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जानिए फिरोजाबाद के एतिहासिक चंदवार का इतिहास

फ़िरोज़ाबाद का इतिहास चन्दवार के उजड़ते जाने और फ़िरोज़ाबाद के बसते जाने की कहानी है. 1860 में जब फ़िरोज़ाबाद में सड़को का निर्माण हुआ और रेलवे लाइनें बिछाई गई।

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मनीष कुमार गुप्ता

फ़िरोज़ाबाद (चंदवार) का इतिहास

आज हम उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद नगर के इतिहास के बारे में बात करेंगे जोकि सुहाग नगरी के नाम से भी जाना जाता है. फिरोजाबाद उत्तर प्रदेश का एक शहर एवं जिला मुख्यालय है। यह शहर चूड़ियों के निर्माण के लिये विश्व भर में प्रसिद्ध है। यह आगरा से 40 किलोमीटर और राजधानी दिल्ली से 250 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व की तरफ स्थित है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ यहाँ से लगभग 250 किमी पूर्व की तरफ है। फिरोज़ाबाद में मुख्यतः चूड़ियों का कारोबार होता है। यहाँ पर आप रंग बिरंगी हज़ारों प्रकार की चूड़ियों को अपने चारों ओर देख सकते हैं। पहले ये काँच का काम कोयले की आग द्वारा होता था जो की अब गैस के द्वारा किया जा रहा है | यहाँ पर काँच का अन्य सामान (जैसे काँच के झूमर ग्लास,अन्य सामान) भी बनते हैं|

फिरोजाबाद की स्थापना सम्राट अकबर के सेनापति ने सन 1568 मे की थी| शहर का अस्तित्व तब आया जब एक बार बादशाह अकबर के नवरत्न राजा टोडरमल वर्तमान फिरोज़ाबाद से होकर गुजर रहे थे। मार्ग में लुटेरों ने उन्हें लूट लिया। वापस जाकर राजा टोडरमल ने बादशाह से शिकायत की और एक सेनापति फ़िरोज़शाह को लुटेरों के दमन के लिए तत्काल भेजा गया। फ़िरोज़शाह ने इस स्थान पर सैनिक छावनी डाल दी और धीरे-धीरे इस स्थान का नाम फिरोज़ाबाद पड़ा। फ़िरोज़ शाह का मकबरा आज भी नगर पालिका के सामने बस स्टैंड के नज़दीक है जहाँ इस लेखक मनीष कुमार गुप्ता ने स्वयं यात्रा की.




फ़िरोज़ाबाद का पुरातन नाम और वंश बेल चंदवार नामक स्थान है जो की वर्तमान शहर से ६ किलोमीटर दूर स्थित है| यमुना के तट पर बसा स्थान चंदवार अपने वैभवशाली अतीत की कहानी इतिहास के पन्नो में संजोये हुए है| लेकिन पुरातत्व विभाग की नजरों से छुपा हुआ हैं| मनीष कुमार गुप्ता के अनुसार चंदवार के खंडहरों और मिट्टी के ऊँचे ऊँचे टीलो में सैकड़ो कहानियां छिपी हुईं हैं| यहाँ इस वीरानगी में घूमते हुए मनीष कुमार गुप्ता को ऐसा अनुभव हुआ मानो चंदवार का अतीत एक बार फिर सामने आना चाहिए . सभी जानते हैं की कन्नौज के राजा जय चंद राठौर और मोहम्मद गौरी का इतिहास प्रसिद्ध युद्ध चंदवार के इसी मैदान में लड़ा गया था | बारहवी शताब्दी में चंदवार एक महत्वपूर्ण स्थान था |1184 ईस्वी में अफ़ग़ानिस्तान के शासक मोहम्मद गौरी और कन्नौज के राजा जयचंद राठौर के बीच एक युद्ध लड़ा गया |चंदवार के इस युद्ध के अंदर जयचंद्र राठौर ने अपूर्व वीरता का प्रदर्शन किया| किन्तु मोहम्मद गौरी को इस युद्ध के अंदर विजय प्राप्त हो गयी थी |चंदवार के इस युद्ध का भारत के इतिहास के अंदर बहुत महत्व है| क्योंकि राजा जयचन्द की पराजय के बाद विदेश आक्रान्ताओं ने उत्तर भारत पर आधिपत्य जमाना प्रारम्भ कर दिया था और भारत में गुलामी का बीजारोपण हो गया था|

