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अविश्वास,डर,ख़ौफ़,सरकारें प्रशासन, और मुसलमान

उन्हें पता था कि हमें अपनी माँगों को सरकार और दुनियाँ के सामने कैसे रखना है इसी का परिणाम है कि कोई घटना घटित नहीं होती हैं।

 Shiv Kumar Mishra |  18 April 2020 3:10 AM GMT  |  दिल्ली

अविश्वास,डर,ख़ौफ़,सरकारें प्रशासन, और मुसलमान
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लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ। अविश्वास , डर , ख़ौफ़ ,सरकारें , प्रशासन एवं सरकारी तंत्र और भारतीय मुसलमान।मुसलमान ही क्यों सवालिया घेरे में खड़ा रहता है इसकी क्या वजह है इस पर क्यों विचार नहीं किया जाता है क्यों मुरादाबाद, इंदौर ,बैंगलुरु व टोंक होता है ? इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि जहाँ भी इस तरह की घटना घटे उसे सही समझा जाए उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है मुस्लिम एवं ग़ैर मुस्लिमों के सभी बुद्धिजीवियों सामाजिक संगठनों ने एक सुर में उसे ग़लत करार दिया है जो उचित भी है ग़लत को ग़लत कहना भी चाहिए।

मुरादाबाद , इंदौर , बैंगलुरु एवं टोंक जैसी घटनाओं के पीछे कौनसे असहयोग की भावना काम कर रही है इस पर भी हमें गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा जिससे इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो लेकिन इस पर तो हमें विचार करना ही नहीं है बस मुसलमानों को सवालिया घेरे में खड़े रखना है ? चाहे वह मीडिया हो या बुद्धिजीवी वर्ग हर कोई लग जाता उन्हें कोसने जिसे उचित नहीं कहा जा सकता है।मुसलमानों में ही क्यों इस तरह के मामले पेश आते हैं किसी और में क्यों नहीं ? वह तुरंत हाथ में पत्थर क्यों उठा लेता है चाहे वह मुरादाबाद हो , इंदौर हो , बैंगलुरु हो टोंक हो या किसी अन्य जगह सब जगहों पर मुसलमान ही क्यों ? सरकार एवं प्रशासन मुसलमानों में विश्वास क्यों क़ायम नहीं कर पा रहे हैं ? इसके पीछे क्या कोई द्वेष भावना काम कर रही है ? भारतीय मुसलमान जो आज कल कोरोना वायरस जैसी महामारी से चल रही जंग में स्वस्थ्य कर्मियों और पुलिस प्रशासन पर पत्थर फेंक विरोध कर रहा है जिसकी वजह से वह मीडिया और बुद्धिजीवियों के निशाने पर हैं इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है क्या वह अशिक्षित अज्ञानी मुसलमान ज़िम्मेदार हैं या वह जिसने आज़ादी के बाद से आज तक उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया कि वह किस तरह अपना जीवन जीने को विवश हैं या यूँ भी कहा जा सकता है कि उन्हें पता तो है कि वह कैसे जीवन जीने को विवश हैं परन्तु उससे निपटने के लिए एक षड्यंत्र के तहत कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई गई है जबकि पूर्व की सरकारों ने यह पता लगाने के लिए एक समिति का गठन कर यह पता किया भी था।समिति ने मुसलमानों पर अपनी पूरी रिपोर्ट तैयार की थी कि भारतीय मुसलमान किस प्रकार से अपना जीवन व्यतीत कर रहा समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी जिसके बाद उस पर काफ़ी चर्चा हुई थी फिर उसके बाद पूर्व की सरकार ने यह महसूस किया कि मुसलमान के जीवन स्तर को उठाने के लिए क्या किया जाए कैसे इसको देश की मुख्य धारा में शामिल किया जाए इसके लिए फिर एक सदस्य आयोग का गठन किया गया उसने समिति के अनुरूप अपनी रिपोर्ट दी कि कैसे मुसलमान के जीवन स्तर को उठा कर उन्हें देश की मुख्य धारा में शामिल किया जा सकता है लेकिन आज तक ईमानदारी और दयानतदारी से उस पर अमल करने की कोशिश नहीं की गई है।समिति और एक सदस्य आयोग ने साफ़तौर पर कहा कि भारतीय मुसलमानों का स्तर दलितों से भी बत्तर है यह सब होने के बाद भी अगर मुसलमान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह एक जागरूक नागरिक की तरह प्रदर्शन करे तो यह नाइंसाफ़ी है यह अपेक्षा रिपोर्ट आने से पहले की जा सकती थी क्योंकि इस बात की जानकारी ही नहीं थी कि वह ऐसा क्यों करता है समिति की रिपोर्ट ने सब कुछ साफ़ कर दिया था।

