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राजस्थान राजनीतिक नियुक्तियों की माथापच्ची, नियुक्तियों के बाद मचेगी जोरदार मारकाट

जिनको मंत्रिमंडल में नही लिया जाएगा, उन्हें बोर्ड या निगम में जगह दी जा सकती है। शेखावाटी के तीन विधायको का नाम इनमे अव्वल है।

 Shiv Kumar Mishra |  16 Oct 2020 6:48 AM GMT  |  जयपुर

राजस्थान राजनीतिक नियुक्तियों की माथापच्ची, नियुक्तियों के बाद मचेगी जोरदार मारकाट
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महेश झालानी

प्रदेश में असली घमासान राजनीतिक नियुक्तियों के बाद मचेगा। नियुक्तियों से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को फायदा कम और नुकसान ज्यादा होगा। जिसको पद मिल गया, वह सरकार की भले ही पैरवी नहीं करे, लेकिन पद से वंचित लोग अवश्य सरकार की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नही छोड़ेंगे। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी इस तथ्य से भलीभांति वाकिफ है। इसलिए वे पिछले दो साल से राजनीतिक नियुक्तियों को टालते आ रहे है।

उधर राजनीतिक नियुक्ति और मंत्रिमंडल विस्तार टलने से कांग्रेसी विधायकों में दिनों दिन अशोक गहलोत के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है। बाबूलाल बैरवा ने भी इसी नाराजगी के चलते सार्वजनिक रूप से सरकार पर हमला बोला है। बीएसपी के छह विधायक जिन्होंने संकट के समय अशोक गहलोत का साथ दिया था, वे भी मुँह फुलाए बैठे है। बीएसपी समेत कांग्रेसी विधायकों को उम्मीद थी कि बाड़ाबंदी समाप्त होने के साथ ही मंत्रिमंडल का विस्तार भी हो जाएगा और धड़ल्ले से होंगी राजनीतिक नियुक्तियां। देरी होने से उनके सब्र का पैमाना छलक रहा है।

सचिन पायलट खेमे के विधायकों में भी बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। उम्मीद थी कि अहमद पटेल की अध्यक्षता वाली कमेटी अविलम्ब उनकी समस्याओं का हल करते हुए मंत्री पद पर आसीन करा देगी। लेकिन यह कमेटी अब खमोश होकर बैठी है। कमेटी के पास एमपी और बिहार चुनाव का बहाना है। कमेटी की बैठक इसी सप्ताह होने वाली थी। लेकिन अजय माकन के विदेश जाने से वह टल गई। बैठक कब होगी, तय नही है।

पायलट गुट के विधायकों को अब यह अहसास होने लगा है कि उन्होंने अशोक गहलोत से पंगा लेकर अच्छा नही किया। जोड़-बाकी करने पर निचोड़ यही निकलता है कि पायलट का साथ देने से उनको नुकसान के अलावा कुछ हासिल नही हुआ। पायलट की पीसीसी चीफ और उप मुख्यमंत्री की कुर्सी स्वाहा होगई और विश्वेन्द्र सिंह तथा रमेश मीणा को भी मंत्री पद गंवाना पड़ा। हाथ मे अभी तक आया केवल बाबाजी का ठुल्लू।

आज पायलट समर्थकों की हालत अछूत जैसी होगई है। जो विधायक धड़ल्ले से सीएम से मिलने जाते थे, आज वे नजर मिलाने के भी काबिल नही रहे है । जिस प्रकार एमपी में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक विधायक निराश है। कमोबेश वही हालत सचिन पायलट के बागी विधायकों की है। बेचारे पीसीसी कार्यालय में भी जाने में संकोच करने लगे है। गहलोत खेमे के विधायक उनसे नजरें भी नही मिलाते है। मंत्रियों से काम कराने के लिए अब उनमें नैतिक साहस नही बचा है।

चूंकि अहमद पटेल वाली कमेटी फिलहाल निष्क्रिय है। इसलिए गहलोत अपने लोगों को पद बांटने में लगे हुए है। आरपीएससी में जो नियुक्तियां हुई है, उसका संदेश अच्छा नही गया है। भूपेंद्रसिंह पहले डीजीपी रहे और अब उनको आरपीएससी का चेयरमैन बनाकर छह माह और कार्य करने का इनाम दे दिया। उधर राहुल गांधी को "पप्पू" के नाम से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुख्यात करने वाले कुमार विश्वास की पत्नी मंन्जु सैनी उर्फ मंन्जु शर्मा को सदस्य बनाकर गहलोत ने व्यर्थ ही विवाद पैदा कर दिया है। मंन्जु को सिर्फ इसलिए आरपीएससी का सदस्य बनाया गया है क्योंकि वह जाति से माली है।