जहाँ पर मैं (मनीष कुमार गुप्ता) खड़ा हूँ यह राजा चंद्रसैन का किला अब एक खंडहर में तब्दील हो चुका है और यही प्राचीन चंदवार का किला सुहाग नगरी की अनमोल धरोहर है। देखरेख के अभाव में यह धरोहर भारी उपेक्षा का शिकार है। यह स्थान लेखक मनीष कुमार गुप्ता के पिता की जन्मस्थली है.





चौहान वंश के प्रख्यात राजा चंद्रसेन की नगरी चंदवार के नाम से जानी जाती थी। चंदवार को अति प्राचीन मानकर इसके पुराणिक होने की कल्पना की जाती है| माना जाता हैं कि भगवान श्री कृष्ण के पिता वासुदेव यहां राज्य करते थे जैन धर्म में एक प्राचीन काव्य ग्रंथ है बाहुबली चरित इस ग्रंथ की रचना सन 1397 मैं धनपाल द्वितीय नामक कवि ने चंद्रवार नगर में ही की थी तत्कालीन राजा हरिश्चंद्र के पुत्र रामचंद्र के शासन काल में की तथा चंदवार की महिमा का वर्णन करते हुए कवि धनपाल ने श्री कृष्ण के पिता वासुदेव काल की नगरी बताया है उससे इतना तो सिद्ध होता है कि आज से लगभग 6000 वर्ष पूर्व भी चंदबार को एक प्राचीन नगर माना जाता था जैन धर्मावलंबियों की मान्यता है कि भगवान नेमिनाथ के पिता समुद्रविजय भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव के बड़े भाई थे चंदवार निवास के समय चंदवार का राजा रामचंद्र चौहान परंपरागत रूप से उसी चंद्रसेन का वंशज प्रमाणित होता है जिसे चंदवार का संस्थापक माना जाता है लेकिन 10वी शताब्दी में राजा चंद्र सेन द्वारा चंदवार को राजधानी बनाने के पुख्ता सबुत यहाँ मौजूद है| राजा चंद्रसेन के पुत्र चंद्रपाल ने चंदवार नगर की स्थापना अपने पिता की याद में की थी। राजा चंद्र सेन का पुत्र चंद्र पाल भारत के प्रमुख ताकतवर राजाओ में से एक था | चंदवार के इतिहास में चंदवार के तीन राजाओं का उल्लेख मुख्य रूप से है 1- चंद्रसेन 2 चंद्रसेन का पुत्र चंद्रपाल 3- चंद्रपाल का पौत्र जयपाल. राजा चन्द्रसेन की इतिहास प्रसिद्ध मूर्ति आज भी चंदवार में लगी हुई हैं| चंदवार पर चौहान वंश का शासन एक लम्बे अरसे तक रहा|

सन 1018 में महमूद गजनवी और राजा चंद्र पाल के फ़ौजों के मध्य इसी मैदान में जबरदस्त भिड़न्त हुई थी | सन 1197 में कुतुबूदीन ऐबक ने चंदवार पर आक्रमण किया था | 1301 में अलाउदीन खिलजी ने भी चंदवार पर आक्रमण किया था चंदवार के चौहान राजाओ ने 12 वर्ष तक मुग़ल राजाओं से युद्ध किया| 12वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक चंदवार का इतिहास युध्दों से भरा हुआ हैं इसके साथ साथ चंदवार में धर्म, कला व व्यापार का भी प्रमुख केंद्र बन गया था| ईशा की 12 वीं शताब्दी में श्रीधर नामक कवि ने भविष्य अंत चरित्र नामक काव्य ग्रंथ की रचना चंदबार नगर में स्थित मातृवंशीय नारायण के पुत्र सुपरसाहू की प्रेरणा से सन 1173 इसके आसपास की थी | 1392 ई0 अथवा 1397 ई0 में धनपाल द्वारा रचित ग्रन्थ बाहुबली चरित में चंद्रवार के संभरी राय, सारंग नरेंद्र, अभय चंद्र और रामचंद्र राजाओ का विवरण मिलता है।




