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लोकसभा संग्राम 75– मुजफ्फरनगर से अजित बिगाड़ेंगे मोदी की भाजपा का साम्प्रदायिक खेल,बागपत से जयंत लड़ेंगे चुनाव

कुल मिलाकर गठबंधन में शामिल रालोद अपना खोया हुआ जनाधार पाने के प्रयास में है। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे एक सीट मिली।

 Special Coverage News |  25 Feb 2019 1:12 PM GMT  |  बागपत

लोकसभा संग्राम 75– मुजफ्फरनगर से अजित बिगाड़ेंगे मोदी की भाजपा का साम्प्रदायिक खेल,बागपत से जयंत लड़ेंगे चुनाव
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लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ। जाटों के नेताओं मे सुमार राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया अजित सिंह मुजफ्फरनगर सीट से गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे इसका मतलब है कि गठबंधन की स्ट्रेटेजी देश में फैल रहे सियासी ज़हर का विनाश करना है। मुज़फ़्फ़रनगर लोकसभा सीट से चौधरी अजित सिंह का लड़ना मोदी की भाजपा के लिए सियासी तौर पर बहुत मज़बूत और टिकाऊ फ़ैसला है क्योंकि यहाँ पर कुल वोटो की संख्या 16 लाख है जिसमें मुसलमान छह लाख, दलित तीन लाख और जाटों के वोट तीन लाख तीस हज़ार है इस हिसाब से चौधरी अजित सिंह 12-13 लाख वोट में खड़े दिखाई दे रहे है इसको देखते हुए कहा जा सकता है कि चौधरी अजित सिंह मोदी की भाजपा के साम्प्रदायिक खेल को बिगाड़ देगे। वही उनके बेटे जयंत चौधरी बागपत से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे।चौधरी अजित सिंह हाल के दिनों में कह चुके हैं कि 2019 उनका अंतिम चुनाव होगा।


खास बात यह है कि चौधरी अजित सिंह अपनी पारंपरिक सीट बागपत अपने बेटे जयंत चौधरी के लिए छोड़ रहे है जिसमें जाट अपने नेता स्व.चौधरी चरण सिंह छवि देखते है।इसके पहले चौधरी अजित सिंह इस सीट से चुनाव लड़ते आ रहे थे।पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद का मज़बूत जनाधार माना जाता था लेकिन पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उनकी जाति ने उन्हें नकार दिया था साम्प्रदायिकता के चक्कर में इसका नकुसान ऐसा नही चौधरी अजित सिंह को ही उठाना पड़ा था बल्कि उनकी जाति की और किसानों की आवाज उठाने वाला भी नही रहा है जिसका नुक़सान उन दोनों को ही हुआ है अब सवाल उठता है कि क्या उनकी जाति का साम्प्रदायिक भूत उतर गया या अभी भी चढ़ा है लेकिन कैराना के उपचुनाव में ये साबित हो गया था कि अब उसको अपनी ग़लती का अहसास हो गया है हालाँकि उस उपचुनाव में जाट गठबंधन पर पूरा वापिस नही हुआ था पर हाँ ये कहा जा सकता है कि जो हालात थे उसमें कमी आई थी पर अब पूरे वापिस आने की संभावना व्यक्त की जा रही है। कैराना लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मिली जीत ने उसे वापसी का मौका दिया था उसी को ध्यान में रखते हुए रालोद को गठबंधन ने तीन सीट दी है।


बागपत लोकसभा सीट से चौधरी अजित सिंह ने आठ बार चुनाव लड़ा है और दो बार इस सीट पर उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा है। सपा-बसपा और रालोद के सीट शेयरिंग फॉर्मूले से यह साफ हो गया है कि रालोद बागपत, मथुरा और मुजफ्फरनगर सीट पर चुनाव लड़ने जा रहा है।नेताओं का कहना है कि 2013 के मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगों के बाद जाट वोटों का ध्रुवीकरण मोदी की भाजपा के पक्ष में हो गया था परन्तु जाटों की कयादत खतम हो गई थी जिसको जाट जाति का बुद्धिजीवी वर्ग महसूस कर रहा था असल में जाट जाति का साम्प्रदायिककरण इसी जाति के नौजवानों ने किया था जिसका ख़ामियाज़ा पूरी जाति भुगत रही है।पार्टी इस वोटबैंक को फिर से अपने पक्ष में एकजुट करना चाहती है।