ज्ञात हुआ है कि गहलोत अब कुमार विश्वास को पार्टी में लाकर राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाने के अभियान में जुट गए है। भविष्य में कुमार विश्वास को गहलोत अजमेर लोकसभा सीट से कांग्रेस का प्रत्याशी भी बनवा सकते है। सचिन पायलट को पटखनी देने की यह दूरगामी योजना बताई जा रही है। एसीएस निरंजन आर्य की पत्नी संगीता की नियुक्ति से भी कांग्रेसियों में गहरी नाराजगी है। अफसर पहले से ही निरंजन आर्य की दखलंदाजी से खफा है। सीएमओ में इनका पूरा हस्तक्षेप है।

कहने को जसवंत राठी को पत्रकार कहा जा रहा है। जबकि इनका पत्रकारिता से दूर का भी ताल्लुक नही है। ये पहले स्व भीमसेन गर्ग के अखबार महका भारत मे मैनेजर थे। बाद में अम्बर अखबार से जुड़ गए। यहीं रहते हुए इन्होंने अपना अधिस्वीकरण करवाया। इनकी नियुक्ति को पत्रकारिता के क्षेत्र में आश्चर्य से देखा जा रहा है। कृषि मंत्री लालचंद कटारिया की मेहरबानी से ये इस पद पर काबिज हुए है। यह कहना कि राठी पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करेंगे, सिरे से बेमानी है।

गहलोत जानते है कि देर सवेर उन्हें पायलट के लोगों को भी एडजस्ट करना होगा। नियुक्तियों में देरी का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है। अगर पायलट के लोगों को समायोजित किया जाता है तो गहलोत गुट के वे वफादार विधायक बगावत का झंडा उठा सकते है जिन्होंने संकट के दौर में एक माह तक बाड़ेबंदी में परिवार से दूर रहकर समय व्यतीत किया । उस वक्त गहलोत ने आश्वस्त किया था कि सभी वफादारों का सूद सहित अहसान चुकाया जाएगा। गहलोत की स्थिति फिलहाल सैंडविच जैसी होगई है। नियुक्ति करें तो मुसीबत और नही करे तब और भी ज्यादा मुसीबत। यानी "काणी का ब्याह में कौतक ही कौतक।"

बताया जा रहा है कि सरकार ने नियुक्तियां देने को लेकर अपनी सारी तैयारी पूरी कर ली है। आवेदनों को वर्गीकृत करते हुए सलीके के साथ कम्प्यूटराइज कर लिया गया है। साथ ही इन आवेदन पत्रों के साथ उन नेताओं के पत्र नत्थी है जिन्होंने सिफारिश की है। वास्तविक संख्या का तो ज्ञात नही हुई है। लेकिन मोटे तौर पर विभिन्न पदों के लिए करीब 75 हजार आवेदन आये है।

राजस्थान में करीब 52 बोर्ड, आयोग, समिति और अकादमियों में नियुक्तियां दी जाएंगी। इनमें से दो आयोग और एक बोर्ड में अध्यक्ष के साथ उपाध्यक्ष भी लगाए जाएंगे। राज्य स्तरीय इन पदों पर संभवत: राज्य सरकार बड़े नेताओं को ही मौका देगी। सूत्रों की मानें तो बड़े नेताओं में कुछ विधायकों को भी पद दिया जा सकता है। जिनको मंत्रिमंडल में नही लिया जाएगा, उन्हें बोर्ड या निगम में जगह दी जा सकती है। शेखावाटी के तीन विधायको का नाम इनमे अव्वल है।

कई नेता तो जयपुर से लेकर दिल्ली तक परेड कर चुके हैं। माना जा रहा है कि राज्य में जो राजनीतिक नियुक्तियां दी जाएंगी, उनमें कांग्रेस आलाकमान तथा अजय माकन, अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल, अविनाश पांडे, सुरजेवाला सहित अनेक केंद्रीय नेताओ का भी दखल रहेगा। इसको देखते हुए नेता प्रदेश के बड़े नेताओं से पैरवी कराने के साथ ही दिल्ली में भी केन्द्रीय नेताओं से सिफारिश को लेकर भागदौड़ में पीछे नहीं हैं। कई छुटभैये नेता भी बायोडाटा लेकर विधायक और मंत्रियों के इर्द-गिर्द घूम रहे है।

