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यह चुनाव न भाजपा के लिए निर्णायक है, न कांग्रेस के लिए बल्कि यह चुनाव आरएसएस के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा

 अभिषेक श्रीवास्तव जर्न� |  10 April 2019 5:55 AM GMT  |  दिल्ली

यह चुनाव न भाजपा के लिए निर्णायक है, न कांग्रेस के लिए बल्कि यह चुनाव आरएसएस के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा
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मुझे नहीं पता कि किसकी सबसे ज्‍यादा सीटें आएंगी। मैं नहीं जानता कौन सी पार्टी सरकार बनाएगी। मुझे ये भी नहीं पता कि मेरी लोकसभा में सीट कौन निकाल रहा है। इस चुनाव का मुझे 'च' भी नहीं समझ आ रहा क्‍योंकि लोग ''च्‍च्‍च्‍च'' तक नहीं कर रहे। भयंकर सन्‍नाटा है टीवी और मोबाइल के बाहर की दुनिया में। मेरे पास किसी सवाल का जवाब नहीं है। केवल एक बात मैं तयशुदा तौर पर महसूस कर रहा हूं और काफी ठोकने बजाने के बाद अब कहने की स्थिति में हूं। इसे सनद रख लें। बाद में काम आएगी।

यह चुनाव न भाजपा के लिए निर्णायक है, न कांग्रेस के लिए और न ही किसी दूसरे दल के लिए। यह चुनाव जनता के लिए भी निर्णायक नहीं है, न ही देश के लिए। यह चुनाव केवल और केवल राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के लिए निर्णायक है। जीत किसी की भी हो, यह चुनाव ''सांस्‍कृतिक संगठन'' आरएसएस के ताबूत में आखिरी कील साबित होने जा रहा है। जिसे पैराडाइम शिफ्ट कहते हैं, उसका गवाह बन रहा है ये चुनाव। मुहावरा पलट गया है- कभी कहते थे कि बिना संघ के भाजपा कुछ नहीं है, आज की हकीकत ये है कि भाजपा है तो संघ है। संघ ने पूरी तरह भारतीय जनता पार्टी के धनबल और नेतृत्‍व-प्रभाव के सामने आत्‍मसमर्पण कर दिया है। ऐसा अनजाने नहीं हुआ, संघ के शीर्ष स्‍तर पर स्‍वेच्‍छा से लिया गया सचेतन निर्णय है।

भाजपा ने अपना खज़ाना खोल दिया है। संघ के काडरों का मुंह खुला हुआ है। साइकिल से चलने वाला प्रचारक फॉर्चूनर पर आ गया है। सांसद प्रत्‍याशी के इर्द-गिर्द घूम रहा है। सुविधाभोगी हो गया है। झण्‍डेवालान परिसर में जाकर देखिए समझ आ जाएगा, संघ के मुंह में पैसे का खून लग चुका है। अब वह परदे के पीछे काम करने वाला सांस्‍कृतिक संगठन नहीं रह गया है। आज का प्रचारक सामने खुलकर, आरएसएस लिखी टीशर्ट पहनकर, देसी चेग्‍वारा बना फिर रहा है। उसे समझ में आ चुका है कि बिना उत्‍पादन किए जिंदगी कैसे हरामखोरी से काटी जाती है। अब यह सिलसिला रुकने वाला नहीं। यह संघ को ले डूबेगा।

आप अपने क्षेत्र की शाखाओं और प्रचारकों के साथ एकाध भाजपा उम्‍मीदवारों के प्रचार में टहल आइए, आपका नतीजा इससे उलट नहीं होगा। 2014 के बाद सत्‍ता की राजनीति और मातृ संगठन की विचारधारा के बीच जो टकराव शुरू हुआ था, वह अब मुकम्‍मल हो चुका है। अब संघ का काडर पेड प्रचारक है। इसका असली परिणाम देखना हो तो 2022 तक दम थामे रखिए। अब तक भाजपा वाले कांग्रेस में जाते दिखे हैं, कल संघ का प्रचारक वहां जाएगा जहां उसकी सही कीमत लगेगी। एबसर्ड के थिएटर में केवल एक विचारधारा खतरे में नहीं होती, सभी होती हैं। सामाजिक निष्‍ठा का लोप सारे वैचारिक संगठनों को ले डूबता है। संघ अपवाद नहीं होना चाहिए।

सवाल उठता है कि फिर हिंदू राष्‍ट्र बनाएगा कौन? मेरे खयाल से कोई नहीं। जिस तरह सीपीआइ, सीपीएम, माले सर्वहारा की तानाशाही स्‍थापित नहीं कर सकते ठीक उसी तरह भाजपा हिंदू राष्‍ट्र नहीं बना सकती। फिर सवाल उठता है भाजपा क्‍या बनाएगी? याद रहे, भाजपा का जन्‍म तोड़ने से हुआ है। उसकी पैदाइश में ही विध्‍वंस है। उसे कुछ भी बनाना नहीं आता। बनाने का आर्गुमेंट ही उसे नहीं आता है। इसलिए विकृत और पथच्‍युत संघ वाली भाजपा केवल तोड़ेगी। जितना तोड़ा है, उससे ज्‍यादा और तेजी से तोड़ेगी। आपका ध्‍यान किधर है? असली टुकड़े-टुकड़े गैंग इधर है।

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