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अयोध्या में लोगो का जमावड़ा, मंदिर बनाने की चाहत या सबसे बड़ा अति हिंदूवादी बनने की होड़

अयोध्या में लोगो का जमावड़ा, मंदिर बनाने की चाहत या सबसे बड़ा अति हिंदूवादी बनने की होड़
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अयोध्या में हुए लोगो के जमावड़े के बाद ज़हन में बार बार सवाल आ रहा है की आखिर केंद्र में साढ़े चार साल से हिंदूवादी मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश में हिन्दू अतिवादी योगी आदित्यनाथ सरकार होने के बावजूद इतना हंगामा करवाने की ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गयी की अचानक ही देखते देखते सभी हिन्दू अतिवादी संगठन राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के मुद्दे को लेकर उबल पड़े. यदि मंदिर ही बनवाना है तो अयोध्या में इतना हंगामा करने की बजाये संसद का घेराव किया जाता या सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन किया जाता.


लेकिन यहाँ तो कुछ अलग ही मंज़र देखने को मिल रहा था. भारत के सबसे बड़े हिंदूवादी संगठन आरएसएस के प्रमुख भगवत ने अचानक राम मंदिर को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए एक बयान जारी किया जिसमे भागवत ने कहा की केंद्र सरकार को कानून बना कर मंदिर बनाने का रास्ता साफ़ करना चाहिए. इस बयान के बाद सारी मीडिया में सिर्फ राम मंदिर ही मुद्दा बन गया और हर हिन्दू अतिवादी संगठन की और से बयान जारी होने शुरू हो गए. ये सब ऐसे हालात में हुआ जब चार राज्यों में विधान सभा चुनाव की प्रक्रिया चल रही है और लोगो का मानना है की भाजपा ने हिन्दू वोटो को िकटतः करने के लिए ये ड्रामा करना शुरू कर दिया है. लेकिन ये एक बिंदु हो सकता है लेकिन पूरी हक़ीक़त नहीं है.


अयोध्या में संघ, विहिप और संतो की सभा के बाद जिस प्रकार शिव सेना मैदान में उतरी उससे उलझनें और बढ़ गयी की आखिर अचानक इन संगठनों को आखिर हुआ क्या है जो एक दूसरे से बाज़ी ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. जब केंद्र में हिंदूवादी सरकार है तो फिर मंदिर बनाने के लिए ये रास्ता क्यों चुना जा रहा है. इस सवाल का जवाब हम पडोसी देश पाकिस्तान की सियासत के उदाहरण से समझ सकते हैं. पाकिस्तान में शुरूआती दौर में मज़हब के नाम पर बहुत सारे संगठन वजूद में आ गए जिनक दावा था किओ वह इस्लाम की रक्षा के लिए पैदा हुए हैं. धीरे धीरे ये संगठन इस्लाम की रक्षा छोड़ आपसी नफरत में उलझे जिसका नतीजा ये हुआ की पकिस्तान में मज़हबी संगठनो ने लाखो लोगो को मरवाया है. ऐसे ही भारत में अब बाहर सारे संगठन हिंदुत्व की रक्षा के लिए खड़े हुए हैं.


केंद्र में मोदी सरकार बनाने के लिए हर संगठन ने कोशिश की जिसमे उन्हें कामयाबी भी मिल गयी. सरकार बनने के बाद जिन मुद्दों पर इन संगठनो ने वोट मांगे थे उनमे कोई भी मुद्दा सरकार की नज़र में नहीं है. अपना वजूद क़ायम रखने के लिए हिन्दू अतिवादी सगठनो के पास मुद्दे ही नहीं हैं. मोदी सरकार जिस प्रकार आर्थिक मोर्चे व अन्य मोर्चो पर फेल हुई है उसका सबसे गंभीर असर आरएसएस पर पड़ा है. मोदी सरकार की नाकामी का ठीकरा आरएसएस पर भी फोड़ा जा रहा है.


सूत्रों का कहना है की संघ परिवार मोदी सरकार से संतुष्ट नहीं है. आरएसएस ने अपनी साख बनाये रखने के लिए राम मंदिर का मुद्दा जान बूझकर उठाया है. राम मंदिर का बहाने से आरएसएस ये सन्देश देना चाहता है की आरएसएस आज भी हिंदुत्व के मुद्दे पर पीछे नहीं हटा है. जब आरएसएस ने ये मुद्दा उठा कर अयोध्या में विहिप के साथ सभा करने का मन बनाया वैसे ही महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के खिलाफ मुहिम चलने वाकई शिवसेना भी सामने आ गयी. इससे ये साफ़ ज़ाहिर हो गया है की अनगिनत हिन्दू अतिवादी संगठनो में होड़ लग गयी है की आखिर कौन है असली हिन्दूवादी संगठन. अयोध्या में हुआ ये ड्रामा भी इसी की एक बानगी थी. अब आगे देखना ये है आगे चल कर कौन किस मुद्दे पर किससे बाज़ी मारता है.

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