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लोकसभा संग्राम 31 : पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों की अँगड़ाई से बदलेगी 2019 की लडाई ?

 Special Coverage News |  9 Dec 2018 4:52 AM GMT  |  दिल्ली

लोकसभा संग्राम 31 : पाँच राज्यों के चुनाव परिणामों की अँगड़ाई से बदलेगी 2019 की लडाई ?
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लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी

राज्य मुख्यालय लखनऊ। पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के परिणाम तो 11 दिसंबर को आएँगे लेकिन एक्ज़िट पोल मोदी की भाजपा के अहंकार को तोड़ते दिखाई दे रहे है क्या देश का सियासी मौसम बदल रहा है ? क्या पाँच राज्यों के चुनावी परिणामों की अँगड़ाई से बदलेगी 2019 की लडाई ? पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम क्या होगे ये तो 11 दिसंबर को तय होगा पर इन चुनावों से कुछ ऐसी परतों से भी परदे उठेंगे जो लोगों के ज़हन में अक्सर घूमते रहते थे कि क्या होगा 2019 के चुनाव में ? क्या मोदी की भाजपा द्वारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को पप्पू पप्पू कहना भारी पड़ रहा ? क्या मोदी की भाजपा का फ़र्ज़ी हिन्दुत्व का जादू फेल हो गया है ?


क्या कांग्रेस का असली हिन्दुत्व लोगों की समझ में आ गया है क्योंकि कांग्रेस ने मुसलमान के साथ एक रणनीति के तहत जिस ख़ूबसूरती से उसको नुक़सान पहुँचाया वह मोदी की भाजपा नही कर पायी है जो मुसलमान आजादी से पहले इस देश का किंग हुआ करता था आज वह दलितों से बत्तर हालत में आ गया है इसको कांग्रेस की स्ट्रेटेजी ही कही जाएगी कि पता भी न चले और मुसलमान धरातल में भी चला जाए वही हुआ भी और यह उसकी स्ट्रेटेजी ही है कि इतना सब कुछ होने के बाद भी मुसलमान कांग्रेस की बात करता है यही तो कमाल है कांग्रेस की स्ट्रेटेजी का और मोदी की भाजपा ने सिर्फ़ ज़ुबानी या यूँ कहे कि उसके पास उसकी बदज़ुबानी के अलावा ज़्यादा कुछ नही है उनके कार्यकाल में अब तक 47 मुसलमानों की जाने गई और पूरे देश या विश्वभर में मोदी की भाजपा को मुँह छिपाने के लिए जगह नही मिली और कांग्रेस के कार्यकाल में सैकड़ों की तादाद में सुनोयोजित तरीक़े से साम्प्रदायिक दंगे कराकर हज़ारों मुसलमानों को जान से हाथ धोना पड़ा ओर माली नुक़सान पहुँचाया गया लेकिन मुसलमानों को एहसास नही होने दिया अयोध्या में बाबरी मस्जिद को विवादित बनाने से लेकर शहीद होने तक किसका योगदान रहा और किसके कार्यकाल में किया गया यह सब अच्छी तरह जानते और समझते है पर मुसलमान फिर भी कांग्रेस को पंसद करता रहा तो कौन हुई असली हिन्दुत्व पर चलने वाली पार्टी मोदी की भाजपा या कांग्रेस ?


पाँच राज्यों के परिणाम कुछ भी रहे एग्जिट पोल के मुताबिक़ हो या उसके विपरीत यह तो अलग बात है एक बात यह भी लोगों ने स्वीकार कर ली कि मोदी की भाजपा सिर्फ़ जुमलों की और झूटे वादों की पार्टी बनकर रह गई है।एक बात और खुलकर सामने आई कि इन चुनावों में दो राज्य ऐसे भी है जहाँ मोदी की भाजपा पिछले पंद्रह सालों से सत्ता में चली आ रही थी पर वहाँ भी अगर चुनाव हार रही है तो यह हार रमन सिंह या शिवराज सिंह चौहान की हार होगी या हमारे बड़बोले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की हार होगी मोदी के भक्त के अभी से यह माहौल बनाने में जुट गए कि अगर मोदी की भाजपा इन दोनों राज्यों में हारती है तो यह हार वहाँ की राज्य सरकारों की हार होगी यह कहाँ का और कैसा तर्क है कि जीते तो मोदी की जीत और हारे तो राज्य सरकारों की हार।राजस्थान की हार को तो माना जा सकता है कि वहाँ की हार में वसंधुरा का योगदान है लेकिन वहाँ भी मोदी सरकार की हिटलर वाली नीति हार में बराबर की भागीदार है।यह कहने में क़तई भी हिचक नही होनी चाहिए कि 2019 के लोकसभा चुनाव में चुनावी मौसम देश को नई दिशा देने की तैयारी कर रहा है इस दिशा में क्या साम्प्रदायिकता को पंसद करने वाले अपने एजेंडे को नई धार देने में जुटेंगे ?


क्योंकि बुलंदशहर जैसी घटनाएँ आगे और होगी इससे इंकार नही किया जा सकता जिससे देश का माहौल उनके एजेंडे के मुताबिक़ हो सके।राममंदिर के मुद्दे को गर्माने की बार-बार कोशिश हुई और होगी राममंदिर बने या न बने इससे नागपुरिया आईडियोलोजी को कोई सरोकार नही है वह तो बस इसे चुनावी हथियार के तौर पर इसका प्रयोग करती आई है और कर रही है आगे भी वह हर संभव कोशिश करेगी कि किसी तरह फिर वही माहौल बन जाए और हम सत्ता में बने रहे अब यह तो देश की जनता तय करेगी वह उनके इन मनसूबो को कामयाब होने देगी या वही पहुँचा देगी जहाँ से वह चली थी दो सीट पर यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा लेकिन इतना तय हो गया है साम्प्रदायिक सियासत करने वालों को जनता जवाब देने के लिए तैयार हो गई है अब धर्म की बात सियासत में नही चलेगी ऐसा एहसास होने लगा है।क्योंकि मध्य प्रदेश में वोटिंग से पूर्व राममंदिर के मुद्दे को तूल देने की जो नाकाम कोशिश की गई परन्तु फिर भी वह सब नही हुआ जो नागपरिया आईडियोलोजी चाहती थी वहाँ लाखों का झमघट करने की कोशिश हुई पर मुश्किल तमाम तीस चालीस हज़ार ही लोगों को जमा कर पायी और वो माहौल भी नही बना जो 1992 में बना था कुल मिलाकर मोदी की भाजपा पर बेरोज़गारी , महँगाई , किसानों की परेशानियाँ जैसे उनकी फ़सलो का वाजिब दाम न मिलना , नोटबंदी , जीएसटी , राफ़ेल की ख़रीद में किया गया घोटाले का आरोप भारी पड़ गया लगता है क्या यही मुद्दे लोकसभा संग्राम 2019 में भी भारी पड़ने जा रहे है यह तो आने वाले साढ़े चार महीने में पता चलेगा ? क्या यह नारा लोकसभा चुनाव में गुंजेगा की मोदी तेरी ख़ैर नही राहुल गांधी से बैर नही ?

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