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फिर विवादों से घिरा मोदी सरकार का सीबीआई निदेशक की नियुक्ति का मामला

पहले नंबर पर यूपी कैडर के 1984 बैच के आईपीएस सैयद जावीद अहमद दूसरे यूपी कैडर के ही 1983 बैच के राजीव राय भटनागर 170 दिन व तीसरे नंबर पर तमिलनाडु कैडर के 1984 बैच के सुदीप लखटकिया 155 दिन व ए पी महश्वरी 147 दिन का नाम था।

 Special Coverage News |  3 Feb 2019 9:43 AM GMT  |  दिल्ली

फिर विवादों से घिरा मोदी सरकार का सीबीआई निदेशक की नियुक्ति का मामला
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लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ। विवादों में बने रहना मानों मोदी सरकार की आदत बन गई लगती है केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई जिसको सबसे सर्वोच्च जाँच एजेंसी माना जाता था लेकिन सरकारों के ग़लत तरीक़ों से इस जाँच एजेंसी की (सरकारी तोता) के नाम से पहचान बना चुकी है इसकी वजह सरकारों के द्वारा अपने लाभ के लिए इसके निदेशक की नियुक्ति की जाती है क्योंकि अगर सही अफ़सर को नियुक्त किया जाएगा तो वह ग़लत तरीक़ों से सरकार के इसारो पर नही चलेगा और वह काम भी सही करेगा और फिर उस पर कोई उँगलियाँ भी नही उठाएगा इस सर्वोच्च जाँच एजेंसी को बदनाम करने में सरकारों का काफ़ी योगदान रहा है इससे इंकार नही किया जा सकता है।


प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति की बैठक में प्रस्तावित नामों को लेकर समिति के सदस्य कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के विरोध के बाद एक ऐसे अफसर को नियुक्त कर दिया जिसे सीबीआई के मामलों में अनुभवहीन कहा जा रहा है हाँ अगर उनको अनुभव है तो वह बस मोदी की भाजपा के नेता शिवराज सिंह चौहान के क़रीबी है बस यही वजह है सरकारी तोते के नए निदेशक की नियुक्ति का नही तो इस पद के सही हक़दार यूपी कैडर के वरिष्ठ आईपीएस सैयद जावीद अहमद थे क्योंकि उन्हें सीबीआई में कार्य करने का 303 दिन का अनुभव है इसी को मुद्दा बना कांग्रेस के नेता खड़गे विरोध कर रहे है कि शुख्ला की नियुक्ति मानकों के विपरीत है ऐसी नियुक्ति करने का हश्र क्या होता है इसका हाल देश ने देखा है किस तरह सीबीआई के निदेशक व उप निदेशक के बीच विवाद सड़कों पर आया और सर्वोच्च जाँच एजेंसी की फ़ज़ीहत हुई लेकिन मोदी सरकार तो सत्ता के नशे में चूर है उसे किसी जाँच एजेंसी की फ़ज़ीहत से कोई लेना देना नही उसे तो बस अपने लक्ष्य को साधना है अब किसी का कुछ हो इससे उसे कोई लेना देना नही है बताया जा रहा था कि इस अहम नियुक्ति के लिए यूपी के 1984 बैच के वरिष्ठ आईपीएस सैयद जावीद अहमद जो इस समय राष्ट्रीय अपराधशास्त्र एवं विधि विज्ञान संस्थान के प्रमुख पद पर तैनात है वही दूसरे रजनी कांत मिश्रा, एस एस देसवाल का नाम दौड़ में शामिल था लेकिन मोदी सरकार ने सीबीआई निदेशक के पद पर एमपी कैडर के आर के शुख्ला को नियुक्त करने का ऐलान किया है इस ऐलान के बाद चयन समिति के सदस्य एवं नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का वह पत्र भी सामने आया है जिसमें उन्होने तीन अफसरो के नाम सुझाए थे उनमें शुख्ला का नाम नही था मध्य प्रदेश कैडर के अफसर और राज्य के डीजीपी रहे तीन दिन पहले ही हटाए गए ऋषि कुमार शुख्ला को सीबीआई का निदेशक बनाए जाने के बाद एक बार फिर विवाद शुरू हो गया है लोकसभा में नेता विपक्ष एवं चयन समिति के सदस्य मल्लिकार्जुन खड़गे इस नियुक्ति के विरोध में सामने आ गए है।