मोहम्मद गौरी के हमले के बाद दिल्ली का शायद ही कोई सुल्तान हो जिसने चंदवार पर चढ़ाई न की हो। एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में चंदवार पर चैहान राजाओं का अधिकार बाबर के काल तक रहा। इसके बाद चंदवार मुगलों के अधीन हो गया। भारत में मुगलो के आते ही चंदवार पर चौहान राजाओं की पकड़ ढीली होती गयी| बाबर की आत्मकथा 'बाबरनामा' में सन् 1526 में बाबर की तीन बार चंदवार जाने का जिक्र है।1197 - 98 में ऐबक ने चंदबार और कन्नौज पर अधिकार कर लिया था कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु पोलो खेलते हुए घोड़े से गिरकर हो गई थी याहिया ने तारीख ए मुबारकशाही में लिखा है कि सन 1414 इसमें ताज उल मुल्क में चंद्रवार को नष्ट भ्रष्ट कर दिया दिल्ली के कूचा सेठ के जैन मंदिर में विद्वान चौबीसी धातु की जैन मूर्ति की प्रतिष्ठा चंद्रवार में सन 1454 में हुई थी चंद्रवार से मूर्ति को दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया | सन 1458 में जौनपुर के शाह हसन से ्बहलोल का युद्ध चंद्रवार में हुआ था |

चन्दवार में यमुना-किनारे पत्थर के घाट मिट्टी में दबे दिखाई पड़ते हैं। जहाँ पर इस वक़्त मैं (मनीष कुमार गुप्ता खड़ा हूँ| कहा जाता है कि यहाँ नाव बनाने का बहुत बड़ा केन्द्र था और दिल्ली से इलाहाबाद तक चन्दवार की नावें प्रसिध्द थीं। पुराने समय में सारा व्यापार नावों से ही होता था| आगरा से जितनी भी नाव चलती थी यहाँ पर रूकती थी पूर्व की तरफ से जितने भी नाव आती थी यहाँ रूकती थी चंदवार एक प्रसिद्ध व्यापारिक बंदरगाह था जहाँ नावो से सामानों को उतारा जाता था और गंतव्य स्थानों पर ले जाया जाता था |





फ़िरोज़ाबाद का इतिहास चन्दवार के उजड़ते जाने और फ़िरोज़ाबाद के बसते जाने की कहानी है. 1860 में जब फ़िरोज़ाबाद में सड़को का निर्माण हुआ और रेलवे लाइनें बिछाई गई। फलतः आवागमन के साधनों में नदियों का प्रयोग घटता चला गया| रोजी रोटी की तलाश में चंदवार के लोग फ़िरोज़ाबाद आकर बसने लगे और फ़िरोज़ाबाद की ओर पलायन शुरू कर दिया।, धीरे-धीरे चंदवार खण्डहरों में तब्दील होने लगा। चंदवार मूलतः माथुर वैश्य व ब्राह्मणों का एक केंद्रीय गढ़ था| चंदवार के रईस शिवलाल माथुर वैश्य की दिन-दहाड़े हुई हत्या के बाद चंदवार उजड़ गया| इस घटना से चन्दवार में दहशत फैल गई। तब बहुत से अमीर एक साथ फ़िरोज़ाबाद भाग गए। जिसमे लेखक मनीष कुमार गुप्ता का परिवार भी था. आज भी चन्दवार की पुरानी बस्ती, मकान व हवेलियां खाली पड़ी हैं|

