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उत्तराखंडः बागियों को झटका तो कोर्ट से मिली सरकार को राहत

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नैनीताल
आखिरकार उत्तराखंड राज्य में सरकार को बचाने और गिराने की जंग नैनीताल हाई कोर्ट पहुंच गई। सरकार के खिलाफ बगावत पर उतरे आठ विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने कांग्रेस के चीफ व्हिप इंदिरा हृदयेश की ओर से की गई शिकायत के आधार पर नोटिस भेजने को हाई कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी। सरकार और विपक्ष की ओर से लंबी बहस के बाद एकल पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। सरकार की ओर से पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने मोर्चा संभाला तो बागियों की ओर से सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने बहस की। यहां रोचक तथ्य यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा याचिकाकर्ता में शामिल नहीं थे, जिसको लेकर राजनीतिक हलकों में अटकलें तेज हैं।


रामनगर की विधायक अमृता रावत, जसपुर के शैलेंद्र मोहन सिंघल, केदारनाथ की शैलारानी रावत, राजपुर के उमेश शर्मा काउ, नरेंद्र नगर के सुबोध उनियाल, रुद्रप्रयाग के हरक सिंह रावत, खानपुर के कुंवर प्रणव चैंपियन, रुड़की के प्रदीप बत्रा की ओर से दो याचिकाएं दायर कर विधानसभा अध्यक्ष की ओर से दलबदल कानून के अंतर्गत भेजे गए नोटिस को चुनौती दी। बागियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी ने कोर्ट में दलील दी कि बागियों ने दल बदल कानून का उल्लंघन नहीं किया है। यहां तक की सरकार के खिलाफ वोट भी नहीं दिया है।

सरकार खुद कह रही है कि विनियोग विधेयक पारित हो चुका है। बागियों ने कांग्रेस की नहीं बल्कि सरकार के भ्रष्टाचार का विरोध किया। पेपर कटिंग व मीडिया रिपोर्‌र्ट्स के आधार पर नोटिस दिया जाना गलत है। सरकार की आलोचना करना अनुशासनात्मक श्रेणी में कैसे आ सकता है। कर्नाटक में 2011 में यदुरप्पा के खिलाफ भाजपा विधायकों के बगावत मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को जिक्र किया। उत्तराखंड विधानसभा की नियमावली का उद्धरण देते हुए कहा कि सदस्य से परामर्श, इच्छानुसार और समुचित कार्रवाई का मौका देकर नोटिस दिया जाना चाहिए, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने जल्दबाजी में नोटिस जारी कर दिया गया। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के नोटिस का जवाब देने के लिए अतिरिक्त समय की भी गुजारिश की गई। सरकार की ओर से पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने याचिका का विरोध करते हुए दलील दी कि बागी सदस्य कांग्रेस सरकार का विरोध कर रहे हैं, तो ऐसे में कांग्रेस पार्टी का विरोध नहीं करने की दलील न्यायसंगत नहीं है।


उन्होंने बागियों की ओर से दायर याचिका में भाजपा विधायकों के साथ राजभवन जाकर संयुक्त हस्ताक्षरयुक्त ज्ञापन को संलग्न नहीं करने को गंभीर सवाल खड़े किए। सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद-226 के अंतर्गत स्पीकर को नोटिस भेजने का अधिकार होने का जिक्र किया। उन्होंने कर्नाटक में यदुरप्पा सरकार के खिलाफ अविश्वास मत मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले के महत्वपूर्ण तथ्य कोर्ट के समक्ष रखे। दोनों पक्षों की दलीलों और तर्को को सुनने के बाद न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकल पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। पूर्व कानून मंत्री ने कहा कि स्पीकर ने अभी नोटिस दिया है, जो स्पीकर का संवैधानिक अधिकार है। हाई कोर्ट स्पीकर के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
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