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सृष्टि प्रक्रिया: एक विश्लेषण -डाँ राहुल मिश्र

सृष्टि प्रक्रिया: एक विश्लेषण -डाँ राहुल मिश्र
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सिद्धान्तमौपनिषदं शुद्धान्तं परमेष्ठिन:।शोणाधरं मह: किञ्चित् वीणाधरमुपास्महे।।

सिद्धान्त, संहिता व होरा रूप त्रिस्कन्ध ज्योतिष त्रिविक्रम के तीन पग के समान ब्रह्माण्ड को अभिव्याप्त करता है। आध्यात्मिक एवं भौतिक दोनों दृष्टियों का समन्वयात्मक विवेचन ही ज्योतिषशास्त्र है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड का विस्तार एवं ब्रह्माण्ड का लय तीनों ही कालाश्रित हैं। निश्चित काल में ब्रह्माण्ड की मूलभूत शक्तियाँ आविर्भूत होती हैं तत्पश्चात् सृष्टि प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। ''सूर्याच्चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।'' इस श्रुति के अनुसार ब्रह्माण्डोत्पत्ति की एक प्रक्रिया एवं क्रम है,उसी के अनुरूप उत्पत्ति एवं लय का निरन्तर क्रम चलता रहता है। सांख्य दर्शन भी सृष्टि प्रक्रिया के नियम क्रम को ही स्वीकार करता है। इसका समर्थन ज्योतिषशास्त्र के महान् गणितज्ञ भास्कराचार्य भी करते है। यथा-

यस्मात् क्षुब्धप्रकृतिपुरुषाभ्यां महानस्य गर्भेऽ-हंकारोऽभूत् खकशिखिजलोर्व्यस्तत: संहतेश्च।।१

सृष्टि क्रम में काल का महत्त्व भी अन्यतम है। इसके निमित्त काल का परिचय देते हुए सूर्यसिद्धान्त में कहा गया है-लोकानामन्तकृत् काल: कालोऽन्य: कलनात्मक:।।२

लोक अर्थात् पिण्ड अथवा ब्रह्माण्ड का विनाश करने वाला एक प्रकार का काल होता है। अन्य अर्थात् दूसरा काल मापक (परिमाण) के रूप में व्यवहृत होता है।

पाञ्चभौतिक सृष्टि के निर्माण एवं नियमन में ग्रहों की महत्त्वपूर्ण भूमिका परिलक्षित होती है। इस विषय में सूर्यसिद्धान्त में स्वयं भगवान् सूर्य ने कहा है-

अग्निषोमौ भानुचन्द्रौ ततस्त्वङ्गारकादय:।

तेजोभूखाम्बुवातेभ्य: क्रमश: पञ्च जज्ञिरे।।३

सूर्य व चन्द्रमा की उत्पत्ति की प्रामाणिकता श्रुति कथित 'अग्निसोमात्मकं जगत्' से भी हो जाती है तथा दोनों ही भूमण्डल को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। इसके पश्चात् तेज, पृथ्वी, आकाश, जल और वायु महाभूतों के प्रतिनिधि ग्रह मङ्गल, बुध,बृहस्पति, शुक्र और शनि के रूप में प्राप्त होते हैं तथा ये उन भूत तत्त्वों के आधार पर ही वायु, वर्षा, विद्युत, वृष्टि, भूकम्पादि प्राकृतिक उत्पात के रूप समस्त भूमण्डल पर अपना प्रभाव डालते है।

तत्पश्चात् सृष्टि उत्पत्ति के विषय में कई पुराणों में विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है,जिसके अनुसार संभवत: भिन्न-भिन्न नामों के साथ एक परम सत्ता को सृष्टि कर्त्ता के रूप में बताया गया है। इस विषय में विष्णुपुराण में कहा गया है-

