों भाई लंच पर बैठते हैं। फोन पर क्या क्या बतांऊ!यही आखिरी संवाद था आपसे। अस्पताल तो बस शिष्टाचार वश गया था। आप आई सी यू में थे। झलक भी नहीं मिली। अब आप फिर कभी न लौटने के लिए चले गये।अलविदा दोस्त!

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