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मायावती ने कांग्रेस को दिया बड़ा झटका, मध्यप्रदेश और राजस्थान में अकेली चुनाव लड़ेगी बसपा!

मायावती ने कहा कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी, कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगी।

 Special Coverage News |  2018-10-03 17:14:50.0  |  दिल्ली

बसपा सुप्रीमों मायावतीबसपा सुप्रीमों मायावती

लखनऊ : जैसे-जैसे 2019 लोकसभा चुनाव आ रहे हैं वैसे ही राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है. बसपा सुप्रीमों मायावती ने आज कांग्रेस पर करारा हमाल बोला है। मायावती ने बुधवार को कहा कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी, कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेगी। उन्होंने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह पर आरोप लगाया कि वे भाजपा के एजेंट हैं। उन जैसे नेता कांग्रेस-बसपा का गठबंधन नहीं होने देना चाहते।

दिग्विजय पर साधा निशाना?

मायावती ने कहा कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अर्थात राहुल गांधी व सोनिया गांधी वैसे एक तरफ यह चाहते है कि निरंकुश बीजेपी को हराने के लिये लोकसभा व उससे पहले कुछ राज्यों में विधानसभा के लिये होने वाले आमचुनावों में बी.एस.पी. के साथ चुनावी गठबंधन हो, तो वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह जैसे निजी स्वार्थी नेता कतई नहीं चाहते है कि ऐसा हो। और इस सम्बंध में दिग्विजय सिंह का आज मीडिया वार्ता में यह आरोप की बी.एस.पी. केन्द्र की बी.जे.पी. सरकार व उसकी सी.बी.आई व ई.डी. आदि एजेन्सी से डरी हुई है, यह पूरी तरह से असत्य, निराधार व तथ्यहीन है तथा साथ ही यह कांग्रेस पार्टी का दोहरा चरित्र व मापदण्ड नही तो और क्या है?

मायावती ने कहा कि बीएसपी एक राजनीतिक पार्टी के साथ-साथ एक मूवमेन्ट भी है और इसका नेतृत्व किसी के भी दबाव के आगे ना तो कभी झुका है और ना ही कभी कोई समझौता ही किया है जो जग-जाहिर है। अब जबकि देश में लोकसभा के साथ-साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में विधानसभा के आमचुनाव सर पर हैं तो चुनावी गठबन्धन के मामले में कांग्रेस पार्टी का रवैया, हमेशा की तरह, बीजेपी को परास्त करने का नहीं बल्कि अपनी सहयोगी पार्टियों को ही चित करने का ज़्यादा लगता है, जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है। कांग्रेस पार्टी अपनी इस प्रकार की गलत नीतियों का नुकसान बार-बार उठा रही हैं फिर भी यह पार्टी अपने आपमें सुधार नहीं कर रही है।

मायावती ने कहा कि देश की आमजनता बीजेपी सरकार से बुरी तरह से पीड़ित व त्रस्त है और इस अहंकारी, जातिवादी व निरंकुश सरकार को उखाड़ फेंकना चाहती है, लेकिन इसके लिए कांग्रेस पार्टी की ग़लतफहमी के साथ-साथ उसका अहंकार भी अब सर चढ़कर बोलने लगा है कि वह अकेले ही अपने बलबूते पर बीजेपी को हराने का काम कर लेगी। इससे साफ है कि कांग्रेस की रस्सी जल गई है लेकिन ऐंठन अभी भी नहीं गई है।

मायावती ने आगे कहा कि कांग्रेस पार्टी के इस प्रकार के दुःखद रवैये के परिणामस्वरूप ही बी.एस.पी. ने पहले कर्नाटक और फिर छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया और अब बी.एस.पी. मूवमेन्ट के व्यापक हित में राजस्थान व मध्य प्रदेश में भी बी.एस.पी. ने अकेले अपने बलबूते पर ही चुनाव लड़ने का फैसला किया है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के नेताओं के रवैये से लगता है कि वे लोग बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिये गंभीर होने के बजाय, बी.एस.पी. को ही खत्म करने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं।