अगर किसी आदिवासी को कपड़े पहनने के लिए दिए जाए और उसे यह न समझाया जाए कि इनको उतार कर धोया भी जाता है ऐसा नहीं किया गया तो यह आपके लिए नुक़सानदायक साबित होंगे क्योंकि उसे तो पता ही नहीं है वह तो उसे पहने रहेगा इस सूरत में आपके द्वारा दिए गए कपड़ों के कोई मायने नहीं है।यही हाल भारतीय मुसलमान का है क्योंकि उसके लिए कुछ करना तो दूर की बात है प्रयास भी नहीं किए गए इस लिए उसे लगता है कि सरकार और प्रशासन उसकी बेहतरी के लिए कुछ नहीं कर सकता है इस लिए वह इस तरह के काम करता है जो सही नहीं है हालाँकि मुसलमान जो भी कर रहा है उसके अधिकांश लोगों को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि क्या सही है और क्या ग़लत ? दलितों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए गए जिसका परिणाम है कि आज उनका जीवन मुसलमानों से बहुत बेहतर कहा जा सकता है उनमें IAS , IPS , PCS , PPS , PCSJ , सहित अन्य नौकरियों में आरक्षण के चलते या अपनी मेहनत के बल पर आ गए हैं यही नहीं दलित डाक्टर , इंजीनियर आदि भी है जो हिन्दुस्तान की तरक़्क़ी में भागीदार बने हुए हैं ऐसा नहीं है कि मुसलमान नहीं हैं मुसलमान भी है जो अपनी क़ाबिलियत के दम पर हिन्दुस्तान की तरक़्क़ी में भागीदार बने हुए हैं ऐसे बहुत नाम हैं जिन्हें यहाँ गिनाना उचित नहीं है सबको मालूम है लेकिन उन्हें काफ़ी नहीं कहा जा सकता है यही वजह है अज्ञानी मुसलमानों में शिक्षा की कमी के चलते मुरादाबाद , इंदौर और बैंगलुरु बनने की आशंका बनी रहती हैं।

ये भावना क्यों पैदा हुई ये भी शोध का विषय है।नेताओं के द्वारा बयानबाज़ी भी एक बहुत बड़ा कारण है राज्य के मुख्यमंत्री विधानसभा में सत्र के दौरान कहते हैं कि अगर कोई मरने के लिए आ ही रहा है तो मैं क्या करूँ वह तों मरेगा ही कभी कहते हैं कि साफ़तौर पर कहना चाहता हूँ कि अब कोई क़यामत नहीं आने वाली है जो इस भ्रम को पाले बैठे हैं वह इस भ्रम को निकाल लें कोई कहता है कि ऐसा बटन दबाना होगा जिसका करंट फला जगह लगे।क्या इस तरह की भाषा की किसी संविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जा सकती है इस तरह की बयानबाज़ी से अज्ञानी मुसलमान के दिल में पनपी ग़लत भावनाओं को बल मिलता है।चुनाव जीतने के लिए ग़लत भाषा का इस्तेमाल कर आप चुनाव जीत सकते है परन्तु उससे देश में साम्प्रदायिकता की खाई खोदने का काम किया जा रहा है जिसे उचित नहीं कहा जा सकता हैं।जहाँ इस पर चर्चा हो रही है कि मुरादाबाद , इंदौर एवं बैंगलुरु जैसी घटना के ज़िम्मेदारों के विरूद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए बिलकुल होनी चाहिए लेकिन क्या इस पर गंभीर चर्चा नहीं होनी चाहिए कि उनमें ऐसी भावना क्यों उत्पन्न हुई उसको दूर करने के लिए क्या किया जाए।

