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अबकी नहीं चढ़ेगी विकास और हिंदुत्व की खिचड़ी वाली हांडी!

 अश्वनी कुमार श्रीवास्त� |  8 Jan 2019 9:35 AM GMT  |  दिल्ली

अबकी नहीं चढ़ेगी विकास और हिंदुत्व की खिचड़ी वाली हांडी!
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लेकिन हिंदुत्व और विकास की बाइक पर एक साथ सवारी का यह अद्भुत स्टंट जनता को पांच बरस तक दिखाकर मनोरंजन करने की भाजपा की इस बाजीगरी को देश के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा।

यूँ तो राजनीति पर ज्यादा लिखना, बोलना, पढ़ना या चर्चा करना मुझे पसंद नहीं है लेकिन चुनाव जब नजदीक हों तो मैं भी ऐसा खालिस यूपी वाला बन जाता हूँ, जिससे कोई मांगे न मांगे लेकिन अपनी एक्सपर्ट ओपिनियन वह जरूर दे देता है। फिलहाल मेरी तरफ से तो एक्सपर्ट ओपिनियन यही है कि मोदी जी ने पांच साल बड़ी ही बेअंदाजी में अपने वोटर को भेड़-बकरी समझ कर अपने जड़बुद्धि सलाहकारों की सुनकर अनापशनाप तरीकों से सरकार चलाई। उन्हें यकीन था कि जिस तरह विकास और हिंदुत्व की खिचड़ी खिलाने का झांसा देकर अपनी सत्ता की हांडी 2014 में वह चढ़ा ले गए थे, उसी तरह इस बार भी 2019 में चुनाव में जीत हासिल कर लेंगे। लेकिन इस खामख्याली में रहे मोदी जी समेत भाजपा/संघ को यह समझ नहीं आया कि जनता ने पिछले पांच बरस में न तो कहीं से विकास देखा और न ही हिंदुत्व के नाम पर उसे कुछ मिला तो भला इस बार भी वह कैसे इसी झांसे में आ जायेगी।

माना कि देश में एक बड़ी तादाद ऐसी भी है, जो हर कीमत पर वापस ही मोदी को चाहती है, भले ही मोदी जी उसे विकास या हिंदुत्व में से कुछ न दे पाए हों लेकिन क्या देश में 2014 में भाजपा को वोट देने वाले सारे लोग ही ऐसे हैं? जाहिर है, अपने सभी मतदाताओं को भेड़-बकरी समझने वाले नेता इसी तरह चुनाव के मौके पर छटपटाते हैं, जिस तरह इन दिनों मोदी और उनकी चुनावी टीम घूम रही है।

दरअसल, हुआ यह कि 2014 में देशभर में और 2017 में यूपी में लोगों ने कट्टर हिंदुत्व की आस में सवर्णों के राज की वापसी और मुसलमानों को 'ठीक' रखने के लिए मोदी जी के नाम पर एकजुट होकर वोट किया। अब हिंदुत्व के इस उबाल में पिछड़े और दलित भी केसरिया झंडा उठाये इसलिए चले आये क्योंकि उन्हें मोदी जी के नेतृत्व वाली हिंदुत्व ब्रिग्रेड ने यह यकीन दिला दिया कि देश को असली खतरा मुसलमानों से है। इसके अलावा, बड़ी सफाई से 2014 के चुनाव से ही मोदी की चुनावी टीम ने मोदी की छवि ऐसे विकास पुरुष की भी बना दी थी, जिसने गुजरात का ऐसा विकास कर दिया है, जैसा कि शायद अमेरिका का भी न हो पाया हो। लिहाजा एकजुट सवर्ण और बड़ी तादाद में पिछड़े और दलित वोटों की सेंधमारी ने भाजपा को जिताकर मोदी और योगी को किंग बना दिया।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इन सभी मतदाताओं की आस में विकास और एन्टी मुस्लिम फीलिंग भले ही कॉमन रही हो लेकिन सवर्णों की अपने राज की वापसी की आस ऐसा डायनामाइट था, जो मोदी जी की कुर्सी में उसी वक्त लग गया था, जब वह जीत कर प्रधानमंत्री बने थे। सवर्णों ने सोचा कि हिंदुत्व के राज में सवर्णों की चांदी होगी और इसलिए ज्यादातर सवर्ण जातियां गांव-कस्बों से लेकर शहर तक बेलगाम होने लगीं। शासन-प्रशासन में सवर्णों का वर्चस्व तो बढ़ा और देश के ज्यादातर राज्यों में राजनीतिक वनवास भी खत्म हो गया लेकिन इससे पिछड़े और दलित छिटकने लगे। उन्हें महसूस होने लगा कि हिंदुत्व के नाम पर मुस्लिमों को असली खतरा बनाकर उन्हें ठग लिया गया है और भाजपा का मतलब सवर्ण राज की वापसी ही है।