पिछले चार दशक में चंदवार मे यमुना किनारे मिट्टी में दबे अनेक शिव मंदिर को ढूंढ़ निकाला गया |एक विशाल टीले पर एक प्राचीन पसीना वाले हनुमान मंदिर और एक राम मंदिर भी मिला| जिन्हें लेखक मनीष कुमार गुप्ता ने स्वयं जाकर देखा हैं| चंदवार में सूफी साहब की दरगाह दशकों से मुसलमानो के लिए आकर्षण का केन्द्र रही है| यहाँ हर साल उर्स लगता हैं| कहते हैं ईरान के एक प्रतिष्टित परिवार की अपूर्व सुदरी और कवियत्री गणनाबेगम भरतपुर के राजा सूरजमल के बेटे जवाहर सिंह पर आसक्त हो गयी थी| राजा सूरज मल इस बात पर प्रसन्न नही थे | चंदवार की इस दरगाह पर एक सूफी संत रहते थे जो भविष्य बताने के लिए दूर-दूर तक जाने जाते थे गणना बेगम की इस संत से मिलने इसी दरगाह पर आए थी और अपना भविष्य जाना था| लेखक मनीष कुमार गुप्ता 9810771477 ने देखा कि मंदिर और दरगाह नजदीक ही हैं|

यहाँ के जैन मन्दिर को संवत 1052 में राजा चन्द्रसेन द्वारा निर्मित माना जाता है। माना जाता है कि चौहान वंशीय राजपूतों ने जैन धर्म अपना लिया था। इस भूले-बिसरे जैन तीर्थ में अनेक जैन-ग्रन्थों की रचना हुई है। और चंदवार मैं विभिन्न धर्मो का परचम ही नही लहराया वरन अनेक साहित्य का जन्म हुआ ईशा की 12 वीं शताब्दी में श्रीधर नामक कवि ने भविष्यन्त चरित्र नामक काव्य ग्रंथ की रचना चंदवार ने ही की 'अणुवय रयणपईव' ग्रन्थ की रचना कवि लक्ष्मण 1397 में 'बाहुबली चरित्र' की रचना कवि धनपाल ने चन्दवार में ही की थी। रही दुह लाखु, धर्मधर, चंपावती, धनपाल, पक्ष्मनन्दी, भरम गुलाल आदि कवि भी चन्दवार में 14 से 15वीं शताब्दी तक रहे और अनेक महत्वपूर्ण काव्य-ग्रन्थेां की रचना की गई। इन सभी ग्रन्थों में अपने समय की चन्दवार की राजनैतिक गतिविधियों पर भी प्रकाश डाला गया है| बाजीराव पेशवा मोहम्मद शाह के शासन में 1737 में फिरोजाबाद को लूटा गया| उसके बाद जाटों ने 30 साल के लिए फिरोजाबाद पर शासन किया|

ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियो ने 9 अगस्त 1632 का दौरा किया और शहर को अच्छी हालत मे पाया था| 1596 मे फ़िरोज़ाबाद एक परगना मे बनाया गया था| उसके बाद जागीर के रूप मे नवाब सराजुदौला को शाहजहां ने शासन करने के लिये दिया| जनरल लेक और जनरल वैलेजली 1802 में फिरोजाबाद पर हमला किया| ब्रिटिश राज्य की शुरू में फिरोजाबाद इटावा जिले में था| लेकिन कुछ समय बाद यह अलीगढ़ जिले से जुड़ा था | शाहजहां ने 1832 में एक नया जिला बनाया और फ़िरोज़ाबाद इस से जुड़ा और बाद में 1833 के अंत मे आगरा जुड़ा |1847 में लाख का व्यापार फिरोजाबाद में फल-फूल रहा था। 1989 में इसको स्वतंत्र जिला घोषित किया गया इस शहर के लोगों ने "खिलाफत आंदोलन में भाग लिया था| और नमक सत्याग्रह में भाग लिया| लेखक मनीष कुमार गुप्ता के अनुसार कई लोगो ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था और जेल गये थे|