मायावती ने कहा कि बीएसपी ने व्यापक देशहित को ध्यान में रखकर व बीजेपी जैसी घोर जातिवादी व साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिये हमेशा ही कांग्रेस पार्टी का साथ दिया है और इस सम्बंध में काफी बदनामी भी मोल ली है, लेकिन इसके एवज़ में बी.एस.पी. नेतृत्व का एहसानमन्द व शुक्रगुजार होने के बजाय कांग्रेस पार्टी ने, बीजेपी की तरह ही, हमेशा दग़ा किया व पीठ पीछे छुरा घोंपने का काम किया है।

इतना ही नहीं बल्कि सन् 1932 के पुना पैक्ट, बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर को भारतीय संविधान निर्माता होने का गौरव प्राप्त होने के बावजूद भी उनकी घोर लगातार उपेक्षा व उन्हें संसद में सम्मानपूर्वक चुनकर जाने से वंचित रखना तथा भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित नहीं करना एवं महिलाओं को पुरूष के बराबर अधिकार देने सम्बंधी हिन्दू कोड बिल को पारित कराने में वादाखिलाफी व दलितों एवं पिछड़ों के आरक्षण को संविधान की मंशा के अनुरूप लागू नहीं करने पर

ऽ बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर का देश के पहले कानून मंत्री पद से इस्तीफा देना आदि के साथ-साथ बामसेफ, डी.एस.-4 व बी.एस.पी. के जन्मदाता एवं संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी के देहान्त के बाद भी उनकी मृत्यु पर एक दिन का भी राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं करने आदि की कभी भी ना भुलाई जाने वाली दुःखद घटनाओं के बावजूद, भी

ऽ बी.एस.पी. द्वारा सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ, कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सहमति कोई कम नहीं बल्कि बहुत बड़ा मायने रखती है, परन्तु चुनावों में गठबंधन की ताजा घटनाओं के सम्बंध में कांग्रेस पार्टी के रवैये से यह साफ लगता है कि रस्सी जल गई पर एंेठन अभी तक भी नहीं गई है:

ऽ ऐसी स्थिति में पार्टी व मूवमेंट के हित में बी.एस.पी. कांग्रेस पार्टी के साथ किसी भी स्तर पर कहीं भी मिलकर चुनाव नहीं लडे़गी। बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी।

लखनऊ, 03 अक्तूबर 2018: सुश्री मायावती जी द्वारा मीडिया को सम्बोधन का मुख्य अंश: आज मैं मीडिया के माध्यम से पूरे देश की धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को व ताकतों को भी खासकर कांग्रेस पार्टी के बारे में गठबन्धन करने के सम्बन्ध में यह कहना चाहती हूँ कि वैसे एक तरफ कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी व संरक्षक श्रीमती सोनिया गाँधी ये दोनों चाहते हैं कि देश में लोकसभा व इससे पहले जिन राज्यों में भी विधानसभा के आमचुनाव होने वाले है वहाँ कांग्रेस व बी.एस.पी. मिलकर चुनाव लड़ें ताकि बीजेपी को सत्ता में आने से रोका जा सके, तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी में मध्यप्रदेश स्टेट के मुख्यमंत्री रहे श्री दिग्विजय सिंह जैसे अनेकों ओर कुछ ऐसे निजी-स्वार्थी नेता हैं जो केन्द्र में बीजेपी सरकार की सी.बी.आई व ई.डी. आदि की जाँच एजेन्सियों के डर से घबराकर वे कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा आमचुनाव में व इसके बाद देश में होने वाले लोकसभा आमचुनाव में भी किसी भी कीमत पर कांग्रेस व बी.एस.पी. का चुनावी समझौता नहीं होने देना चाहते हैं और खासकर कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री दिग्विजय सिंह जैसे लोग तो यह चुनावी समझौता कतई भी होने नहीं देना चाहते हैं जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ में बीजेपी केन्द्र सरकार की सी.बी.आई व ई.डी. आदि की जाँच एजेन्सियों के डर से घबराकर अपनी खुद की पार्टी अर्थात् कांग्रेस पार्टी की गोवा में सरकार तक भी नहीं बनने दी थी, जबकि यह पार्टी संख्या के हिसाब से बड़ी पार्टी थी यह बात जग-जाहिर है।