विष्णो: स्वरूपात् परतो हि ते द्वे रूपे प्रधानं पुरुषश्च विप्र।

तस्यैव तेऽन्येन धृते वियुक्ते रूपान्तरं यद् द्विज कालसंज्ञम्।।४

अर्थात् विष्णु के परम स्वरूप से प्रधान और पुरुष दो रूप होते हैं और विष्णु के एक तृतीय रूप कालात्मक रूप के द्वारा ये दोनों सृष्टि उत्पत्ति के लिए संयुक्त होते है तथा प्रलय के लिए वियुत होते हैं। परम सत्ता विष्णु कालशक्ति के द्वारा ही विश्व की सृष्टि तथा प्रलय किया करते है इसमें विषयों का रूपान्तरण या बदलना ही काल का आकार५है। काल तो स्वयं अनादि, अनन्त तथा निर्विशेष है। उसी को निमित्त बनाकर भगवान् खेल-खेल में अपने आप ही को सृष्टि रूप में प्रकट कर देते हैं। पहले यह समग्र विश्व भगवान् की माया से लीन होकर ब्रह्मरूप में स्थित था। उसी अव्यक्त मूर्त्त काल के द्वारा भगवान् ने पुन: पृथक् रूप से प्रकट किया।

पुराण के अनुसार यह विश्व अनादि तथा अनन्त है। इस समय में वह जैसा है, वह पहले भी वैसा ही था और आगे भी वह इसी रूप में रहेगा। यथा-

यथेदानीं तथाग्रे च पश्चादप्येतदीदृशम्।।६

सृष्टि के प्रकार-

पुराणों में सृष्टि के नव प्रकार बतलाये गये हैं जिन्हें नवसर्ग भी कहा जाता है। सर्ग मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं- (१) प्राकृत सर्ग (२) वैकृत सर्ग तथा (३) प्राकृत वैकृत। इन्हीं तीन सर्गों में अन्तर्भूत कुल नौ सर्ग होते हैं।७ प्राकृत सर्ग के विषय में पुराणों का कथन है कि प्राकृत सर्ग अबुद्धिपूर्वक होता है,अर्थात् उसकी सृष्टि नैसर्गिक रूप में होती है और उसके निमित्त ब्रह्मा को अपनी बुद्धि या विचार को कार्यरूप में लाने की आवश्यकता नहीं होती है। जबकि वैकृतसर्ग इसके विपरीत बुद्धिपूर्वक होता है, अर्थात् ब्रह्मा खूब सोच-समझकर इस सर्ग के प्रकारों का निर्माण करते हैं।

प्राकृत सर्ग-

(१) ब्रह्मसर्ग- महत् तत्त्व के सर्ग को ब्रह्मा का प्रथम सर्ग कहते हैं। सांख्य-दर्शन के अनुसार बुद्धि या महत्तत्त्व ही प्रकृति-पुरुष के संयोग का प्रथम परिणाम है। 'ब्रह्मसर्ग' में ब्रह्मन् शब्द गीता के अनुसार महत् ब्रह्म अर्थात् बुद्धितत्त्व का बोधक है।८

(२) भूतसर्ग- पञ्च तन्मात्राओं की सृष्टि का यह अभिधान है। तन्मात्राएँ पृथिव्यादि पञ्च भूतों की अत्यन्त सूक्ष्मावस्था के द्योतक तत्त्व हैं। इन्हें सांख्य दर्शन में 'अविशेष' कहा गया है।

(३) वैकारिक सर्ग- इन्द्रिय सम्बन्धी सृष्टि का यह नाम है। सांख्यशास्त्राभिमत प्रक्रिया यहाँ पुराणों को अभिमत है कि अहंकार के तामस रूप से तो पञ्च तन्मात्राओं का जन्म होता है तथा सात्त्विक रूप से इन्द्रियों का जन्म होता है। राजस रूप दोनों की सृष्टि में समान भाव से क्रियाशील रहता है, और इसीलिए उस रूप से किसी पदार्थ का उदय नहीं होता है। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा उभयरूपात्मक संकल्प-विकल्पात्मक मन को मिलाने से इन्द्रियों की संख्या एकादश होती है।

