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13 को ही शिवरात्रि मनाना शास्त्र सम्मत है : प्रो.विनय कुमार पाण्डेय BHU

 शिव कुमार मिश्र |  2018-02-11 10:11:33.0  |  वाराणसी

13 को ही शिवरात्रि मनाना शास्त्र सम्मत है : प्रो.विनय कुमार पाण्डेय BHU

आशुतोष त्रिपाठी

वाराणसी। वैसे तो प्रतिवर्ष शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है परन्तु इस वर्ष कुछ लोगों के द्वारा इस पर्व की तिथि को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है।
इस सम्बन्ध में कुछ लोग 13 फरवरी तो कुछ लोग 14 फरवरी को इसके आयोजन एवं अनुष्ठान की बातें कहकर लोगों को भ्रम में डाल दिया है जबकि ज्योतिष विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने 27 जनवरी को ही प्रस्तुत विषय का संज्ञान लेते हुए संकाय प्रमुख प्रो0 चन्द्रमा पाण्डेय की अध्यक्षता में दिनांक 27:1:2018 को एक बैठक आयोजित किया था जिसमें पूर्व ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो0 रामचन्द्र पांडेय, प्रो0 चंद्रमौलि उपाध्याय, प्रो0 विनय कुमार पाण्डेय, प्रो0 गिरिजा शंकर शास्त्री, प्रो0 रामजीवन मिश्र , डाॅ0 शत्रुघ्न त्रिपाठी, डाॅ0 सुभाष पाण्डेय, वेदान्त विभागाध्यक्ष प्रो0 धनंजय कुमार पाण्डेय, डाॅ0 राहुल मिश्र आदि ने काशी की प्रचलित लगभग सभी पंचांगों को आधार बनाकर 13 को महा शिवरात्रि मनाने का निर्णय धर्मशास्त्रानुसार माना है।
काशीविद्वत परिषद के अध्यक्ष पं0 रामयत्न शुक्ल जी एवं परिषद में ज्योतिष के विशेषज्ञ एवं उपाध्यक्ष प्रो0 रामचन्द्र पांडेय जी सहित परिषद के सभी विद्वानों ने भी 13 फरवरी को ही शिवरात्रि मनाने का निर्णय दिया है ।
परन्तु कुछ लोग शास्त्र का नाम लेकर अपना दोष समाज पर मढ़ते हुए शिवरात्रि की भ्रमपूर्ण व्यवस्था दे रहे है। जबकि सनातन शास्त्रीय व्यवस्था में व्रत पर्वों का ठीक-ठीक निर्धारण ज्योतिष एवं धर्मशास्त्र के सामञ्जस्य से ही सम्भव है। इसीलिए काशी से प्रकाशित सभी पचांगकार एवं विद्वानों ने 13 को ही शिवरात्रि मनाने की शास्त्रीय व्यवस्था दी है।
निर्णयकर्ता विद्वानों को शिवरात्रि का निर्णय करते हुए निम्न बातो को ध्यान में रखना चाहिए....
*प्रमाण*- फाल्गुन कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि होती है। परन्तु जिस दिन प्रदोष एवं निशीथ दोनों कालों में चतुर्दशी मिले उसी दिन शिवरात्रि माननी चाहिए, प्रदोष और निशीथ दोनों काल मे एक साथ अनुपलब्धता होने पर इसके निर्णय के प्रसंग में कुछ आचार्य प्रदोष व्यापिनी चतुर्दशी तो कुछ निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी में महाशिवरात्रि मानते है। परन्तु अधिक वचन निशीथ व्यापिनी चतुर्दशी के पक्ष में ही प्राप्त होते है।
