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जानिए कौन है शैलपुत्री जिन्हें दुर्गा का पहला स्वरूप का कहा जाता है!

इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं । यहीं से उनकी योगसाधना का प्रारम्भ होता है ।

 Shiv Kumar Mishra |  17 Oct 2020 6:07 AM GMT  |  दिल्ली

जानिए कौन है शैलपुत्री जिन्हें दुर्गा का पहला स्वरूप का कहा जाता है!
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पं, वेदप्रकाश पटैरिया शास्त्री जी (ज्योतिष विशेषज्ञ)

श्री परमात्मने नम:

१ – शैलपुत्री

माँ दुर्गा अपने पहले स्वरूप में 'शैलपुत्री' के नाम से जानी जाती है । पर्वतराज हिमालय के वहाँ पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका यह 'शैलपुत्री' नाम पड़ा था । वृषभ-स्थिता इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है । यही नव दुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं ।

अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं । तब इनका नाम 'सती' था । इनका विवाह भगवान् शंकरजी से हुआ था । एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया । इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिये निमन्त्रित किया | किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमन्त्रित नहीं किया । सती ने जब सुना कि हमारे पिजा एक अत्यन्त विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिये उनका मन विकल हो उठा । अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बतायी । सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा – "प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं । अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमन्त्रित किया है । उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किये हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है । कोई सूचना तक नहीं भेजी है । ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा ।" शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ । पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने कि उनकी व्याग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी । उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान् शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी ।

सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात-चीत नहीं कर रहा है । सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं । केवल उनकी माता ने स्नेह से गले लगाया । बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे । परिजनों के इस व्यवहार से उनके मनको बहुत क्लेश पहुँचा । उन्होंने यह बी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान् शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है । दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे । यह सब देखकर सती का ह्रदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से सन्तप्त हो उठा । उन्होंने सोचा भगवान् शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है ।

वह अपने पति भगवान् शंकर के इस अपमान को सह न सकीं । उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीँ योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया । वज्रपात के समान इस दारुण-दु:खद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुध्द हो अपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णत: विध्वंस करा दिया ।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्मकर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया । इस बार वह "शैलपुत्री" नाम से विख्यात हुई । पार्वती, हैमवती भी उन्ही के नाम हैं । उपनिषद की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था ।

'शैलपुत्री' देवी का विवाह भी शंकरजी से ही हुआ । पूर्वजन्म कि भाँति इस जन्म में भी वह शिवजी कि अर्धांगिनी बनीं । नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनन्त हैं । नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं कि पूजा और उपासना की जाती है । इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं । यहीं से उनकी योगसाधना का प्रारम्भ होता है ।

किसी भी प्रकार की समस्या समाधान के लिए पं. वेदप्रकाश पटैरिया शास्त्री जी (ज्योतिष विशेषज्ञ) जी से सीधे संपर्क करें = 9131735636

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