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भारत यात्रा डायरी: भारत यात्रा और बाबाजी का उत्साह

“बूढ़ा दिख जरूर रहा हूं। लेकिन हुआ नहीं हूं। पूरी यात्रा में चलूंगा। कोई पहली बार यात्रा में नहीं आ रहा हूं। भाईसाहब की पहले की यात्राओं में भी शामिल रहा हूं।”

 अनिल पाण्डेय |  2017-09-20 12:30:57.0

भारत यात्रा डायरी: भारत यात्रा और बाबाजी का उत्साह

कन्याकुमारी में 11 सितंबर को रैली के दौरान एक व्यक्ति पर मेरी निगाहें बार-बार बरबस ही टिक जाती। उसकी वेश-भूषा भी उसे भीड़ से अलग कर रही थी। पैंट और कुर्ता पहने इस शख्स की लंबी सफेद दाढ़ी और लंबे बालों को ढ़कता हुआ काऊ ब्याय कैप लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। बीच-बीच में उसका अंग्रेजी बोलना कानों को खटक रहा था। इस बूढ़े शख्स का नारे लगाने का अंदाज, पर्चा बांटने का उत्साह और बच्चों से घुलना मिलना देख कर मुझे इस अजनबी को जानने की इच्छा हुई। हम लोग भारत यात्रा के शुभारंभ के बाद कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद शिला स्मारक के समुद्र तट से हजारों स्कूली बच्चों और युवाओं के साथ मार्च करते फुटबाल ग्राउंड आ रहे थे, जहां एक विशाल जनसभा होनी थी। मैं मार्च में आए कुछ बच्चों से बात करने लगा तभी यह शख्स भीड़ में कहीं गायब हो गया।



खैर, कन्याकुमारी की जनसभा समाप्त हुई और हम लोग अपनी-अपनी बसों में बैठ कर यात्रा के अगले पड़ाव तिरुअनन्तपुरम के लिए रवाना हो गए। इस यात्रा में कोर मार्चर के रूप में करीब 300 सौ लोग शामिल थे। छह बसों में सवार होकर हम लोग आगे बढ़ रहे थे। रात करीब 8 बजे हम लोग तिरुअनन्तपुरम पहुंच गए। हमें यहां के सर्वोदय विद्यालय में रात गुजारनी थी। डिनर करने के बाद अगले दिन की तैयारी के लिए भुवन जी ने स्कूल के लॉन में सबको इकठ्ठा होने का निर्देश दिया। भुवन रिभू जी कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रेन्स फाउंडेशन के निदेशक हैं। यात्रा को यही लीड़ कर रहे हैं। बैठक में यात्रा के पहले दिन के अनुभव पर बात होने लगी। तभी यात्रा में शामिल लोगों के उत्साह पर चर्चा चल पड़ी। ऐसे में भुवनजी ने किसी बाबाजी के उत्साह का जिक्र किया और बताया कि वे बिना किसी निमंत्रण के ही यात्रा में कोर मार्चर के रूप में शामिल होने के लिए उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से दिल्ली आ गए और फिर कन्याकुमारी पहुंच कर यात्रा में शामिल हो गए। भुवनजी ने जब बाबाजी को आवाज लगाई तो मैं देख कर अजरज में पड़ गया कि ये तो वही शख्स हैं जिन्हें में कौतूहलबस ढूढ़ रहा था। भुवनजी ने मजाक में अपने चिर-परिचित अंदाज में हंसते हुए कहा, "बाबाजी आप को हमने बुलाया नहीं, फिर क्यों इस उम्र में यहां आ गए?" बाबाजी के जवाब ने हम थके यात्रियों में उत्साह का संचार कर दिया। बाबाजी ने कहा, "मैंने अखबार में पढ़ा कि भाईसाहब (श्री कैलाश सत्यार्थी जी को आंदोलन से जुड़े लोग इसी नाम से संबोधित करते हैं।) बाल यौन शोषण और बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) के खिलाफ लोगों को जागरुक करने के लिए 22 राज्यों से 11 हजार किलोमीटर की देशव्यापी भारत यात्रा आयोजित कर रहे हैं। अखबार में उन्होंने लोगों के यात्रा में शामिल होने का आह्वान किया था। यह तो सबके लिए ओपन इनविटेशन था। इसलिए मैंने ट्रेन पकड़ी और बिना किसी से पूछे यात्रा में शामिल होने आ गया"। जब लोगों ने उनकी ओर हैरानी से देखा तो बाबाजी ने यह कह कर सबका मुंह बंद कर दिया, "बूढ़ा दिख जरूर रहा हूं। लेकिन हुआ नहीं हूं। पूरी यात्रा में चलूंगा। कोई पहली बार यात्रा में नहीं आ रहा हूं। भाईसाहब की पहले की यात्राओं में भी शामिल रहा हूं।"