इस तरह की घटना केरल में क्यों नहीं होती या अन्य राज्यों में क्यों नहीं होती वही क्यों होती हैं जहाँ मुसलमानों में शिक्षा की कमी है एक सवाल यह भी आएगा कि किसी ने उनको शिक्षित होने से रोका थोड़ाई है बिलकुल सही रोका किसी ने नहीं है लेकिन उनको जागरूक करने के लिए मौक़े दिए जाने की आवश्यकता है जैसे दलितों को दिए गए हैं तब जाकर न कोई मुरादाबाद, इंदौर एवं बैंगलुरु जैसी घटना होगी।मिसाल के तौर पर CAA ,NPR व संभावित NRC को लेकर हुए आंदोलन में ऐसी कोई घटना क्यों नहीं हुई क्योंकि उस आंदोलन को शिक्षित लोग चला रहे थे जबकि कुछ ऐसे संगठनों से जुड़े लोगों के द्वारा जो साम्प्रदायिक है ऐसे प्रयास किए गए मीडियाकर्मियों सहित कि यह आंदोलन उग्र रूप धारण कर ले परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं होने दिया उन्हें मालूम था कि वह जो माँग कर रहे हैं वो संविधान के अनुसार कर रहे हैं उन्हें पता था कि हमें अपनी माँगों को सरकार और दुनियाँ के सामने कैसे रखना है इसी का परिणाम है कि कोई घटना घटित नहीं होती हैं।

इसी आंदोलन के शुरूआत में यूपी के कुछ जगहों पर मुसलमान ने पत्थर हाथ में लेने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ से पत्थर लेकर भारतीय संविधान और राष्ट्रीय ध्वज दिया गया और उसने लिया भी अगर उसको ईमानदारी से समझाया जाए तो बेहतर परिणाम सामने आएँगे इससे इंकार नहीं किया जा सकता है CAA , NPR संभावित NRC का आंदोलन बिना हिंसा के आज़ादी के बाद का सबसे लंबा चलने वाला आंदोलन बना और इतिहास भी जो कोरोना वायरस की महामारी की वजह से स्थगित हुआ यह हम सबने देखा इसका मतलब यह हुआ कि मुसलमानों के हाथ में पत्थर हमारी सरकारों की उनके प्रति ईमानदारी से काम नहीं करने की वजह से हैं अगर वह सच में मुसलमानों को देश की मुख्य धारा में शामिल करना चाहती है तो उसे इस दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे जो अब तक नहीं हुए ताकि भविष्य में कोई मुरादाबाद इंदौर एवं बैंगलुरु जैसी घटना न घटे हाँ अगर सिर्फ बयानबाज़ी से आरोप-प्रत्यारोप करना ही मक़सद है फिर वह तो आज़ादी के बाद से होता चला आ रहा है अब भी वही हो रहा है चार पाँच दिन या महीने साल इसी तरह आरोप-प्रत्यारोप होकर बंद हो जाएगा और फिर कोई नया मुरादाबाद इंदौर एवं बैंगलुरु होगा और फिर वही घिसापिटा पुराना राग अलापेंगे और ख़ामोश हो जाएँगे।अच्छा होगा उन समितियों की सिफ़ारिशों पर ईमानदारी दयानतदारी से काम करे और हमेंशा के लिए इस बीमारी को ख़त्म करने का प्रयास करें यही देश के लिए बेहतर उपाय होगा।

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