फ़िरोज़ाबाद से लगभग 3 किलोमीटर दूरी पर 1884 के गजेटियर के अनुसार कोटला का किला जिसकी खाई 20 फ़ीट चोडी, 14 फुट गहरी, 40 फुट ऊँची दर्शाई गई है भूमि की परधि 284 फ़ीट उत्तर 220 फ़ीट दक्षिण तथा 320 फ़ीट पूर्व तथा 480 फ़ीट पछिम में थी वर्तमान में ये किला नस्ट हो गया है किन्तु अब भी उसके अभिषेश देखने को मिलते है।

सेठ रामगोपाल मित्तल द्वारा शहर के बाई पास रोड स्थित गोपाल आश्रम का निर्माण 1953 में कराया l इस गोपाल आश्रम में 57 फीट ऊँची हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित है इस आश्रम में एक विशाल सत्संग भवन है यहाँ पर प्रतिदिन सत्संग होता है।

गजेटियर के अनुसार नगर की सबसे प्राचीन शाही मस्जिद जोकि वर्तमान में कटरा पठानान में है का निर्माण शेरशाह सूरी ने कराया था। फ़िरोज़ाबाद से लगभग 4 किलो मीटर दूरी पर कोटला रोड पर बड़ा गाँव तथा जाटउ मार्ग पर एक बृक्ष जिसकी गोलाई 9.80 मीटर तथा ऊँचाई 19.3 मीटर है महा बृक्ष अजान के नाम से जाना जाता है इस बृक्ष पर जुलाई माह में सफ़ेद रंग के फूल आते है।

फ़िरोज़ाबाद में रामलीला मैदान में एक विशाल हनुमान मंदिर है जोकि मराठा शासन काल में श्री वाजीराव पेशवा द्वतीय द्वारा इस मंदिर की स्थापना एक मठिया के रूप में की गई। मराठों के दिल्ली आक्रमण के दौरान बाजीराव और मस्तानी फिरोज़ाबाद आए थे l यहाँ 19वी शताब्दी के ख्याति प्राप्त तपस्वी चमत्कारिक महात्मा वावा प्रयागदास की चरण पादुकाएं भी स्थित है।

फ़िरोज़ाबाद से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर राजा का ताल बसा हुआ है फिरोजाबाद गजट द्वारा राजा के ताल का निर्माण सम्राट अकबर के नवरत्नों में से एक मंत्री राजा टोडरमल द्वारा कराया गया था आगरा मार्ग के किनारे लाल पत्थर से बना बड़ा राजा का ताल राजा टोडरमल का स्मरण कर आता है इस ताल के विषय में एक रुचिकर तथ्य है कि यहां ताल के मध्य में पत्थर का बना एक मंदिर है जहां एक बांध पुल द्वारा पहुंचा जा सकता है परंतु वर्तमान में अब यह ताल नाम मात्र का रह गया है और यहां पर ज्यादातर मकान बन चुके हैं परंतु कहीं कहीं पर लाल ककरी की दीवार नाममात्र के रूप में नजर आती है| राजा का ताल बादशाह अकबर के ज़माने का तालाब है | कभी बादशाह अकबर के हाथी, घोड़े मेरे यहां प्यास भुझाने आते थे |

बादशाह अकबर के बजीर टोडरमल ने इस तालाब की खुदाई कराई थी |खुदाई कराने के बाद तालाब को पक्का कराया ताकि तालाब का पानी साफ़ सुथरा बना रहे l बादशाह अकबर की मौत के बाद वर्ष 1605 में इस तालाब की देखरेख टोडरमल ने ही की थी | इस तालाब की देखरेख और साफ़ पानी भरने की जिम्मेदारी सैनिकों को दी गई थी| इस तालाब तक पहुंचने के लिए एक सुरंग भी बनाई गई थी | जो यमुना की खादरों से होकर राजा के ताल तक जाता था | इस गुफा का प्रयोग जानवरों के पानी पीने के लिए और युद्ध में बचाओं के लिए भी किया जाता था|