वैकृत सर्ग-

(४) मुख्यसर्ग- विष्णुपुराण के कथनानुसार (१/५/३-४) सर्ग के आदि में ब्रह्माजी के पूर्ववत् सृष्टि का चिन्तन करने पर पहले पञ्चपर्वा अवि‍द्या के रूप में अबुद्धिपूर्वक तमोगुणी सृष्टि का आविर्भाव हुआ। अविद्या के पाँच पर्व या प्रकार है- तम (अज्ञान), मोह, महामोह (भोगेच्छा), तामिस्र (क्रोध) तथा अन्धतामिस्र (अभिनिवेश)। पुन: ब्रह्माजी के ध्यान करने पर जो सृष्टि हुई वह ज्ञानशून्य, भीतर-बाहर से तमोमय तथा वृक्ष, गुल्म, लता, तृण, वीरुध् रूप पाँच प्रकार के जड़ पदार्थों की थी। इस जड़सृष्टि को मुख्यसर्ग के नाम से इसलिए अभिहित किया गया है क्योंकि भूतल पर चिरस्थायिता की दृष्टि से पर्वतादिकों की मुख्यता है।९

(५) तिर्यक् सर्ग- ब्रह्मा ने इस सृष्टि को पुरुषार्थ के लिए असाधिका जानकर पुन: ध्यान किया, तो तिर्यग्योनि के जीवों का उदय हुआ। तिर्यक् योनि के प्राणी वायु के समान तिरछी गति से चलते हैं। इसमें पक्षी तथा पशु आते है। ये सभी प्राय: तमोमय (अज्ञानी),विवेक से रहित, अनुचित मार्ग का अवलम्बन करने वाले और विपरीत ज्ञान को ही यथार्थ ज्ञान मानने वाले होते हैं। ये सभी अहंकारी,अभिमानी, अट्ठाइस प्रकार के वध (अशक्ति) से युक्त, अन्त:प्रकाश तथा परस्पर में एक-दूसरे की प्रवृत्ति को न जानने वाले होते हैं। स्थावर सृष्टि के उपरान्त जङ्गम सृष्टि का यह प्रथम रूप यहाँ दृष्टिगोचर होता है।

(६) देवसर्ग- तिर्यक्योनि की सृष्टि से ब्रह्मा को प्रसन्नता नहीं हुई। उनकी प्रसन्नता का हेतु वह सर्ग है, जो परम पुरुषार्थ अर्थात् मोक्ष का साधक सिद्ध हो। तिर्यक् स्रोत का सर्ग इस तात्पर्य में सहायक न होने से उन्होंने ऊर्ध्व स्रोत वाले प्राणियों का सर्जन किया। यह ऊर्ध्व लोक में निवास करने वाला सात्त्विक वर्ग है। इस सृष्टि के प्राणी विषय सुख की प्रीति से सम्पन्न होते हैं, बाह्य तथा आभ्यन्तर दृष्टि अर्थात् प्रकाश से युक्त होते हैं।

(७) मानुष सर्ग- पूर्व सर्ग भी ब्रह्माजी की दृष्टि में पुरुषार्थ का असाधक ही निकला। इसलिए सत्य संकल्प ब्रह्मा ने फिर अपने ध्यान से एक नवीन प्राणिवर्ग का निर्माण किया, जो पृथ्वी पर ही भ्रमण करने वाले जीव थे। इनमें सत्त्व, रज तथा तम- इन तीनों गुणों का आधिक्य रहता है। इस वैशिष्ट्य के कारण वे दु:ख बहुल होते हैं, वे अत्यन्त क्रियाशील हैं- सदा कार्य में संलग्न रहते हैं तथा बाह्य-आभ्यन्तर ज्ञान से सम्पन्न होते हैं। इस सर्ग के प्राणी 'मनुष्य'कहलाते हैं।१०

(८) अनुग्रह सर्ग- विष्णुपुराण ने इसे सात्त्विक-तामस कहकर केवल सामान्य संकेत कर दिया है।११ इसके स्वरूप का निर्देश मार्कण्डेयपुराण१२ में स्पष्ट रूप से किया गया है, जहाँ यह चार प्रकार का बतलाया गया है- विपर्यय, सिद्धि, शान्ति तथा तुष्टि। वायुपुराण में इन चारों की व्यवस्था भी इसी प्रकार की गयी है- स्थावरों में रहता है विपर्यास, तिर्यग्योनि में शक्ति, मनुष्यों में सिद्धि तथा देवों में तुष्टि। सांख्य दर्शन में यह प्रत्यक्ष सर्ग कहा गया है, जिसके चार भेद विपर्यय,अशक्ति, तुष्टि तथा सिद्धि के नाम से मिलते है।१३ परन्तु वायुपुराण, समस्त प्राकृतसर्ग प्रकृति के अनुग्रह से जायमान होने के कारण इसे अनुग्रह सर्ग ही मानता है।