कुछ आचार्यों जिन्होने प्रदोष काल व्यापिनी को स्वीकार किया है वहाॅ उन्होने प्रदोष का अर्थ 'अत्र प्रदोषो रात्रिः' कहते हुए रात्रिकाल किया है। ईशान संहिता में स्पष्ट वर्णित है कि फाल्गुनकृष्णचतुर्दश्याम् आदि देवो महानिशि। शिवलिंगतयोद्भूतः कोटिसूर्यसमप्रभः।। तत्कालव्यापिनी ग्राहृा शिवरात्रिव्रते तिथिः।।' फाल्गुनकृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि में आदिदेव भगवान शिव लिंग रूप में अमितप्रभा के साथ उद्भूूूत हुए अतः अर्धरात्रि से युक्त चतुर्दशी ही शिवरात्रि व्रत में ग्राह्य है। इस वर्ष 13 को केवल निशीथ तो 14 को केवल प्रदोष काल में चतुर्दशी मिल रही है।
अर्थात 13/02/2018 ई. को चतुर्दशी का आरम्भ हृषिकेश पंचांग में रात्रि 10 : 22 बजे हो रहा है तथा इसकी समाप्ति अग्रिम दिन दिनांक 14/02/2017 ई. को रात्रि 12: 17 मिनट पर हो रही है। तथा विश्व पंचांग में इसका आरम्भ 13 को 10 :05 बजे और समाप्ति 14 को 12: 02 बजे हो रही है अन्य पंचांगों में भी चतुर्दशी का लगभग यही काल है अतः 'एकैक व्याप्तौ तु निशीथेन निर्णयः'' इस धर्मशास्त्रीय वचन के अनुसार चतुर्दशी 13 फरवरी को निशीथ काल एवं 14 फरवरी को प्रदोष काल में प्राप्त हो रही है अतः ऐसी स्थिति में शास्त्र वचनों के अनुसार 13 का ही निर्णय घटित हो रहा है।
निशीथ का अर्थ सामान्यतया लोग अर्धरात्रि करते हुए 12 बजे रात्रि से लेते है जैसा कि आज के निर्णय में भी विद्वान लेखक ने लिया है परन्तु निशीथ काल के निर्णय हेतु भी दो वचन मिलते है, माधव ने कहा है कि रात्रिकालिक चार प्रहरों में द्वितीय प्रहर की अन्त्य घटी एवं तृतीय प्रहर के आदि की एक घटी को मिलाकर दो घटी निशीथ काल होते है। मतान्तर से रात्रि कालिक पन्द्रह मुहूर्त्तो में आठवां मुहूर्त निशीथ काल होता है।
अतः इस वर्ष 13 फरवरी को निशीथकाल 11: 34:30 बजे से 12: 26: 00 बजे तक तथा 14 फरवरी 11:35:38 बजे से 12:27:02 बजे तक तथा प्रमाणान्तर दोनों दिवसों में रात्रि 11 बजे से 01 बजे तक हो रहा है। अतः ''परे द्युः प्रागुक्तार्धरात्रस्यैकदेशव्याप्तौ पूर्वेद्युः'' वचन के अनुसार 14 फरवरी को पूर्ण निशीथ काल (रात्रि 11:35:38 से 12: 27: 02 बजे तक) के पूर्व ही हृषिकेश पंचांग के अनुसार 12:17 मिनट पर तथा विश्व पंचांग के अनुसार 12:02 बजे चतुर्दशी समाप्त हो जाने से पूर्ण निशीथ व्यापिनी नहीं मानी जा सकती। अतः स्पष्ट धर्मशास्त्रीय वचनानुसार दिनांक 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि व्रतोत्सव मनाया जाना शास्त्रोचित है। क्योंकि धर्मसिंधु में शिवरात्रि व्रत का पारणा चतुर्दशी में सावन दिन की पूर्ति होने पर प्रातः काल करने का आदेश है अमावस्या में या अर्धरात्रि में नहीं इसी आशय से काशी के महत्वपूर्ण पंचाङगो मे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित श्रीविश्वपञ्चाग एवं शिवमूर्ति हृषीकेशपंचांग, आदित्य पंचांग ,महावीर पंचांग, अन्नपूर्णा पंचांग आदि में भी दिनांक 13 फरवरी को ही महाशिवरात्रि लिखा गया है।
भ्रम को दूर करते हुए ज्योतिष विभाग,बीएचयू के
प्रो.विनय कुमार पाण्डेय ने निष्कर्ष के तौर बताया कि धर्मशास्त्र के नियमों का अनुपालन करते हुए दिनांक 13 फरवरी को ही काशी एवं आस पास के क्षेत्रों में महाशिवरात्रि मनाना शास्त्र सम्मत है।

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