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भीमा कोरेगांव मामले में प्रोफेसर हनी बाबू के नोएडा स्थित घर पर NIA की रेड, 4 दिन पहले NIA ने प्रोफेसर को किया था गिरफ्तार

प्रोफेसर हनी बाबू के सेक्टर 78 स्तिथ आवास पर एनआईए की रेड।

 Shiv Kumar Mishra |  2 Aug 2020 10:42 AM GMT  |  नोएडा

भीमा कोरेगांव मामले में प्रोफेसर हनी बाबू के नोएडा स्थित घर पर NIA की रेड, 4 दिन पहले NIA ने प्रोफेसर को किया था गिरफ्तार
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ललित पंडित

नोएडा: दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के प्रोफेसर हेनी बाबू के उत्तर प्रदेश में नोएडा स्थित घर पर 2017 के एल्गार परिषद मामले में NIA ने छापेमारी करके उन्हें चार दिन पहले गिरफ्तार कर लिया था. आज फिर उनके आवास पर NIA ने छापेमारी की है.

भीमा कोरेगांव मामले में प्रोफेसर हनी बाबू के नोएडा स्थित घर पर NIA की रेड पड़ी है. जबकि 4 दिन पहले NIA ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर को गिरफ्तार किया था. प्रोफेसर हनी बाबू के सेक्टर 78 स्तिथ आवास पर एनआईए की रेड आज फिर पड़ी है. फिलहाल उनके आवास पर एनआईए सर्च कर रही है.

क्या है पूरा मामला

45 वर्षीय बाबू दिल्ली यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाते हैं. बाबू जाति के विरोध में मुखर रूप से अपनी राय रखने के लिए जाने जाते हैं और जीएन साईबाबा डिफेंस कमेटी के सक्रिय सदस्य भी हैं. ज्ञात हो कि डीयू के प्रोफेसर जीएन साईबाबा को माओवादी आंदोलन से कथित तौर पर जुड़े होने का दोषी पाया गया था. शारीरिक रूप से 90 फीसदी अक्षम साईबाबा इस समय नागपुर केंद्रीय जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं.

बाबू का कहना है कि वे देश में चल रहे मानवाधिकार आंदोलन के सक्रिय सदस्य रहे हैं, इसलिए कई बार उनका संपर्क कैदियों के अधिकारों के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन और यूएपीए विशेषज्ञ वकील सुरेंद्र गाडलिंग से हुआ है.

मालूम हो कि पिछले साल भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया गया था. पुलिस का दावा था कि माओवादी आंदोलन से जुड़े हैं. बाबू ने आगे बताया, 'मैंने कई बार पूछा कि यह सब (तलाशी) किस बारे में है. पुलिस ने कहा कि वे भीमा कोरेगांव मामले की जांच के सिलसिले में है और क्योंकि मेरा नाम अब तक आरोपियों में नहीं है, तो मैं संदिग्ध हूं. वे इससे ज्यादा कुछ बताने को तैयार नहीं थे.'

बाबू का कहना है कि पुलिस का उनके यहां छापा मरना अजीब है, लेकिन चौंकाने वाला नहीं है. उन्होंने कहा, 'जिस तरह देश में पुलिस द्वारा सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया जा रहा है, मुझे इस पर आश्चर्य नहीं है. अगर मैं नहीं होता, तो वे किसी और के पीछे जाते।'

गौरतलब है कि पुणे के ऐतिहासिक शनिवार वाड़ा में 31 दिसंबर 2017 को कोरेगांव भीमा युद्ध की 200वीं वर्षगांठ से पहले एल्गार सम्मेलन आयोजित किया गया था. पुलिस के मुताबिक इस कार्यक्रम के दौरान दिये गए भाषणों की वजह से जिले के कोरेगांव-भीमा गांव के आसपास एक जनवरी 2018 को जातीय हिंसा भड़की जिसमें एक शख्स की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया है. बीते साल 6 जून को पुणे पुलिस ने माओवादियों से जुड़ाव का आरोप लगाते हुए तीन अलग-अलग शहरों से पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया था.

पुलिस का यह भी कहना था कि वे नक्सल गतिविधियों में संलिप्त थे. यह गिरफ्तारियां मुंबई, नागपुर और दिल्ली में हुई थीं. गिरफ्तार किए जाने वालों में सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धावले, मानवाधिकार वकील सुरेंद्र गाडलिंग, सामाजिक कार्यकर्ता महेश राउत, नागपुर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर शोमा सेन और दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन थे.

इसके बाद अगस्त में अन्य पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया था. इन कार्यकर्ताओं में मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता वेरनॉन गोंजाल्विस, पी वरवरा राव, अरुण फरेरा और पत्रकार गौतम नवलखा शामिल थे.

बीते साल नवंबर में पुलिस ने 5,000 पन्नों की चार्जशीट दायर की थी, जिसमें दावा किया गया था कि जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनके प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) से 'सक्रिय संबंध' हैं और उसकी मदद से 31 दिसंबर 2017 को पुणे में भीमा कोरेगांव शौर्य दिन प्रेरणा अभियान के बैनर तले 'एल्गार परिषद' का आयोजन किया था.

पुलिस का कहना था कि पुणे के शनिवारवाड़ा इलाके, जो सामान्य रूप से ब्राह्मण बाहुल्य माना जाता है, में हुई इस सांस्कृतिक बैठक ने महाराष्ट्र भर के दलित युवाओं को भारतीय जनता पार्टी और 'ब्राह्मण उन्मुख आरएसएस' के खिलाफ भड़काया, जिसका परिणाम राज्य भर में हुई हिंसा के रूप में निकला. उनके अनुसार एल्गार परिषद में दिए गए भाषण कथित तौर पर भड़काऊ थे और उनका उद्देश्य 'देश के लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान' पहुंचाना था.

इसके बाद इस साल की शुरुआत में पुलिस द्वारा एक अतिरिक्त चार्जशीट दायर की गयी, जिसमें बाद में गिरफ्तार किए गए कार्यकर्ताओं और वकीलों के अपराध में शामिल होने की बात कही गई, साथ ही माओवादी नेता गणपति को एल्गार परिषद का मास्टरमाइंड बताया गया.


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