देरी से नियुक्ति से नेताओं का रोष भी सामने आ चुका है। विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में राजनीतिक नियुक्तियों का मामला दिल्ली तक उठा है। नेताओं की हमेशा शिकायत रही है कि पार्टी सत्ता में आने पर अक्सर राजनीतिक नियुक्तियां सरकार के कार्यकाल के अंतिम समय में करती हैं। इससे समिति, बोर्ड, आयोग और अकादमिकों में काम करने का पूरा मौका नहीं मिल पाता । यह मामला पहले राहुल गांधी के पास भी लोग उठा चुके है। ऐसे में कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं का मानना है कि नियुक्ति जल्दी होनी चाहिए। लेकिन नियुक्तियां होंगी कब, इस पर फिलहाल कयास ही लगाए जा सकते है। वैसे जानकारों का मानना है कि आलाकमान कोई दखल दे, उससे पहले गहलोत ज्यादा से ज्यादा अपने लोगों को खपाने के मूड में है। कई निगम के लिए नाम तय हो चुके है। शीघ्र ही राजभवन से आदेश जारी होने की संभावना है। ज्यादातर नेता पर्यटन विकास निगम, डेयरी फेडरेशन और आवासन मंडल के लिए जोर लगा रहे है। ये पद कई बेकार मंत्रियों से बेहतर है। कई नए निगम, आयोग आदि का भी सृजन किये जाने की संभावना है। भिवाड़ी औद्योगिक विकास प्राधिकरण की भी मांग उठ रही है।

कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में आने के साथ ही राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर कवायद शुरू कर दी थी। लेकिन लोकसभा चुनाव के चलते रोक लगा दी गई है । उस दौरान सभी विधायकों से जिलों में नियुक्तियों को लेकर 50-50 नाम मांगे गए थे। सरकार राज्य में हजारों की संख्या में राजनीतिक नियुक्तियां दे सकती है । ऐसे में राज्य स्तरीय 52 पदों के साथ ही बड़ी संख्या में जिलों में तमाम कमेटियों में नियुक्तियां दी जाएंगी।

निम्नांकित बोर्ड, प्राधिकरण, निगम और अकादमियां भी है जहां राजनीतिक नियुक्तियां होनी है -

जन अभाव अभियोग निराकरण समिति, समाज कल्याण बोर्ड, उपाध्यक्ष 20 सूत्री कार्यक्रम, राजस्थान आवासन मण्डल, अल्पसंख्यक आयोग, मदरसा बोर्ड, वक्फ बोर्ड, राज्य महिला आयोग, डांग विकास बोर्ड, खादी ग्रामोद्योग बोर्ड, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राज्य क्रीड़ा परिषद, राज्य बुनकर सहकारी संघ लिमिटेड, पर्यटन विकास निगम, किसान आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, जोधपुर विकास प्राधिकरण, राज्य बीज निगम, पशु कल्याण बोर्ड, जयपुर विकास प्राधिकरण, राज्य स्तरीय सलाहकार समिति श्रम विभाग, राजस्थान फाउण्डेशन, राजस्थान सफाई कर्मचारी आयोग, राज्य अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग, साहित्य अकादमी, ऊर्दू अकादमी, भाषा-साहित्य व संस्कृति अकादमी, बृजभाषा अकादमी, ललित कला अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, सिंधी भाषा अकादमी, सहकारी डेयरी फैडरेशन, वक्फ विकास परिषद, राज्य हज कमेटी, राज्य सहकारी भूमि विकास बैंक लिमिटेड, सार्वजनिक प्रन्यास मण्डल, जनजाति आयोग, सेंटर फॉर डवलपमेंट ऑफ वॉलंटरी सेक्टर, सीनियर सिटीजन बोर्ड, मगरा क्षेत्रीय विकास बोर्ड, भूदान बोर्ड, युवा बोर्ड, शिल्प एवं माटी कला बोर्ड, लघु उद्योग विकास निगम, नि:शक्तजन आयोग, गौ-सेवा आयोग, पशु पालक कल्याण बोर्ड, मेला प्राधिकरण, विमुक्त घुमंतू एवं अद्र्ध घुमंतू जाति कल्याण बोर्ड, राज्य क्रीड़ा परिषद, गंगानगर शुगर मिल, अंतरराज्यीय जल विवाद प्राधिकरण आदि ।

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