लेकिन यहाँ खास ध्यान देने व आश्चर्य की बात यह भी है कि कांग्रेस पार्टी का यह निजी स्वार्थी वरिष्ठ नेता, जो बीजेपी का जबरदस्त एजेन्ट भी है आज वह एक टीवी चैनल में अपने इन्टरव्यू के दौरान अपनी पार्टी का बी.एस.पी. के साथ किसी भी कीमत पर गठबन्धन नहीं होने देने को लेकर बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम लेकर यह बयान दे रहा है कि मायावती जी पर केन्द्र सरकार का बहुत बड़ा दबाव है और वह इनको सी.बी.आई व ई.डी. आदि का डर दिखाकर बी.एस.पी. व कांग्रेस पार्टी का किसी भी कीमत पर यह चुनावी गठबन्धन नहीं होने देना चाहती है। जो पूरे तौर से असत्य, निराधार व तथ्यहीन है।

जबकि वास्तव में सही बात तो यह है कि इनकी कांग्रेस पार्टी इस गठबन्धन की आड़ में बी.एस.पी. को ही खत्म करना चाहती है जिसकी पृष्ठभूमि जग-जाहिर है अर्थात् देश के खासकर जिन दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, मुस्लिम व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के वोटों के बलबूते पर आजादी के बाद यहाँ वर्षों तक केन्द्र व राज्यों में कांग्रेस पार्टी ने एकछत्र राज किया है लेकिन इस पार्टी ने भी बीजेपी की तरह ही इन वर्गों के प्रति अपनी जातिवादी व साम्प्रदायिक सोच को बरकरार रखा जिसकी खास वजह से ही फिर हमें मजबूरी में इन वर्गों के हितों में बी.एस.पी. बनानी पड़ी है जो यह देश की एक मात्र अनुशासित राजनैतिक पार्टी होने के साथ-साथ एक सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति के तथा हजारों वर्षों से उपेक्षा व शोषण का शिकार रहे लोगों के लिये आत्म-सम्मान व स्वाभिमान का एक मूवमेन्ट भी है, जिसके लिये परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर ने आजीवन कड़ा संघर्ष किया, अनेकों प्रकार के दुःख व अपमान आदि सहे और फिर अन्त में अपनी जद्दोजहद को परिणाम देते हुये इस देश को एक मानवतावादी बेहतरीन संविधान देेने में सफल हुये।

उनके देहान्त के बाद इस मानवतावादी मूवमेन्ट को फिर योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने के लिये मान्यवर श्री कांशीराम जी ने अपनी पूरी ज़िन्दगी लगाई और देश की राजनीति में एक नया मानवीय आयाम स्थापित करके उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अपनी पार्टी की सरकार बनाने में ऐतिहासिक सफलता अर्जित की और आज मैं खासकर उन्हीं महापुरुषों के त्याग, समर्पण व बलिदान आदि से प्रेरणा लेकर उनके कारवाँ को आगे बढ़ाने के लिये अपनी पूरी ज़िन्दगी लगाकर काफी जी-जान से लगी हुई हूँ और ऐसे में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर व मान्यवर श्री कांशीराम जी की तरह ही, कोई भी पद, सरकारी कुर्सी व बड़ा-से-बड़ा ओहदा मुझे अपने संकल्प से डिगा नहीं सकता है, जिसके प्रमुख उदाहरणों के रुप में दिनांक 25 अगस्त सन् 2003 को मेरा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देना और फिर बाद में दिनांक 18 जुलाई सन् 2017 को राज्यसभा से भी त्याग-पत्र देने की घटनायें आप लोगांे के सामने हैं।

