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धनतेरस; धनवन्तरि के आराधना का पर्व न कि अंधाधुंध खरीददारी का

धनतेरस; धनवन्तरि के आराधना का पर्व न कि अंधाधुंध खरीददारी का
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बीएचयू, ज्योतिष विभाग के अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पाण्डेय जी कहते हैं कि धनवन्तरि को हिन्दू धर्म में देवताओं के वैद्य माना जाता है। ये एक महान चिकित्सक थे जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये भगवान विष्णु के अवतार समझे जाते हैं। इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथन के समय हुआ था। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु गाय, त्रयोदशी को धनवन्तरि , चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी जी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था। इसीलिये दीपावली के दो दिन पूर्व त्रयोदशी को भगवान धनवन्तरि का जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन इन्होंने आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया था। इन्‍हें भगवान विष्णु का रूप कहते हैं जिनकी चार भुजायें हैं। उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र धारण किये हुये हैं। जबकि दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिये हुये हैं। इन्‍हे आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य का देवता कहते हैं। इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने 'शल्य चिकित्सा' का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य सुश्रुत बनाये गए थे। सुश्रुत दिवोदास के ही शिष्य और ॠषि विश्वामित्र के पुत्र थे। उन्होंने ही सुश्रुत संहिता लिखी थी। सुश्रुत विश्व के पहले सर्जन (शल्य चिकित्सक) थे। दीपावली के अवसर पर कार्तिक त्रयोदशी को भगवान धनवन्तरि की पूजा करते हैं। कहते हैं कि शंकर ने विषपान किया, धनवन्तरि ने अमृत प्रदान किया और इस प्रकार काशी कालजयी नगरी बन गयी।

आयुर्वेद के संबंध में सुश्रुत का मत है कि ब्रह्माजी ने पहली बार एक लाख श्लोक के, आयुर्वेद का प्रकाशन किया था जिसमें एक सहस्र अध्याय थे। उनसे प्रजापति ने पढ़ा तदुपरांत उनसे अश्विनी कुमारों ने पढ़ा और उन से इन्द्र ने पढ़ा। इन्द्रदेव से धनवन्तरि ने पढ़ा और उन्हें सुन कर सुश्रुत मुनि ने आयुर्वेद की रचना की। भावप्रकाश के अनुसार आत्रेय प्रमुख मुनियों ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर उसे अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों को दिया।

विध्याताथर्व सर्वस्वमायुर्वेदं प्रकाशयन्।

स्वनाम्ना संहितां चक्रे लक्ष श्लोकमयीमृजुम्।।

इसके उपरान्त अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों के तन्त्रों को संकलित तथा प्रतिसंस्कृत कर चरक द्वरा 'चरक संहिता' के निर्माण का भी आख्यान है। वेद के संहिता तथा ब्राह्मण भाग में धनवन्तरि का कहीं नामोल्लेख भी नहीं है। महाभारत तथा पुराणों में विष्णु के अंश के रुप में उनका उल्लेख प्राप्त होता है। उनका प्रादुर्भाव समुद्रमंथन के बाद निर्गत कलश से अण्ड के रुप मे हुआ। समुद्र के निकलने के बाद उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि लोक में मेरा स्थान और भाग निश्चित कर दें। इस पर विष्णु ने कहा कि यज्ञ का विभाग तो देवताओं में पहले ही हो चुका है अत: यह अब संभव नहीं है। देवों के बाद आने के कारण तुम (देव) ईश्वर नहीं हो। अत: तुम्हें अगले जन्म में सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और तुम लोक में प्रसिद्ध होगे। तुम्हें उसी शरीर से देवत्व प्राप्त होगा और द्विजातिगण तुम्हारी सभी तरह से पूजा करेंगे। तुम आयुर्वेद का अष्टांग विभाजन भी करोगे। द्वितीय द्वापर युग में तुम पुन: जन्म लोगे इसमें कोई सन्देह नहीं है। इस वर के अनुसार पुत्रकाम काशिराज धन्व की तपस्या से प्रसन्न हो कर अब्ज भगवान ने उसके पुत्र के रुप में जन्म लिया और धनवन्तरि नाम धारण किया। धन्व काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे।

वे सभी रोगों के निवराण में निष्णात थे। उन्होंने भरद्वाज से आयुर्वेद ग्रहण कर उसे अष्टांग में विभक्त कर अपने शिष्यों में बाँट दिया। धनवन्तरि की परम्परा इस प्रकार है -

काश-दीर्घतपा-धन्व-धन्वंतरि-केतुमान्-भीमरथ (भीमसेन)-दिवोदास-प्रतर्दन-वत्स-अलर्क।

यह वंश-परम्परा हरिवंश पुराण के आख्यान के अनुसार है। विष्णुपुराण में यह थोड़ी भिन्न है-