(९) कौमार सर्ग- यह सर्ग प्राकृत-वैकृत उभयात्मक माना गया है तथा कौमार शब्द से सनत्कुमार के उदय का संकेत है, क्योंकि भागवत् महापुराण में कौमार सर्ग शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया गया है।१४सनत्कुमार भगवान् विष्णु के ही अन्यतम अवतार माने गये हैं।१५

कौमार सर्ग के विषय में टीकाकारों में ऐकमत्य नहीं है। विश्वनाथ चक्रवर्ती का कथन है कि 'ध्यानपूत मन से ही अन्य व्यक्तियों की सृष्टि हुई' – यह कथन इसका प्रमाण है कि कुमारों की सृष्टि भगवद् ध्यानजन्य है तथा भगवद् जन्य भी है और इसी के कारण वे प्राकृत-वैकृत कहे गये हैं।१६ सुबोधिनी में वल्लभाचार्यजी ने इन्हें देव और मनुष्य मानकर इस द्विविधत्व का हेतु खोज निकाला है। इसका भागवत के निम्बार्की व्याख्याकार शुकदेवाचार्य ने खण्डन किया है कि सनत्कुमार कभी मनुष्यकोटि में नहीं माने गये हैं। ये ज्ञानभक्ति-सम्प्रदाय के प्रवर्तक है। इनका एक बार जन्म तो ब्रह्मा से हुआ तथा प्रत्यहं प्रादुर्भाव होने से ये चिरस्थायियों में अन्यतम परिगणित किये गये हैं।

प्राणियों में असुर, सुर, पितर तथा मनुष्य मुख्य होते हैं। इसलिए इनकी उत्पत्ति का प्रकार भी पुराणों में अतीव सुन्दरता के साथ बताया गया है। असुरों की उत्पत्ति तब हुई जब प्रथमत: ब्रह्माजी के मनोभाव में तमोगुण की अधिकता हुई और उसी समय उनके जंघा से असुर उत्पन्न हुए तथा उस काल को रात्रि के रूप में माना गया। असुरों के उत्पत्ति के पश्चात् ब्रह्माजी ने उस तामसिक शरीर का त्याग कर सात्त्विक शरीर को ग्रहण किया तथा उसी समय सत्‍त्‍व से परिपूर्ण उनके मुख से सुर उत्पन्न हुए तथा उस काल को दिन की संज्ञा दी गई। तत्पश्चात् आंशिक सत्त्वमय शरीर को धारण करने के बाद उनके पार्श्व से पितरों की उत्पत्ति हुई, जिसे संध्या काल माना गया। अन्त में रज से परिपूरित शरीर के माध्यम से मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, जो प्रात:काल के रूप में व्यवहृत है। इस प्रकार चारों मुख्य प्राणियों से सम्बन्धित चार काल-विभाग भी बने जो उन प्राणियों के उनके काल में उनकी प्रबलता को प्रकट करते है। यथा- असुरों को रात्रि काल में,सुरों को दिन काल में, पितरों को सायं काल में तथा मनुष्यों को प्रात: काल में बलाधिक्य रहता है।

पुराणों में प्रमुख रूप से तीन अलग-अलग सृष्टियों का उल्लेख प्राप्त होता है- (१) ब्राह्मी सृष्टि, (२) मानसी सृष्टि एवं (३) रौद्री सृष्टि। प्रधान रूप से सृष्टि सर्जन का कार्य तो ब्रह्मा जी का ही है परन्तु त्रिदेवों (विष्णु-ब्रह्मा-रुद्र) का इसके उत्पादन में सहयोग रहता है। जैसे भगवान् विष्णु से सृष्टि हेतु प्रेरणा का प्राप्त होना तथा रुद्र द्वारा अर्धनारी-स्वरूप अपने शरीर का दो विभाग कर नर तथा नारी (दम्पत्ति) की सृष्टि करना।

