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राजनाथ सिंह जब यूपी में सीएम थे तो क्यों कहा गया घोषणा नाथ सिंह?

 अश्वनी कुमार श्रीवास्त� |  5 March 2019 7:53 AM GMT  |  लखनऊ

राजनाथ सिंह जब यूपी में सीएम थे तो क्यों कहा गया घोषणा नाथ सिंह?
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दो रोज बाद गृह मंत्री एवं लखनऊ के सांसद राजनाथ सिंह आउटर रिंग रोड के महज 10 फीसदी हिस्से का बहुत ही गाजे-बाजे के साथ लोकार्पण करेंगे। साथ ही, वह इस मौके पर मात्र 45 मिनट में लखनऊ से कानपुर का सफर कराने में सक्षम कानपुर एक्सप्रेस वे का शिलान्यास भी करेंगे।

मुझे समझ नहीं आता कि इसे लखनऊ के लिए बहुत बड़ी सौगात समझूँ या फिर चुनाव नजदीक आता देख राजनाथ सिंह का प्रचार समझूँ। क्योंकि जिस आउटर रिंग रोड के महज 10 फीसदी हिस्से का लोकार्पण वह 2019 में कर रहे हैं, उसे तो इस वक्त तक पूरा हो जाना चाहिए था। साल 2016 में इसी तरह गाजे बाजे के साथ राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी ने इसी आउटर रिंग रोड का शिलान्यास यह कहकर किया था कि तीन साल बाद यह रोड जनता को लोकार्पित कर दी जाएगी।

अब अपने कार्यकाल में राजनाथ सिंह एक आउटर रिंग रोड तो पूरी बनवा न सके, लखनऊ की जनता को फिर से वादों के जाल में फंसाने निकल पड़े हैं। क्या जनता यह नहीं सोचेगी कि गृह मंत्री का पद लेकर केंद्र और राज्य में भी भाजपा की सरकार के होते हुए भी राजनाथ पांच साल में अपने किये वादे नहीं निभा पाए तो अब इन नए वादों पर कैसे यकीन किया जाए? आज जिस कानपुर एक्सप्रेस वे का शिलान्यास यह कहकर किया जा रहा है कि इसे महज डेढ़ दो साल में ही पूरा कर लिया जाएगा, क्या इसका भी हश्र आउटर रिंग रोड जैसा नहीं होगा?

आज पाकिस्तान के खिलाफ जो वॉर हिस्टीरिया हम देख रहे हैं, वह दरअसल मोदी, गडकरी, राजनाथ, जेटली, उमा भारती जैसे तमाम उन सत्ताधारी नेताओं के वादे न पूरे हो पाने से हो रही बदनामी को छिपाने के लिए पैदा किया गया है। इसीलिए तो आज कोई नहीं पूछ रहा कि जीएसटी, नोटबन्दी, रोजगार, स्वास्थ्य, बुलेट ट्रेन, गंगा सफाई, स्मार्ट सिटी आदि मुद्दों पर भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारों ने किस तरह से जनता की आंख में धूल झोंकी है।

लेकिन यूपी में तो जंग के इस जुनूनी माहौल में भी आप किसी से पूछ लीजिये, फिर चाहे वह भाजपा समर्थक हो या विरोधी, हर कोई इस बात को मन-बेमन से मानता जरूर है कि यूपी के लिए अखिलेश या मायावती ही सही हैं। क्योंकि अखिलेश ने जिस तरह ताबड़तोड़ तरीके से काम करके एक के बाद एक विकास के काम किये, वह आज सबको नजर आ रहे हैं। आगरा एक्सप्रेस वे हो, मेट्रो, गोमती रिवर फ्रंट, डायल 100, 108 और 102 एम्बुलेंस, अस्पताल आदि हर जगह अखिलेश की छाप नजर आ रही है। लेकिन विकास मायावती ने भी किया और अखिलेश विकास करने के बावजूद जहां थोड़ा फेल नजर आते थे, वहीं मायावती आगे दिखने लगती हैं। मसलन, कानून व्यवस्था के मामले में आज भी यूपी की जनता मायावती को ही मिसाल मानती है।

बहरहाल, जिस आधी अधूरी आउटर रिंग रोड का श्रेय लेने राजनाथ लखनऊ आने वाले हैं, वह भी अगर अखिलेश या मायावती का प्रोजेक्ट होता तो वे इसे रिकॉर्ड समय में पूरा करके इस पर ट्रैफिक भी शुरू करा चुके होते। इन दोनों नेताओं की क्षमता इसलिए भी काबिले तारीफ है क्योंकि अखिलेश और मायावती ने अब तक जो भी काम लखनऊ या उत्तर प्रदेश के लिए किए, वह उस वक्त की केंद्र सरकारों के समर्थन और सहयोग के बिना ही अपने दम पर किये। जबकि राजनाथ के पास तो गृह मंत्री जैसा अहम पद और केंद्र व राज्य में अपनी ही सरकार होने का दोहरा बल भी था।

वैसे, राजनाथ सिंह जब यूपी में मुख्यमंत्री थे तो इन्हें मीडिया और जनता के बीच घोषणा नाथ सिंह कहकर ही संबोधित किया जाता था। क्योंकि तब भी इन्हें घोषणाएं करने का तो शौक बहुत था...मगर वे घोषणाएं पूरी हुईं या नहीं, इसका जिम्मा यह कभी नहीं उठाते थे। यही वजह भी है कि राजनाथ हर चुनाव में अपना संसदीय क्षेत्र बदल दिया करते थे। इस बार लखनऊ से ही दोबारा लड़ने के पीछे शायद उनकी यह सोच काम कर रही होगी कि पहले के मुकाबले अब घोषणा पूरी करने तो लगे ही हैं...भले ही 10 फीसदी काम करके ही कर दी हो...

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