यह कुछ जरुरी बातें आज यहाँ मैं इसलिए कह रही हूँ ताकि ख़ासकर कांग्रेस पार्टी के नेताओं को बी.एस.पी. के साथ किसी भी चुनावी तालमेल या समझौता करने से पहले यह बात जरूर याद रखना चाहिये कि बी.एस.पी. अपार संघर्षों से निकली हुई पार्टी हैं तथा सर्वसमाज के ग़रीबों, मज़दूरों, किसानों आदि के साथ-साथ करोड़ों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, मुस्लिम व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के हित व स्वाभिमान के साथ कभी कोई समझौता नहीं कर सकती है और ना ही किसी के हांथ का कभी खिलौना बन सकती है और यह बाबा साहेब के किसी भी सच्चे अनुयायी के खून में आसानी से नहीं हो सकता है। इसीलिये आज बीजेपी के डर से कांग्रेस पार्टी ख़ासकर मुस्लिम समाज के लोगांे को चुनाव में टिकट देने से डर सकती है, लेकिन नतीजा चाहे जो भी हो, बी.एस.पी. ऐसा नहीं करती है। हमारी पार्टी ने उ.प्र. की फैजाबाद सीट पर भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जो काम कोई दूसरी पार्टी नहीं कर सकती हैं। यह राजनीतिक पार्टी की स्वार्थी सोच से ज़्यादा हमारे मूवमेन्ट की आगाज है जो हमें ताक़त देती है तथा दूसरी पार्टियों से अलग पहचान देती है।

और इसी प्रकार के व्यापक जनहित व देशहित को ध्यान में रखकर ही ़हमारी पार्टी ने अपनी रणनीति में बदलाव लाकर, बीजेपी की घोर ग़रीब, मज़दूर, किसान व महिला-विरोधी तथा बड़े-बड़े पूँजीपतियों व धन्नासेठों की समर्थक निरंकुश व अहंकारी सरकार को आगे सत्ता में आने से रोकने के लिये गठबन्धन करने पर अपनी सहमति ज़ाहिर की और इसी क्रम में बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिये पहले दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में क्षेत्रीय दल जनता दल-यूनाइटेड और फिर हरियाणा में श्री चैटाला की इण्डियन नेशनल लोकदल केे साथ गठबन्धन किया हुआ है।

परन्तु अब जबकि देश में लोकसभा के साथ-साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में विधानसभा के आमचुनाव सर पर आ गये हैं तो चुनावी गठबन्धन के मामले में कांग्रेस पार्टी का रवैया, हमेशा की तरह, बीजेपी को परास्त करने का नहीं बल्कि अपनी सहयोगी पार्टियों को ही चित करने का ज़्यादा लगता है, जो कि यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

कांग्रेस पार्टी अपनी इस प्रकार की नीतियों का नुकसान बार-बार उठा रही हैं लेकिन फिर भी यह पार्टी अपने आप में सुधार नहीं कर रही है और ठीक ऐसे समय में जब देश की आमजनता बीजेपी की केन्द्र व राज्य में इनकी सरकारों की हर प्रकार के अच्छे दिन लाने व कालाधन वापस लाकर उसमें से 15 से 20 लाख रूपये प्रत्येक गरीब परिवार के हर सदस्य को देने आदि सम्बन्धी घोर वादाखिलाफी, जनहित व देशहित से विश्वासघात करने के साथ-साथ बीजेपी सरकारों की ख़ासकर ग़रीब, मज़दूर व किसान विरोधी नीतियों के कारण बढ़ती ग़रीबी, भूखमरी, महंगाई, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार आदि की जबर्दस्त मार से बुरी तरह से पीड़ित व त्रस्त है और इस अहंकारी, जातिवादी व निरंकुश सरकार को उखाड़ फेकना चाहती है।

