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विकास दुबे की असली कहानी क्या है?

 Shiv Kumar Mishra |  3 July 2020 5:36 PM GMT  |  दिल्ली

विकास दुबे की असली कहानी क्या है?
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कानपुर में पुलिस हत्याकांड करने वाले विकास दुबे के कारनामों की चर्चा सिर्फ यूपी में ही नहीं बल्कि पूरे देश में हो रही है. बहुत कम घटनाएं ऐसी होती हैं, जब कोई अपराधी पुलिस पर इतना बड़ा घातक हमला करे, जिसमें 8 पुलिसकर्मियों की जान चली जाए. तो क्या विकास दुबे यूपी के चर्चित माफियाओं की सूची में अगला नाम शामिल हो गया है? अपराधियों को बहुत करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार ऐसा नहीं मानते. तो आखिर कैसे अलग है विकास दुबे उत्तर प्रदेश के बाकी माफियाओं से?

वर्षों तक क्राइम रिपोर्टिंग कर चुके वरिष्ठ पत्रकार हेमंत तिवारी का कहना है कि विकास दुबे का चरित्र उत्तर प्रदेश के स्थापित माफियाओं से कतई भिन्न है. उत्तर प्रदेश के जितने भी चर्चित और स्थापित माफिया हैं या रहे, उन्होंने कभी पुलिस पर घात लगाकर हमला नहीं किया. उनकी मंशा कभी पुलिसकर्मियों की हत्या करने की नहीं रही बल्कि वे तो हमेशा पुलिस संरक्षण पाने की फिराक में लगे रहते थे. यही वजह रही कि जिस तरीके का हमला कानपुर में पुलिस पार्टी पर हुआ और 8 की जान चली गई, ऐसा बहुत कम ही उत्तर प्रदेश के इतिहास में देखने को मिला है.

खुद बचाने के लिए ही पुलिस पर चलाई गोली

हेमंत तिवारी ने बताया कि यदि किसी बदमाश की गोली से किसी पुलिसकर्मी की मौत हुई भी है तो वह एनकाउंटर के दौरान ही हुआ. तब अपराधी को इस बात का इल्म नहीं था कि पुलिस ने उसे घेर लिया है. आत्मरक्षा में उसने पुलिस वाले की जान ली. ऐसा ही प्रकरण श्री प्रकाश शुक्ला का याद करते हुए तिवारी बताते हैं कि जब लखनऊ के जनपथ मार्केट में पुलिस ने श्री प्रकाश शुक्ला को घेर लिया था, तब उसने एक सब इंस्पेक्टर की जान ले ली थी. ऐसा कभी नहीं हुआ है कि किसी अपराधी को पता हो कि यहां पुलिस आ रही है और घात लगाकर उसने पुलिसकर्मियों की हत्या की हो. यूपी के माफियाओं को यदि कभी इस बात की भनक लग भी गई कि पुलिस उसका एनकाउंटर करने आ रही है तो वे पुलिस पर हमला करने के बजाए भाग निकलने की हमेशा कोशिश करते रहे हैं.

विकास दुबे मनबढ़ टाइप बदमाश

विकास दुबे को पहले से पुलिस के आने की सूचना थी. फिर भी उसने बच निकलने के बजाय के बजाय पुलिसकर्मियों की योजनाबद्ध हत्या कर दी. हेमंत तिवारी कहते हैं कि ऐसा एक मनबढ़ अपराधी ही कर सकता है. विकास दुबे लोकल टाइप का बदमाश रहा है और उसके कृत्य ऐसे नहीं रहे हैं, जिससे उसका नाम यूपी के बड़े माफियाओं की सूची में शामिल किया जा सके. जिस तरह से उसने पुलिस पार्टी को निशाना बनाया है यह साफ है कि विकास दुबे का नाम जल्दी ही मिटने वाला है.

साजिश करके पुलिसकर्मी की हत्या का इतिहास नहीं

वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह तो इस घटना से बेहद दंग है. राजकुमार सिंह ने बताया कि यूपी के किसी भी माफिया या बड़े अपराधी ने इस तरीके से साजिश करके पुलिसकर्मियों की हत्या कभी नहीं की. यह हत्याकांड नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की याद दिलाता है. पुलिस पार्टियों पर इस तरीके से एंबुश करके उनकी जान लेने का कृत्य नक्सलियों द्वारा ही देखी गई है. यूपी के इतिहास में किसी अपराधी द्वारा इतनी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की हत्या पहली बार सामने आई है. यहां तक की चंबल के बीहड़ों के डकैतों ने भी अमूमन ऐसा हत्याकांड अंजाम नहीं दिया है. उनसे मुठभेड़ में भी पुलिसकर्मियों की शहादत तब हुई, जब वे पुलिस के भागने की फिराक में गोली चलाए या फिर घिर जाने पर गोली चलाई. साभार

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