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रहस्यमय है सरकार की चुप्पी, 24 जनवरी के बाद से किसानों और सरकार के बीच बातचीत नहीं

सरकार का कोई भी नुमाइंदा किसानों से संवाद करने का नाम तक नहीं ले रहा है।

रहस्यमय है सरकार की चुप्पी, 24 जनवरी के बाद से किसानों और सरकार के बीच बातचीत नहीं
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कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों और सरकार के बीच खाई पटती नजर नहीं आ रही है। एक ओर सरकार ने रहस्यमयी चुप्पी ओढ़ रखी है, वहीं दूसरी तरफ किसान रेल पटरी जाम करने के बाद आंदोलन को और भी धारदार बनाने के लिए जुट गए हैं।

करीब 3 महीने बीतने को है लेकिन किसान आंदोलन के चलते दिल्ली से सटे शहरों से दिल्ली आवाजाही करने वाले लोगों की समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। किसानों के विरोध प्रदर्शन के चलते गुरुवार को भी रेल रोको अभियान के दौरान चार घंटे तक रेल यात्री भी जहां- तहां फंसे रहे। विरोध प्रदर्शनों के दौर जारी हैं, किसान किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं लेकिन सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है। बीती 24 जनवरी के बाद सरकार और किसानों के बीच अभी तक कोई भी बातचीत नहीं हुई है। किसान सरकार से बातचीत आगे बढ़ाने को तैयार हैं लेकिन सरकार की ओर से कोई भी कदम ना बढ़ाया जाना बेहद हैरान-परेशान करने वाला है। सरकार का कोई भी नुमाइंदा किसानों से संवाद करने का नाम तक नहीं ले रहा है।

यह कहना तो नादानी ही होगी कि आंदोलन के चलते लोगों को हो रही परेशानी से सरकार अनजान है। आम जनता और किसान यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर सरकार किस कशमकश में उलझी है और उसका अगला कदम क्या होगा। किसान पूरी शिद्दत से यह चाहते हैं कि सरकार बातचीत के सिलसिले फिर से शुरू करें। भारतीय किसान यूनियन असली के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी हरपाल सिंह कहते हैं कि जिस तरह से सरकार ने चुप्पी साध रखी है उससे यह पता चलता है कि सरकार किसानों और उनकी समस्याओं को लेकर कितनी संवेदनशील है। किसानों की मांगों और उसकी समस्याओं को तवज्जो ना देकर सरकार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है।

काबिले गौर है कि किसान आंदोलन की चिंगारी दिल्ली से निकलकर देश के अन्य राज्यों तक पहुंचने लगी है। ऐसे में जल्द से जल्द मुद्दे का समाधान नहीं निकाला गया तो स्थितियां और भी खराब हो सकती हैं। सरकार को यह समझना होगा कि मर्ज जितना पुराना होता जायेगा इलाज उतना ही मुश्किल होगा।

विकास त्रिपाठी

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राजनीतिक संपादक
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