काश-काशेय-राष्ट्र-दीर्घतपा-धन्वंतरि-केतुमान्-भीरथ-दिवोदास।

वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धनवन्तरि को प्राप्त हुआ। जहाँ अश्विनी के हाथ में मधुकलश था वहाँ धनवन्तरि को अमृत कलश मिला, क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश माना गया। विषविद्या के संबंध में कश्यप और तक्षक का जो संवाद महाभारत में आया है, वैसा ही धनवन्तरि और नागदेवी मनसा का ब्रह्मवैवर्त पुराण में आया है। उन्हें गरुड़ का शिष्य कहा गया है -

सर्ववेदेषु निष्णातो मन्त्रतन्त्र विशारद:।

शिष्यो हि वैनतेयस्य शंकरोस्योपशिष्यक:।।

भगवाण धनवन्तरि की साधना के लिये एक साधारण मंत्र है:

ऊँ धन्वंतरये नमः॥

इसके अलावा उनका एक और मंत्र भी है:

ऊँ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:

अमृतकलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोगनिवारणाय

त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप

श्री धनवन्तरि स्वरूप श्री श्री श्री औषधचक्र नारायणाय नमः॥

अर्थात

परम भगवन को, जिन्हें सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी कहते हैं, जो अमृत कलश लिये हैं, सर्वभय नाशक हैं, सररोग नाश करते हैं, तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं; उन विष्णु स्वरूप धनवन्तरि को नमन है।

प्रचलि धनवन्तरि स्तोत्र इस प्रकार से है।

ऊँ शंखं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्मिः।

सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम॥

कालाम्भोदोज्ज्वलांगं कटितटविलसच्चारूपीतांबराढ्यम।

वन्दे धन्वंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम॥

भगवान धनवन्तरि हर प्रकार के रोगों से मुक्ति दिलाते हैं । इसलिए कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को भगवान धनवन्तरि की पूजा करना चाहिए। स्कन्द पुराण के अनुसार इस दिन अपमृत्युनाश के लिए सायंकाल घर से बाहर यमराज के लिए दीपक का,औषधियों का दान करने का विधान है। दान करने का मंत्र

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन यमया सह।

त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यजः प्रीयतां ममेति।।

कार्तिकस्य सिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।

यमदीपं बहिर्दद्यादपमृत्युर्विनश्यति।।

इसलिए नरकोद्देशेन चतुर्वर्ति दीपदान करना चाहिए।

इस दिन सोना चाँदी, बर्तन, वस्त्र ,इत्यादि कुछ भी खरीदने का प्रमाण शास्त्र में उपलब्ध नहीं है।

ये गलत परम्परा सम्पूर्ण भारत वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। ज्योतिष शास्त्र में क्रय विक्रय का मुहूर्त दिया गया है, उसके अनुसार किसी भी वस्तु का क्रय करना लाभप्रद होता है।

धनतेरस आयुर्वेद के जनक धनवन्तरि की स्मृति में मनाया जाता है। इस दिन लोग अपने घरों में नए बर्तन ख़रीदते हैं और उनमें पकवान रखकर भगवान धनवन्तरि को अर्पित करते हैं। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि असली धन तो स्वास्थ्य है।

ऐसा हम सुनते एवं करते आयें है.. कि धनतेरस से लेकर दीवाली तक लोग भगवान से सुख-संपत्ति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। दीवाली के समय किसी नए बिज़नस की शुरुआत को शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन लोग अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों की सफाई कर उसे अच्छी तरह सजाते हैं और लक्ष्मी के आगमन के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन बर्तनों और आभूषणों की दूकानों पर काफी भीड़ देखने को मिलती है। धनतेरस के दिन जमीन, प्रॉपर्टी, कार खरीदने और किसी जगह इन्वेस्ट करने के साथ नए बिजनेस की शुरुआत करने को शुभ माना जाता है।परन्तु ये भेड़चाल ज्योतिषीय द्रष्टिकोण से सही नहीं है।

आत्मकारक सूर्य की नीच स्तिथि एवं त्रयोदशी तिथि प्रदोष पर गोचर चन्द्रकुंडली में नीच व्ययेश की धन कुटुंब स्थान पर स्तिथि, विष्कुम्भ योग अस्तव्यस्त आत्मबल एवं मानव मनोदशा की परिचायक है। शायद इस प्रचंड गोचर प्रभाववश बनी दुर्बल स्वास्थ्य विषकरी स्तिथि को धन्वन्तरि द्वारा स्वर्णपात्र अमृत-कलश औषधि पान द्वारा संतुलित कर सकने की विधि बताई गयी। जो कालांतर में धन्वन्तरी जयन्ती के धन शब्द से बर्तन आदि खरीदने की परम्परा शुरू हुई। अतः आप सभी से निवेदन है कि

अंधाधुंध खरीददारी के बोझ से बचें।

प्रो. विनय कुमार पाण्डेय अध्यक्ष ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

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