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2014 के मुकाबले 2019 में दलित पिछड़ों के वोट रुके तो बेड़ा पार, चले गए तो बंटाधार!

 Special Coverage News |  11 March 2019 5:48 PM GMT  |  लखनऊ

2014 के मुकाबले 2019 में दलित पिछड़ों के वोट रुके तो बेड़ा पार, चले गए तो बंटाधार!
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भले ही भाजपा के नेता सपा बसपा गठबंधन को ठग बंधन या बुआ भतीजे का गठबंधन बता कर हल्के में ले रहे हो, लेकिन यह सोलह आने सच है कि पूरे 5 साल देश में व 22 महा उत्तर प्रदेश में सरकार चलाने वाली भाजपा के इसी गठबंधन ने दांत खट्टे कर दिए हैं। हालांकि कांग्रेस का अलग रहना भाजपा की परेशानी कम करने को काफी है इसके बावजूद प्रधानमंत्री राष्ट्रीय अध्यक्ष, मुख्यमंत्री सहित तमाम भाजपाइयों की ताबड़तोड़ रैलियां व बैठक भाजपा के कमजोर होने का संदेश दे रही है।


मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जहां मोदी जी का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में दलित पिछड़ों को केशव प्रसाद मौर्य के मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद थी। वही देश की जनता कांग्रेस को सरकार से विदा करना चाहती थी तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव से निजात पाना चाहती थी। लेकिन बड़े भरोसे के साथ पूर्ण बहुमत से आई मोदी सरकार ने भले ही देश का नाम रोशन करने का काम किया हो या योगी जी ने उत्तर प्रदेश में दलित पिछड़ो से दूरी बनाने का काम किया हो। लेकिन देश के जरूरतमंद मतदाताओं का भरोसा नहीं जीत सके। रही सही कसर नोट बंदी व जीएसटी ने पूरी कर दी। बताते हैं कि नोट बंदी करके सरकार भले ही यह कह कर खुश हो रही हो कि नोटबंदी ने काला कारोबार व टैक्स चोरी करने वालों की कमर तोड़ डाली, लेकिन वास्तव में मोदी जी की नोटबंदी ने देश की उन गरीब महिलाओं व पुरूषों की उम्मीद पर पानी फेर दिया जिन्होंने किसी तरह अपने पति से छिपा कर कुछ धनराशि जरूरत के समय के लिए इकट्ठा की थी।


इतना ही नहीं नोटबंदी और जीएसटी की चपेट में 10% बड़े कारोबारी भले ही आए हो। लेकिन 90% मझोले व छोटे कारोबारियों को बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। जिनमें से काफी हद तक तो कारोबार छोड़कर ही भाग खड़े हुए। खास बात तो यह है कि 2014 में दलित पिछड़ों व महिलाओं का बंपर वोट लेने वाली भाजपा उन्हें भी संतुष्ट नहीं कर पाई। कुल मिलाकर देश के प्रधानमंत्री बने श्रीमान नरेंद्र मोदी ने भले ही खुद को पिछड़ा बताने या बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर का फोटो गले में डालकर ट्रिपल तलाक के साथ खुद को इनका हितैषी बनाने का भरसक प्रयास किया हो, लेकिन आरक्षण विरोधी कार्य शैली ने भाजपा को दलित पिछड़ों से दूर कर दिया। हद तो तब हो गई जब केशव प्रसाद मौर्य के कंधे पर बंदूक रखकर 2017 का विधानसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा ने सवा तीन सौ सीटें पाने पर गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना डाला। जो दलित पिछड़ों की उम्मीद के मुताबिक सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट भी लागू नहीं कर सके।

अब जब 2019 का चुनाव तैयार खड़ा है और अधिसूचना जारी होने वाली है तो दलित पिछड़ों का हितैषी बनने वाली भाजपा ने वोट की खातिर 15 दिन पहले राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष बनाया है ।और विश्वविद्यालय में विषय को विभाग मानकर हजारों नियुक्तियां करने के बाद पुरानी व्यवस्था बहाल करने का दावा किया है। ऐसे में यदि भाजपा दलित पिछड़ों को सपा बसपा गठबंधन से दूर रखने में कामयाब हो जाती है तो भले ही परिणाम भाजपा के पक्ष में आ जाए। वरना गठबंधन ने भाजपा नेताओं को दिन-रात दौड़ने को मजबूर कर दिया है।

अभी भाजपा पर पूरी तरह से आरक्षण विरोधी होने का आरोप लगा ही था की रही सही कसर पुलिस उप निरीक्षक के परिणाम व चकबंदी लेखपाल के विज्ञापन ने पूरी कर दी जिसमें पूरी तरह से आरक्षण व्यवस्था को अनदेखा किया गया है। उपनिरीक्षक में तों भर्ती बोर्ड को दलित योग्य ही नहीं मिले। कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि दलित पिछड़ों के वोट भाजपा पर रुके तो अलग बात है, वरना उत्तर प्रदेश में भाजपा का बंटाधार होने की संभावनाएं बढ़ती नजर आ रही है ।हालांकि भाजपा ने अब तक अलग-थलग किए गए केशव प्रसाद मौर्य को फिर से उत्तर प्रदेश के चुनाव की जिम्मेदारी दी है लेकिन प्रत्याशी तय करने में वह कितने निर्णायक रहेंगे यह सोचने का विषय है।


भाजपा की जीत की चाबी भी देश में ना सही उत्तर प्रदेश में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के पास मानी जा रही है। क्योंकि उत्तर प्रदेश के दलित पिछड़ों को उनसे विशेष लगाव हो गया है अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस तरह से सपा बसपा व कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में आरक्षण को ध्यान में रख प्रत्याशी बनाने का फार्मूला बनाया है ऐसे में यदि भाजपा अन्य दलों से दो चार प्रतिशत ज्यादा प्रत्याशी बना कर संदेश दे देती है तो ठीक है, वरना पूरी तरह से आरक्षण विरोधी होने का ठप्पा लगी भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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