लेकिन इसके लिए कांग्रेस पार्टी की ग़लतफहमी के साथ-साथ उसका अहंकार भी अब सर चढ़कर बोलने लगा है कि वह अकेले अपने बलबूते पर यह बीजेपी को हराने का काम कर लेगी, जबकि ज़मीनी वास्तविकता यह है कि कांग्रेस पार्टी को उसकी अपार ग़लतियों व भ्रष्टाचार आदि के लिये देश की जनता काफी कड़ी सजा दिये जाने के बावजूद अभी उसे भी माफ करने को पूरी तरह से तैयार नहीं है और जिसका ही पूरा फायदा लेकर बीजेपी ना केवल केन्द्र में पहली बार पूर्ण बहुमत से सरकार में है बल्किी देश के ज़्यादातर राज्यों में सत्ता में आकर अपने घोर जातिवादी, साम्प्रदायिक व द्वेषपूर्ण एजेण्डे को लागू किये हुये हैं और जिससे हर तरफ लगभग तनाव, हिंसा व अराजकता का माहौल व्याप्त है लेकिन फिर भी कांग्रेस पार्टी अपने में ज़रुरी सुधार लाने को तैयार नहीं लगती है।

वैसे तो विपक्षी पार्टियों में से खासकर बी.एस.पी. ने व्यापक देशहित को ध्यान में रखकर व बीजेपी जैसी घोर जातिवादी व साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिये हमेशा ही कांग्रेस पार्टी का साथ दिया है और इस सम्बंध में काफी बदनामी भी मोल ली है, लेकिन इसके एवज में बी.एस.पी. नेतृत्व का एहसानमन्द व शुक्रगुजार होने के बजाय कांग्रेस पार्टी ने, बीजेपी की तरह ही, हमेशा दग़ा किया व पीठ पीछे छुरा घोंपने का काम किया है।

इस सम्बन्ध में वैसे तो अनेकों उदाहरण देश की जनता के सामने हंै, परन्तु ताज प्रकरण एक खास ऐसा उदाहरण है, जिसमें बदले की भावना से काम करते हुये पहले बीजेपी की केन्द्र सरकार ने मुझे फर्जी फंसाया और फिर कांग्रेस पार्टी की केन्द्र सरकार ने इस मामले को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये काफी दिनों तक उलझाये रखा और फिर अन्त में काफी लम्बे समय व काफी कड़े संघर्ष के बाद माननीय सुप्रीम कोर्ट से मुझे न्याय मिल पाया, यह किसी से भी छिपा हुआ नहीं है।

इतना ही नहीं बल्कि सन् 1932 के पुना पैक्ट, बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर को भारतीय संविधान निर्माता होने का गौरव प्राप्त होने के बावजूद भी उनकी घोर लगातार उपेक्षा व उन्हें संसद में सम्मानपूर्वक चुनकर जाने से वंचित रखना तथा भारत रत्न की उपाधि से सम्मानित नहीं करना एवं महिलाओं को पुरूष के बराबर अधिकार देने सम्बंधी हिन्दू कोड बिल को पारित कराने में वादाखिलाफी व दलितों व पिछड़ों के आरक्षण को संविधान की मंशा के अनुरूप लागू नहीं करने पर डा. अम्बेडकर का देश के पहले कानून मंत्री पद से इस्तीफा देने आदि के साथ-साथ बामसेफ, डी.एस.-4 व बी.एस.पी. के जन्मदाता व संस्थापक मान्यवर श्री कांशीराम जी के देहान्त के बाद भी उनकी मृत्यु पर एक दिन का भी राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं करने आदि की कभी भी ना भुलाई जाने वाली दुःखद घटनाओं के बावजूद, बी.एस.पी. द्वारा सत्ताधारी बीजेपी के ख़िलाफ, कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सहमति कोई कम नहीं बल्कि बहुत बड़ा मायने रखती है, परन्तु चुनावों में गठबंधन की ताजा घटनाओं के सम्बंध में कांग्रेस पार्टी के रवैये से यह साफ लगता है कि रस्सी जल गई पर एंेठन अभी तक भी नहीं गई है, अर्थात् कांग्रेस पार्टी कतई तौर पर बीजेपी को पराजित करने में रूचि नहीं रखती है जिसका फिर से नुकसान सहने को शायद देश की जनता तैयार नहीं है।

