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जब खबरों में अयोध्या शीर्ष पर है तो एक अयोध्यावासी होने के नाते मेरा भी मन अकुला रहा है कि मैं भी मंदिर आन्दोलन को याद करूं

जब खबरों में अयोध्या शीर्ष पर है तो एक अयोध्यावासी होने के नाते मेरा भी मन अकुला रहा है कि मैं भी मंदिर आन्दोलन को याद करूं
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तो हमारे मोहल्ले से जाने वाली सड़क मुश्किल से आधा किलोमीटर आगे 14 कोसी मार्ग में मिलती थी।

चंदन श्रीवास्तव

जहां हम रहते थे, वो फैजाबाद (अब अयोध्या) शहर का लगभग बीचोबीच का एक छोटा सा मोहल्ला था, शोलापुरी। शोलापुरी से निकलने वाली रोड उत्तर दिशा में आगे जाकर 14 कोसी परिक्रमा मार्ग पर निकलती थी। 14 कोसी परिक्रमा मार्ग सरयू जी के किनारे-किनारे बनाई गई है जो पूरे शहर को एक रिंग रोड की तरह घेरती है। इसी प्रकार 5 कोसी परिक्रमा मार्ग पूरे अयोध्या कस्बे को रिंग रोड की तरह घेरती है। 14 कोसी परिक्रमा मार्ग आगे चलकर 5 कोसी परिक्रमा मार्ग में मिल जाती है व और आगे जाकर दोनों अलग हो जाते हैं।

तो हमारे मोहल्ले से जाने वाली सड़क मुश्किल से आधा किलोमीटर आगे 14 कोसी मार्ग में मिलती थी।

1990 में अयोध्या ने मंदिर आन्दोलन का साक्षात्कार किया था। राज्य में सपा सरकार थी। 30 अक्टूबर 1990 को तय था कि देश के कोने-कोने से आए कारसेवक रामलला (राम को अयोध्या में रामलला ही कहते हैं) के दर्शन करेंगे। किसी प्रकार से कानून को हाथ में लेने की कोई आम चर्चा नहीं थी। लेकिन इसी बीच मुल्ला के नाम से बाद में प्रसिद्ध हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का एक बयान आया कि अयोध्या में कोई घुस नहीं सकता और विवादित स्थल पर परिन्दा भी पर नहीं मार पाएगा।

उनके इस अकेले बयान ने मंदिर आन्दोलन में घी का काम किया। कारसेवकों ने इसे चुनौती के तौर पर लिया। अयोध्या-फैजाबाद शहर के चप्पे-चप्पे पर प्रादेशिक और केन्द्रीय बलों की तैनाती कर दी गई और अयोध्या में किसी के भी घुसने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। कारसेवक मुल्ला के बयान को चुनौती के तौर पर ले चुके थे। सैकड़ो किलोमीटर की पैदल यात्रा कर के वे फैजाबाद में तो दाखिल हो गए लेकिन अयोध्या में घुसना वास्तव में एक चुनौती थी।

यहां मैं एक स्वीकारोक्ति करूंगा कि मुझे 1990 की हर घटना नहीं याद है। लेकिन कारसेवकों के जत्थों का हमारे मोहल्ले से गुजरना अच्छी तरह याद है। उनके दर्जनों नहीं सैकड़ों जत्थे हमारे मोहल्ले से 30 अक्टूबर 1990 को गुजर रहे थे क्योंकि मुख्य मार्गों से अयोध्या में दाखिल होना सम्भव नहीं था। वे 14 कोसी परिक्रमा मार्ग पकड़ कर अयोध्या में दाखिल हो रहे थे। जब वे गुजरते थे तो मोहल्ले के लोग घरों से बाहर आकर उन्हें देखते और मोहल्ले के कुछ उत्साही उनके जयकारों में अपनी भी आवाज मिलाते।

इसी दौरान सिखों का एक जत्था गुजर रहा था। लगभग सभी पगड़ी धारी सरदार थे। उस जत्थे के कुछ कारसेवकों ने हमारे मोहल्ले के मर्दों को लानत भेजी। वे चिल्ला कर कह रहे थे कि चूड़ियाँ पहन कर घर में क्यों नहीं बैठते तुम लोग।

यह बात मोहल्ले के लोगों को चुभ गई। उन्होंने तय किया कि वे भी रामलला का दर्शन करने जाएंगे और परिन्दा भी पर नहीं मार सकता कहने वालों को उनकी औकात बता कर रहेंगे। हमारे मोहल्ले के जत्थे में मेरे पिताजी भी शामिल थे। हालांकि ये जत्था रामजन्म भूमि तक नहीं पहूंच सका और अयोध्या में घुसते ही इन सभी को गिरफ्तार कर के पुलिस ने दूर कहीं छोड़ दिया, जहां से वे सभी पैदल घर आए।

उधर जो कारसेवक रामजन्म भूमि तक पहुँच चुके थे उन्होंने बाबरी ढांचे पर भगवा लहरा कर तत्कालीन मुख्यमंत्री मुल्ला मुलायम सिंह के परिन्दा पर मारने की उनकी शेखी की धज्जियां उड़ा दीं। इस दौरान कुछ कारसेवकों को बलिदान भी देना पड़ा।

लेकिन कारसेवकों को उस दिन बड़ी मात्रा में बलिदान नहीं देना पड़ा जब वे मोर्चा लेने को तैयार थे बल्कि इसके दो दिन बाद 2 नवंबर 1990 को मुल्ला मुलायम ने बड़ी मात्रा में कारसेवकों को सुरक्षा बलों की गोलियों से मरवाया। इसी दिन कोठारी बंधुओं की भी जान गई।

.......क्रमशः

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