बाबाजी नोबेल शांति पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी जी द्वारा आयोजित पिछली कई यात्राओं में शामिल रहे हैं। बाबाजी ड्राइवर हैं और पहले की यात्राओं में वाहन व्यवस्था की जिम्मेदारी उठाते रहे हैं। इस बार वे कोर मार्चर हैं। पहली बार वे 1998 में श्री सत्यार्थी जी द्वारा आयोजित बाल श्रम विरोधी विश्व यात्रा में शामिल हुए थे। इस बाल श्रम विरोधी विश्व यात्रा के परिणामस्वरूप ही बाल अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने दुनियाभर में खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाने के लिए कनवेंशन-182 पारित किया था। तब छह माह तक चली बाल श्रम विरोधी विश्व यात्रा 80 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर 103 देशों से होकर गुजरी थी। तब इस यात्रा में भारत के राष्ट्रपति केआर नारायणन सहित 70 से अधिक देशों के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राजा-रानी शामिल हुए थे। इस यात्रा में दुनियाभर के तकरीबन 72 लाख से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। इस यात्रा के परिणामस्वरूप दुनियाभर के कई देशों में बाल अधिकारों को लेकर न केवल जन-जागरुकता आई बल्कि बच्चों के हक में ढेर सारे कानून भी बने। बाबाजी इसके बाद साल 2001 में आयोजित शिक्षा यात्रा और साल 2007 में आयोजित बाल व्यापार विरोधी दक्षिण एशियाई यात्रा में भी शामिल थे। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने में कैलाश सत्यार्थी जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संविधान में संशोधन करके शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने की मांग करते हुए उन्होंने 2001 में कन्याकुमारी से कश्मीर होते हुए दिल्ली तक की 20 राज्यों की 15 हजार किलोमीटर लंबी जन-जागरण यात्रा आयोजित की थी। यात्रा की समाप्ति पर भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष के नेताओं ने कैलाश सत्यार्थी जी से मुलाकत कर उनकी मांगों को गंभीरता से लिया। नतीजन शिक्षा का अधिकार कानून अस्तित्व में आया। इसकी बदौलत आज करोड़ों बच्चे बेहतर भविष्य का सपना बुन रहे हैं। जाहिर है इन यात्राओं ने इतिहास रचा। बाबाजी इस इतिहास के निर्माता भी हैं और गवाह भी।



बाबाजी के यादों के खजाने
बाबाजी के यादों के खजाने में अनगिनत किस्से हैं। खट्टे-मीठे अनुभव हैं। बाबाजी बताते हैं कि इस यात्रा में तो खाने पीने और रहने की व्यवस्था हो जा रही है। पहले की यात्राओं में तो न रहने का ठिकाना होता था और न ही खाने का। रास्ते में जो मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारा मिल जाता था, वहीं सो जाते थे। ग्रामीण इलाकों में धर्मशाला और पंचायत भवन हमारे रहने का ठिकाना हुआ करता था। हमारी गाड़ी में दरी रखी होती थी। बिछाते और सो जाते। भाईसाहब यात्रा के दौरान सभाएं करते और फिर झोली फैलाकर लोगों से मदद की गुहार करते। जो पैसा मिलता उससे गाड़ी में पट्रोल और हम सब के खाने का इंतजाम होता। यात्रा के दौरान क्या कभी भूखा भी रहना पड़ा? सवाल सुन कर बाबाजी थोड़ी देर के लिए भौंहे सिकोड़ लेते हैं फिर मुस्कुराते हुए कहते हैं, "कभी भूखे पेट तो नहीं रहे, लेकिन कई बार आधा भेट भोजन कर ही रात काटी।" बाबाजी झारखंड का एक बाकया सुनाने लगते हैं। वे बताने लगे, "शिक्षा यात्रा झारखंड से गुजर रही थी। रात में हम ठहरने का पड़ाव ढूंढ रहे थे। पता चला की पास के ही एक गांव में अभी नया-नया पंचायत भवन बना है। वहां रात गुजारी जा सकती है। भाईसाहब हम लोगों को लेकर वहां पहुंच गए। सरपंच ने हमें रुकने की इजाजत भी दे दी। लेकिन गांव में कोई इतना समृद्द व्यक्ति नहीं था, जो हम सब को खाना खिला सके। गांव वाले बहुत अच्छे थे। उन लोगों ने फैसला किया कि अतिथि भूखे नहीं सोएंगे। सबके घर से रोटियां आएंगी। तीन-चार लोगों के घर से दाल सब्जी आई और बाकी घरों से रोटियां।" ऐसे बहुत सारे किस्से-कहानियां बाबाजी की समृतियों की पोटली में भरी पड़ी हैं। बाबाजी की ऐसी कहानियां सुनकर यात्रा की हमारी थकान रफूचक्कर हो गई। मैं सोचने लगा कि साल 1993 में जब पहली बार भाईसाहब ने यात्रा आयोजित की होगी, तो उन्हें किन-किन मुसिबतों और कठिनाइयों से गुजरना पड़ा होगा? इसकी हम सब कल्पना भी नहीं कर सकते।

(बाल यौन शोषण और बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) के खिलाफ जन-जागरुकता फैलाने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता श्री कैलाश सत्यार्थी देशव्यापी भारत यात्रा का आयोजन कर रहे हैं। 11 सितंबर, 2017 को कन्याकुमारी स्थित विवेकानन्द शिला स्मारक से शुरू हुई इस यात्रा का समापन 16 अक्टूबर, 2017 को दिल्ली में होगा। बच्चों के सवाल को लेकर यह देश का सबसे बड़ा अभियान है। लेखक अनिल पांडेय इस यात्रा में शामिल हैं।)

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