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बरसात के दिनों में कब्रस्तान के चक्कर लगा लिया करो साहब

बरसात के दिनों में कब्रस्तान के चक्कर लगा लिया करो साहब
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वहां वह लोग दफन है जो ज़रा सी बिजली चमक ने पर तुम को गले लगा लिया करते थे ।

जिनके मां बाप दुनिया छोड़कर चले गए उनको श्रद्धांजलि और जिनके मां बाप अभी है उनके लिए दुआ की उनका बुढ़ापा अच्छे से गुजरे ।

बिना आंसू के जो

रोता है ,वो बाप होता है ,

जो अपने बच्चों की तकलीफों मैं आंसू बहाता है

वो बाप होता है ।

फटे कपड़े पहन कर मेहनत

करता है ,वो बाप होता है ।

एक बाप को लाख परेशानियां हो

तो भी हंसते-हंसते कहता है ,मुझे कोई दुख नहीं है,और जब खाना खिलाते खिलाते खाना खत्म हो जाए तो मां कहती है ,मुझे भूख नहीं है । ऐसे होते हैं ,मां बाप जो अपनी ख्वाहिशों को रोज़ दफन करते हैं ,और अपनी औलाद के लिए हसीन सपने दिलों में संजोए रखते हैं, इन सपनों के बल पर दुगनी मेहनत करने से भी पीछे नहीं हटते । जब बाप बुढ़ापे की दहलीज पर कदम रखता है ,और उसको चलने में परेशानी होती है, तो उसको चलने के लिए लकड़ी सहारा लेना पड़ता है , अगर लकड़ी के सहारे के जगह उसके बेटे का हाथ उसके हाथ में हो तो उसको लगता है ,उसे दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो, पर इस दौर में ऐसे बेटे कम ही होते हैं ।

बाप चार बेटों को बहुत आसानी से पाल लेता है ,पर यह चार बेटे अपने बूढ़े बाप को दो वक्त का भोजन खिलाने में भी नखरे दिखाते हैं, बचपन में बेटे अपने पिता से बोलते थे ,पापा जल्दी आ जाना बाजार से लड्डू पेड़े लेते आना और शादी होने के बाद अब बोलते हैं, पापा अब घर बिल्कुल मत आना वृद्धा आश्रम चले जाना । मां-बाप अब दिनों में बांट दिए गए हैं , सोमवार मंगलवार बड़े बेटे के घर, बुधवार गुरुवार छोटे बेटे के घर, ऐसे गुजरती है,बूढ़े माँबाप की जिंदगी

फटे जूते, पैबंद लगे कपड़े पहनकर जवानी निकली बाप की और उसने अपने बेटों के लिए पसीना बहा बहा कर बेटो पर अपनी हैसियत से ज्यादा कपड़े और पढ़ाई पर ख़र्च करता है ।

इसकी जीती जागती मिसाल महाराष्ट्र के सबसे कम उम्र के आईएएस अधिकारी अंसार शेख है ।

अंसार शेख ऑटो रिक्शा चलाने वाले के बेटे हैं। महाराष्ट्र के जालना गांव के गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता ने दिन रात साइकिल रिक्शा से सवारियां ढोई, जब सवारिया नहीं मिलती थी ,तो साइकिल रिक्शा पर सब्जी के बोरे ढोकर अंसार को आईएएस अधिकारी बनाया।

मुझे दो सच्ची घटनाएं याद आ रही है और जब भी याद आती है ,तो मन व्याकुल हो जाता है , पहली घटना पिता की हैं और दूसरी घटना बेटे की ।

लॉकडाउन के दौरान एक गरीब मजदूर कुत्तों को डाली गई डबल रोटी के टुकड़े जमीन से उठा कर अपनी जेब में रख रहा था, उसके साथी मजदूरों ने उससे पूछा कुत्तों की खाई हुई डबल रोटी को काहे को जेब में रख रहे हो ,तो उसने जो जवाब दिया उसका जवाब सुनकर मेरा दिल हिल गया था और उसकी कहानी नेशनल चैनलों पर भी दिखाई गई थी। उसने बड़ी मासूमियत से बोला आज कोई भी खाना बांटने नहीं आया, मैं तो भूखा सो जाऊंगा पर मेरे बेटे को भूखा नहीं सोने दूंगा। यह गरीब बाप का प्यार अपने बेटे के लिए ।

दूसरी घटना एक पिता ने मेहनत कर कर के अपने बेटे को खूब पढ़ाया लिखाया उसकी नौकरी अमेरिका में लग गई, लाखों रुपए महीना पगार पाता है ,उसने वहीं पर अपनी पसंद की शादी कर ली जब बहू को पता चला उसके सुसर के पास भारत में एक मकान है, तो वे अपने पति के पीछे पड़ गई, भारत चलो, सुसर जी से मिलना है। मगर उसकी मंशा सुसर में कम मकान में ज्यादा थी । जब बेटा बहू भारत आए ,पिता खुशी में रो दिया बेटे को गले लगाया और बोला बेटा मुझे उम्मीद थी तुम मुझे शादी में बुलाओगे खैर कोई बात नहीं ,बेटे ने पिता से चिकनी चुपड़ी बातें की और उनसे बोला आप यह मकान बेच दे और हमारे साथ अमेरिका चले पिता बेटे की बातों में आ गया और मकान बेचकर सारी रकम बेटे को दे दी ,एयरपोर्ट जाने के लिए बेटे ने दो रिक्शा बुलाए एक रिक्शा में वह और उसकी पत्नी बैठे दूसरी रिक्शा में अपने बूढ़े बाप को बैठाया और अपने पिता से बोला पिताजी आधे घंटे के बाद आप एयरपोर्ट आना, जब तक एयरपोर्ट पर कुछ कागज़ी कार्रवाई होती है ,वह मैं करवा दूंगा।

बेटा बहू एयरपोर्ट के लिए निकले दूसरा ऑटो एयरपोर्ट ना जाते हुए वृद्धा आश्रम पहुंच गया जब पिता ने वृद्ध आश्रम का बोर्ड देखा तो उसको पूरी कहानी समझ में आ गई आंखों में आंसू लिए वृद्धा आश्रम के अंदर दाखिल हुआ यह दोनों घटनाएं सत्य है ।

जबलपुर के बरगी गांव में रहने वाला कैलाश गिरी सतयुग के श्रवण कुमार से कम नहीं है। जिस तरह श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता पिता को कंधे पर बैठाकर चारों धाम की यात्रा कराई थी उसी तरह कैलाश गिरी ने शरीर से लाचार अपनी वृद्ध मां को कंधे पर बैठाकर हजारों किमी की यात्रा करा दी है।

इस दौर में भी श्रवण कुमार जैसे बेटे मौजूद हैं जो अपने बूढ़े मां-बाप को के लिए कुछ भी करने को तैयार है । ऐसी औलाद से ऊपर वाला भी खुश होता है और मां-बाप की दुआएं कभी खाली नहीं जाती । पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती अच्छे बुरे सभी तरह के लोग होते हैं यह दुनिया जो चल रही है अच्छे लोगों की वजह से चल रही है।

जो बीत गया है वो

अब दौर न आएगा ।

बेटा भले तू साथ न दे ,

मुझे हालातों से लड़ना

आता है ।

हर आग से वाक़िफ़ हूँ

जलना मुझे आता है।

मोहम्मद जावेद खान

Shiv Kumar Mishra
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