चौधरी अजित सिंह का मुज़फ्फरनगर की सीट से चुनाव लड़ने के फैसले को पार्टी की दूरगामी रणनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है।मुजफ्फरगनर में करीब 3.30 लाख जाट मतदाता हैं जो इस निर्वाचन क्षेत्र के 16 लाख वोट का 22 प्रतिशत है।इस सीट पर छह लाख के लगभग मुस्लिम मतदाता हैं और हम यदि तीन लाख दलित वोटरों को इसमें जोड़ दें तो यह संख्या कुल वोटों के करीब 75 फीसद हो जाती है।इसके अलावा मुजफ्फरनगर की सीमा बागपत से भी मिलती है और यह सीट रालोद का गढ़ है।


चौधरी अजित सिंह ने पिछले दो वर्षों में अपनी 'भाईचारे' की रैलियों से जाट और मुस्लिम समुदाय को जोड़ने की कोशिशें की है। मुजफ्फरनगर की घटनाएं बागपत को भी प्रभावित करती हैं।इस तरह से वह दोनों जिलो में अपने वोटबैंक को एक एकजुट करते आए हैं।' कुल मिलाकर गठबंधन में शामिल रालोद अपना खोया हुआ जनाधार पाने के प्रयास में है।पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली जबकि 2017 के विधानसभा चुनाव में उसे एक ही सीट मिली।साल 2017 में कैराना सीट के लिए हुए उपचुनाव में उसे जीत मिली।


हालांकि इस सीट पर उसकी उम्मीदवार तबस्सुम हसन को सपा, बसपा और कांग्रेस का समर्थन प्राप्त था। कैराना सीट भाजपा सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद खाली हुई थी और इस सीट पर हुए उप चुनाव में तबस्सुम हसन ने स्व हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को हराया।तभी से इस गठबंधन की ताक़त को समझा जा रहा था कि साम्प्रदायिकता को नेस्तनाबूत करने के लिए सेकुलर दलों को मिलकर काम करना चाहिए उसी का परिणाम है कि आज गठबंधन ज़मीन पर एक स्वरूप बनकर जनता के सामने है आँकड़ो के हिसाब से कुल वोट 16 लाख में से गठबंधन का प्रत्याशी 13 लाख वोट में माना जा रहा है अगर गठबंधन का जादू चला जिसकी पूरी उम्मीद की जा रही है तो लगभग चौधरी अजित सिंह 9 से 10 लाख वोट लेकर लोकसभा चुनाव जीतने वालों में शामिल होगे।जहाँ तक मुसलमान और दलितों के वोटों की बात है ये माना जा रहा है कि वो दोनों ऑंख बंद करके गठबंधन को वोट करेगे।दोनों वोट ये नही देखेंगे कि खड़ा कौन है उसे ये देखना है कि गठबंधन वाले का चुनाव चिन्ह क्या है बस।


हमने बहुत मुस्लिमों से बात कर यह जानने की कोशिश की कि अगर चौधरी अजित सिंह गठबंधन के तौर पर प्रत्याशी होगे तो मुसलमान या दलितों मे कोई विरोध तो नही होगा 2013 के दंगे तो आड़े नही आएँगे यही सब सवालों को लेकर खुलकर चर्चा की पर जो फ़ीडबैक मिला उससे गठबंधन की ताक़त का अहसास हुआ।हमने मुज़फ़्फ़रनगर जनपद के गाँव गादला के निवासी मशकूर अहमद , शाहिद कुरैशी , जाहिद कुरैशी ,अमीर आज़म ,नय्यर , अब्दुल शकूर ,गफ़ूर अहमद , नसीम अहमद , अब्दुल वहाब ,ख़ुर्शीद अहमद ,नवाब अहमद , सईद अहमद व गुड्डू अहमद ,नदीम अहमद , दानिश अहमद , अनवार अहमद , शमशाद अहमद , दिलशाद अहमद , जमशेद अहमद व इरशाद अहमद आदि का यही कहना है कि लोकसभा चुनाव में हमने ये नही देखना है कि कौन खड़ा है हमें ये देखना है कि गठबंधन का निशान क्या है हम एकजुट होकर दलितों के साथ मिलकर गठबंधन को विजयी बनाएँगे।


इसके बाद हमने दूसरे गाँवों में भी यही जानने की कोशिश की कि गठबंधन की क्या सूरतें हाल रहेगी ग्राउंड ज़ीरो पर दलितों और मुस्लिमों में गठबंधन के अलावा कोई और बात करने को ही तैयार नही है इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मोदी की भाजपा को यूपी में गठबंधन बहुत परेशान करने वाला है।

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