प्रलय- यह चार प्रकार का होता है-१७ (१) नैमित्तिक (ब्राह्म) प्रलय, (२) प्राकृत प्रलय (महाप्रलय), (३) आत्यन्तिक (सम्पूर्ण) प्रलय एवं (४) नित्य (दैनन्दिन) प्रलय। यह व्यापक विषय है अत: इसकी चर्चा भविष्य में स्वतन्त्र लेख के माध्यम से करने का प्रयास करूँगा।

इस प्रकार हम पाते है कि ज्योतिष शास्त्र में सृष्टि उत्पत्ति, विकास एवं लय तीनों के मूल में काल एक निश्चित परिमाण के साथ निरन्तर गतिशील है। जिसकी प्रवाहनित्यता को सम्पूर्ण सृष्टि प्रक्रिया का नियामक भी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा। संभवत: वेद,पुराणादि में वर्णित सृष्टि उत्पत्ति के कारणभूत उस परम ईश्वर की सत्ता के होने अथवा न होने की स्थिति में भी काल की नित्यता बनी रहती है। अत: काल को सर्वोपरी स्थान केवल द्रष्टा के रूप में नहीं अपितु कारण के रूप में भी मानना चाहिए। वैसे तो सृष्टि के मूल में जाने की आधुनिक वैज्ञानिक परम्परा अभी हमारे वैदिक साहित्य में प्राप्त उल्लेखों से लाखों वर्ष पीछे चल रहे हैं। क्योंकि उनके सिद्धान्त अभी तक सुदृढ़ रूप में प्रतिपादित नहीं हो पाये है अथवा जो हुए भी है उनमें बाद में संशोधन होते रहे हैं।

सन्दर्भ सूची-

१. सिद्धान्तशिरोमणि, भुवनकोश,श्लो.सं. १

२. सूर्यसिद्धान्त, मध्यमाधिकार, श्लो.सं. १०

३. सूर्यसिद्धान्त, भूगोलाध्याय, श्लो.सं. २४

४. विष्णुपुराण, १/२/२४

५. विष्णुपुराण, १/२/२७

६. श्रीमद्भागवत् महापुराण, ३/१०/१३

७. प्राकृताश्च त्रये पूर्वे सर्गास्तेऽबुद्धिपूर्वका:।

बुद्धिपूर्वं प्रवर्तन्ते मुख्याद्या: पञ्च वैकृता:।। (शिवपुराण, वायवीय,१/१२/१८)

८. श्रीमद् भगवद् गीता, १४/३

९. मुख्या वै स्थावरा: स्मृता:। (विष्णुपुराण, १/५/२१)

१०. विष्णुपुराण १/५/१५-१८

११. विष्णुपुराण १/५/२४

१२. पञ्चमोऽनुग्रह: सर्गश्चतुर्धा स व्यवस्थित:।

विपर्ययेण शक्त्या च तुष्ट्या सिद्ध्या तथैव च।। (मार्कण्डेयपुराण, ४७/२८)

१३. सांख्यकारिका, कारिका संख्या ४६

१४. स एव प्रथमं देव: कौमारं सर्गमास्थित:।

चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम्।। (श्रीमद् भागवत् महापुराण, १/३/६)

१५. श्रीमद्भागवत् महापुराण, २/७

१६. विश्वनाथ चक्रवर्ती की व्याख्या –भागवत पुराण ३/१०/२६

१७. नैमित्तिक: प्राकृतिकस्तथेवात्यन्तिको द्विज।

नित्यश्च सर्वभूतानां प्रलयोऽयं चतुर्विध:।। (विष्णुपुराण १/७/४१)

सहायक ग्रन्थ सूची-

१. सिद्धान्त शिरोमणि।

२. सूर्यसिद्धान्त।

३. विष्णुपुराण।

४. श्रीमद्भागवत् महापुराण।

५. वायुपुराण।

६. पुराण-विमर्श (आचार्य बलदेव उपाध्याय)।

डॉ. राहुल मिश्र प्रकाशन अधीक्षक (संविदा), संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-२२१००५





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