वैसे तो कांग्रेस पार्टी की हर मामले में अभी भी काफी दयनीय स्थिति है फिर भी उसे गुजरात की तरह अभी तक यह ग़लतफहमी बनी हुई है कि वह अकेले अपने बूते पर ही बीजेपी की साम, दाम, दण्ड, भेद व ई.वी.एम. आदि अनेकों प्रकार के हथकण्डों का सामना कर लेगी, तो यह हास्यास्पद नहीं तो और क्या है?

जबकि पिछले सभी चुनावी अनुभव यह बताते हैं कि अगर कांग्रेस पार्टी से मुख्य मुकाबला है तो बीजेपी चुनाव आसानी से जीत कर सरकार बना लेती है। फिर भी अपनी सहयोगी पार्टियों को आगे करना तो दूर, बल्कि उनके साथ सही सूझबूझ व ईमानदार गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के लिये भी कांग्रेस पार्टी तैयार नहीं लगती है अर्थात यह सवाल उठता है कि क्या वास्तव में कांग्रेस पार्टी चाहती है कि बीजेपी चुनाव में पराजित हो?

वर्तमान परिस्थिति में जनता यह सोचने पर मजबूर है क्योंकि गुजरात की तरह कोई और मौक़ा राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ की जनता बीजेपी को कतई भी नहीं देना चाहती है। इस प्रकार कंग्रेस पार्टी के ऐसे दुःखद रवैये के परिणामस्वरूप ही बी.एस.पी. ने अपने पार्टी व मूवमेन्ट के हित में पहले दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में और अब आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ राज्य में शीघ्र ही होने वाले चुनाव में यहाँ क्षेत्रीय पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है और अब बी.एस.पी. मूवमेन्ट के हित में यह फैसला किया है कि राजस्थान व मध्य प्रदेश में भी बी.एस.पी. अकेले अपने बलबूते पर ही चुनाव लडे़गी, क्योंकि कांग्रेस पार्टि के रवैये से यह लगता है कि वे लोग बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिये गंभीर व ठोस होने के बजाय, बी.एस.पी. मूवमेन्ट को ही खत्म करने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं।

कांग्रेस पार्टी के इसी प्रकार के ग़लत रवैये के कारण ही बीजेपी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ व गुजरात आदि में काफी लम्बे समय से सत्ता में बनी हुई है और जब चुनाव समाप्त हो जाता है तब बीजेपी को हराने की क़िस्म-क़िस्म की नाटकबाज़ी करती रहती हैं। यह बीजेपी से ज्यादा गैर-बीजेपी ताक़तों को कमज़ोर करने की ही साज़िश लगती है और अगर ऐसा नहीं है तो फिर कांग्रेस पार्टी राजस्थान प्रदेश की 200 विधानसभा की सीटों में से केवल 9-10 सीटें व मध्यप्रदेश की 230 सीटों में से केवल 15-20 सीटें तथा छत्तीसगढ़ की 90 विधानसभा की सीटों में से केवल 5-6 सीटें बी.एस.पी. को देने के लिए कभी भी अपना अड़ियल रवैया नहीं अपनाती जबकि पूरा देश यह जानता व मानता भी है कि केवल बी.एस.पी. का वोट ही, दूसरी पार्टियों को ट्रान्सफर होता है अन्य किसी भी पार्टी का नहीं अर्थात् गठबन्धन करके चुनाव लड़ने में बी.एस.पी. को फायदा कम व नुकसान ज्यादा होता है और इस सम्बन्ध में खासकर कांग्रेस पार्टी को उ.प्र. के सन् 1996 के हुये विधानसभा आमचुनाव में बी.एस.पी. के साथ किये गये गठबन्धन के अनुभव को तो कभी भी नहीं भूलना चाहिये था।

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