फ़िरोज़ाबाद में जैन मंदिर की स्थापना स्वर्गीय सेठ छदामी लाल जैन द्वारा की गई थी मंदिर के हॉल में भगवान महावीर जी की सुन्दर मूर्ति पदमासन की मुद्रा में स्थापित है , इस सुन्दर व् विशाल मंदिर में 2 मई 1976 में 45 फीट लंबी और 12 फीट चोडी भगवान वाहुवलि स्वामी की मूर्ति स्थापित की गई है मूर्ति का वजन कुल 130 तन है यह उत्तरी भारत की पहली तथा देश की पाँचवी बड़ी प्रतिमा है एवम् चंद्रप्रभु की सुन्दर प्रतिमा भी स्थापित है सम्पूर्ण भारतवर्ष से जैन मतावलंबी महावीर दिगंबर जैन मंदिर के दर्शनार्थ हजारो की संख्या में प्रति माह आते रहते है।

फ़िरोज़ाबाद से लगभग 4 किलो मीटर दूर पर वैष्णो देवी का मंदिर बना हुआ है यहाँ कोई भी सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है यहाँ प्रतिवर्ष नवदुर्गो में मेला लगता है और हजारो की संख्या में बड़ी दूर दूर से श्रदालु माता के दर्शन के लिए आते है और अपनी मन्नते पूर्ण करने के लिए मांगते है एव नेजा भी काफी संख्या में यहाँ चढ़ाये जाते है।

सन् 1876 में फिरोज़ाबाद के नज़दीक हिरनगाँव नामक स्थान पर श्री तोताराम सनाढ्य का जन्म हुआ था जिनके अथक प्रयासों और फीज़ी देश में गिरमिटिया/बंधुआ मजदूरी प्रथा को समाप्त किया जा सका एवम् उनके द्वारा "फिजी देश में मेरे 21 वर्ष" पुस्तक इसी प्रयोजन से लिखी गई थी | तोताराम सनाढय की मृत्यु पर महात्मा गांधी ने लिखा " वयोवृद्ध तोताराम जी किसी से भी सेवा लिए वगैर ही गये वे सावरमति आश्रम के भूसण थे विद्वlन तो नहीं पर ज्ञानी थे|




लेखक मनीष गुप्ता


हिरनगाँव से 500 मीटर दुरी पर बाबा नीम करोरी महाराकी भी जन्म स्थली है जिनके धार्मिक मंदिर देश मे ही नहीं अपितु विदेशो में भी बने हुए है। यहाँ प्रतिवर्ष भंडारा होता है एव श्रदालु हजारो की संख्या में बाबा का प्रसाद ग्रहण करते है और उनका आशिर्वाद भी प्राप्त करते है।

1929 मे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, 1935 मे सीमांत गांधी, 1937 में पंडित जवाहर लाल नेहरू और 1940 में नेताजी सुभाष चंद बोस ने फिरोजाबाद का दौरा किया था। वर्तमान शहर फ़िरोज़ाबाद उधोग व व्यापार का केंद्र हैं हालांकि इतिहास और पर्यटन की दृष्टि से इसकी स्थिति नगण्य हैं| लेखक (मनीष कुमार गुप्ता) ने अपने स्तर पर पर्यटन विभाग में चंदवार की ऐतिहासिकता व पर्यटन की संभावनाओं पर चर्चा की हैं, हमें आशा हैं कि कुछ ठोस परिणाम अवश्य मिलेगा और फ़िरोज़ाबाद शहर का नाम पर्यटन के मानचित्र पर दृश्यमान होगा |


लेखक मनीष कुमार गुप्ता ऐतिहासिक मामलों के जानकार है

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