खड़गे का कहना है कि शुख्ला की नियुक्ति नियम विरूद्ध है जिनके आधार पर सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति होनी चाहिए थी खड़गे ने तीन अफसरो के नाम सुझाए थे जिसको नियमों के तहत बताए जा रहे है खड़गे का पैमाना अनुभव था जिसमें पहले नंबर पर यूपी कैडर के 1984 बैच के आईपीएस सैयद जावीद अहमद दूसरे यूपी कैडर के ही 1983 बैच के राजीव राय भटनागर 170 दिन व तीसरे नंबर पर तमिलनाडु कैडर के 1984 बैच के सुदीप लखटकिया 155 दिन व ए पी महश्वरी 147 दिन का नाम था। इनमें सैयद जावीद अहमद को सबसे ज़्यादा अनुभव है 303 दिन का और बेहद इमानदार अफसरो में सुमार होते है उनकी इमानदारी उनका ज़ेवर मानी जाती है अगर सैयद जावीद अहमद जैसे अफसर सीबीआई के निदेशक नियुक्त होते तो शायद इस सर्वोच्च जाँच एजेंसी पर लगा सरकारी तोते का दाग भी हठ जाता क्योंकि वह कानून की हिफ़ाज़त के लिए जाने जाते है उनके रहते कोई ग़लत काम न होता इसकी लोग गवाही देते है यूपी जैसे राज्य का पुलिस महानिदेशक रहना कोई कम बात नही है जिस पर रहते पक्ष हुआ या विपक्ष उनके काम पर उँगली नही रख पाया जहाँ तक उनके व्यक्तित्व की बात है तो वह सरल भी और सख़्त भी ग़लत उनसे बचा नही सही उनसे छूटा नही एक मामले में बसपा सुप्रीमो मायावती को जाँच के दौरान तीन घंटे तक सामने बैठाकर पसीने दिला दिए थे यह सबने देखा था ख़ैर सरकार को तो ऐसा अफसर चाहिए ही नही था वह इस महत्वपूर्ण पद पर किसी ऐसे ही अफसर की तलाश में थी जो अफसर कम और उसकी कटपुतली ज़्यादा रहे विपक्षियों को नचाते रहे बस और कुछ नही शायद ऋषि कुमार शुख्ला उस पर खरे उतरे पर ऐसा भी हो सकता है जैसे पूर्व निदेशक आलोक वर्मा निकले सरकार ने तो उनको भी यही समझकर नियुक्त किया था लेकिन क्या हुआ सरकार को तो शर्मशार होना ही पड़ा और सीबीआई की अलग रार सड़कों से लेकर अदालत तक दिखाई दी कि कैसे आधी रात में सीबीआई मुख्यालय को पुलिस ने घेरा था।


खड़गे के विरोध के बाद सरकार की तरफ़ से प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह सामने आए और उन्होने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि मल्लिकार्जुन खड़गे जो कह रहे है वह तथ्यों पर आधारित नही है उन्हें तो यही बात कहनी थी सरकार जो ठहरी।शुख्ला को तीन दिन पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के द्वारा राज्य की कानून व्यवस्था संभाल पाने में नाकाम होने से बेहद ख़फ़ा चल रहे थे जिसके चलते उन्हें डीजीपी के पद से हटाया गया था जो अफसर वहाँ नाकाम रहे कानून व्यवस्था संभालने में तो वह देश की सर्वोच्च जाँच एजेंसी को कैसे संभाल पाएगा इस पर भी सवाल उठ रहे है लेकिन यहाँ सरकार को जाँच एजेंसी को थोड़ा ही संभलवानी है बस विपक्ष को संभाल सरकार बनवानी है शायद यह काम कर जाए।तो बस यही कहा जा सकता है कि फिर विवादों में घिरा मोदी सरकार का सीबीआई निदेशक की नियुक्ति का मामला विवादों में रहना मोदी सरकार की नीति बन गई है कोई भी कार्य बिना विवाद के संपन्न नही होता है अब यह विवाद कब तक चलता है या यही खतम होता है यह आने वाले दिनों में पता चलेगा।

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