यह फीडबैक खुद भाजपा को मिला तो उसने आननफानन में इसकी भरपाई के लिए अपने संगठन व केंद्र/राज्य सरकारों में पिछड़ा /दलित कार्ड खेलना शुरू कर दिया। इससे सवर्ण वापस नाराज होने लगे। और सवर्णों की नाराजगी की आखिरी कील तो तब ठुक गयी, जब पिछड़ा-दलित साधने में भाजपा ने एससीएसटी एक्ट के शांत पड़े छत्ते में ही आग लगा दी।

सिर्फ सवर्ण-पिछड़ा-दलित के सामाजिक सन्तुलन को साधने में ही भाजपा ने आत्मघाती गोल नहीं दागे बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी एक के बाद एक आत्मघाती गोल अपने पांच बरस के कार्यकाल में दागे। मसलन, नोटबन्दी और जीएसटी आदि। इसके अलावा, गुजरात के विकास पुरुष मोदी ने केंद्र में पांच साल रहकर भी विकास या रोजगार आदि का अपना एक भी वादा पूरा नहीं किया तो रही सही कसर उस अक्षमता ने भी पूरी ही कर दी।

अब भाजपा के सामने दिक्कत यह है कि माया मिली न राम की तर्ज पर उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि किसे कैसे साधें...पिछड़ा/दलित को साधते हैं तो यह बराबरी सवर्णों को रास नहीं आती। इससे खफा होकर हिंदुत्व का उनका कोर वोट बैंक सवर्ण ही उनसे दूर भागने लगता है। नाराज सवर्णों को साधने के लिए आरक्षण देने का ऐलान करते हैं तो पिछड़ा/दलित हिंदुत्व का झंडा उठाने से इनकार कर देते हैं। रही बात विकास की तो गुजरात के नाम पर देशभर के बाकी राज्यों को तो एक बार झांसे में ले लिया लेकिन अब पांच साल पूरे देशपर राज करने के बावजूद एक भी वादा पूरा न करने के बाद ऐसा सफेद झूठ कैसे बोल दें कि देश में अच्छे दिन आ गए हैं। जनता को इस सफेद झूठ पर यकीन दिलाना असंभव हो गया है इसलिए भाजपा छटपटा कर चुनाव से पहले कभी राम मंदिर तो कभी सवर्ण आरक्षण का लॉलीपॉप अपने मतदाता को थमाने निकल पड़ी है। लेकिन समस्या अब यह हो गयी है कि न तो सभी सवर्ण और न ही पिछड़ा/दलित, कोई भी उसका कोई लॉलीपॉप लेने के लिए उत्साहित नजर आ रहा है।

बहरहाल, 2019 के चुनाव के नतीजे भले ही मोदी की वापसी न कर पाएं लेकिन हिंदुत्व और विकास की बाइक पर एक साथ सवारी का यह अद्भुत स्टंट जनता को पांच बरस तक दिखाकर मनोरंजन करने की भाजपा की इस बाजीगरी को देश के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। क्योंकि कट्टर हिंदुत्व का बिगुल बजाने वाले किसी भी दल के लिए साथ ही साथ देश में विकास का एजेंडा बढ़ा पाना तकरीबन असंभव ही है। वजह साफ है कि यह देश हजारों बरसों से जिस कदर धर्म, संप्रदायों, क्षेत्रीयता और भाषायी विविधता के झगड़ों में फंसा हुआ है, उसके चलते कट्टर हिंदुत्व के नाम पर शासन-प्रशासन चलाने में देश के हर वर्ग का सहयोग कभी भी उस दल को नहीं मिल सकता। उस पर सवर्णों की इस देश के हर संसाधन पर कब्जे की हजारों बरस पुरानी प्रवृत्ति कभी भी कट्टर हिंदुत्व के नाम पर देश की पिछड़ी/दलित आबादी को एकजुट होने ही नहीं देती है। पिछड़ा-दलित जब-जब हिंदुत्व का झंडा उठाकर कट्टर हिंदुत्व के खेमे में आते हैं, उन्हें अपने अधीन करके सभी संसाधनों को हथियाने की सवर्ण मानसिकता उन्हें वापस हिंदुत्व विरोधी खेमे में ही धकेल देती है।

ऐसी सामाजिक/राजनीतिक परिस्थितियों में देश में जातीय/क्षेत्रीय/भाषायी राजनीति करने वाले छोटे-छोटे दल या फिर कांग्रेस के रूप में विकास और भ्रष्टाचार की चाशनी परोस कर लोकतंत्र के नाम पर एक ही परिवार की राजशाही चलाने वाली कांग्रेस ही देश में सत्ता में आएगी, इसमें अब कोई संदेह नहीं रह गया है। कुल मिलाकर यह कि यह देश ऐसे ही चलना है...इन्हीं सामाजिक और राजनीतिक अंतर्द्वंदों के साथ....शायद यही इसकी नियति भी है और इसी में शायद इसकी भलाई भी है।

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