Home > राज्य > उत्तर प्रदेश > सहारनपुर > सहारनपुर की फ़र्ज़ी कयादत क्या अपनी ज़मानत भी नही बचा पा रही है

सहारनपुर की फ़र्ज़ी कयादत क्या अपनी ज़मानत भी नही बचा पा रही है

 Special Coverage News |  3 May 2019 10:00 AM GMT  |  सहारनपुर

सहारनपुर की फ़र्ज़ी कयादत क्या अपनी ज़मानत भी नही बचा पा रही है

तौसीफ कुरैशी

सहारनपुर की सियासत का खुद को स्वयंभू योद्धा बताने वाले को इस बार के चुनाव में अपनी ज़मानत बचाने के लाले पड़ रहे है ऐसा सहारनपुर की सियासत पर बारिक नज़रें रखने वाले मान रहे है। सहारनपुर जनपद की सियासत में पिछले चालीस सालों से मुस्लिम वोटो पर राज कर रहे क़ाज़ी परिवार की सियासी नय्या डूबने जा रही है एक हिसाब से तो इस परिवार का सियासी खेल 2014 में ही खतम हो गया था जब परिवार के मुखिया क़ाज़ी रशीद मसूद और उनके पुत्र शाजान मसूद का विरोध करते हुए क़ाज़ी रशीद मसूद के बड़े भाई मरहूम क़ाज़ी राशिद मसूद के महत्वकांक्षी पुत्र ने अपना झण्डा अलग उठा लिया था और नरेन्द्र मोदी को लेकर विवादित बयान दे अपने चाचा व भाई शाजान की सियासी दुकान में हजमी ताला लगा दिया था और अपनी सियासी दुकान चला ली थी।

लेकिन वो दुकान मुसलमानों के जज़्बातों के साथ खिलवाड़ कर खोली गई थी जिसके लूटने में ज़्यादा दिन नही लगे अगले चुनाव यानी 2019 में यह जज़्बाती सियासी दुकान लूट चुकी है उसकी सियासी दुकान न लूटे इसके लिए कुछ चिरकुट टाइप के लोगों ने जातिवाद का षड्यंत्र रचने की भरपूर कोशिश की कि कुछ तो लाज बच जाए लेकिन कोई फ़ार्मूला काम नही आया कुछ शेखजादा जाति के लोगों ने बिरादरीवाद का ज़हर पैदा किया ताकि शेखजादा जाति का ही वोट मिल जाए लेकिन जो चिरकुट टाइप के लोग ये काम कर रहे थे उनको यह बात शायद मालूम नही थी कि ये चुनाव लोकसभा का था न कि सभासदी या पार्षद का सही मायने में तो वो चुनाव भी जातिवाद पर नही जीते जा सकते है ये तो बहुत बड़ा चुनाव था।


आज जबकि सबकुछ खतम हो चुका है हो सकता है इस महत्वकांक्षी स्वयंभू योद्धा की ज़मानत ही ज़ब्त हो जाए या बच जाए ये तो 23 मई को मतगणना के बाद पता चल जाएगा।वही जातिवादी उन्मादी चिरकुट टाइप के लोग अभी भी अपनी ज़िद पर अंडे है कि गठबंधन के प्रत्याशी हाजी फजलूर्रहमान नही जीतना चाहिए चाहे मोदी की भाजपा के प्रत्याशी राघव लखनपाल शर्मा जीत जाए और यह कहकर इंशाअल्लाह का भी प्रयोग कर रहे है अब क्या कहे इस गंदी सोच को अरे मुर्खो चालीस साल सबने वोट दिया उसका कुछ नही आज किसी और मुसलमान का नंबर आ गया तो जातिवाद का ज़हर बाहर निकलकर आ गया बर्दाश्त नही हो रहा नाकारा लोगों से शेखजादा बिरादरी में जातिवाद होता है यह कुछ ही लोग जानते थे लेकिन इस चुनाव ने उनके नक़ाब को उतार दिया है।


वैसे 2004 के लोकसभा चुनाव में भी शेखजादा जाति ने अपने जातिवादी होने का सबूत दिया था जब समाजवादी से मरहूम चौधरी मुनव्वर हसन और कांग्रेस से शेखजादा जाति के नेता सईदुज्जमा चुनाव लड़ रहे थे शेखजादा जाति ने जब भी अपनी जाति के नेता सईदुज्जमा को ही वोट दिया था और बाक़ी ने मरहूम मुनव्वर हसन को वोट दिया था और जीत भी मरहूम चौधरी मुनव्वर हसन की ही हुई थी वैसे ही जैसे 2019 के चुनाव में सबने मिलकर गठबंधन को वोट दिया और शेखजादा जाति ने अपना अधिकत्तर वोट अपनी जाति के कांग्रेस प्रत्याशी को दिया जबकि यह चुनाव जातिवाद का चुनाव नही था इस चुनाव में एक तरफ़ साम्प्रदायिकता थी तो दूसरी तरफ़ सबको साथ लेकर चलने वाली ताकते थी वो सब गठबंधन को लड़ा रही थी और कुछ चिरकुट छाप शेखजादा-शेखजादा करते घूम रहे थे फ़र्ज़ी कयादत की बात कर रहे थे।


मुसलमानों का नेता खतम होने ही दुहाई देते घूम रहे थे लेकिन जब उनसे कयादत के मायने पूछे जाते थे कि क्या किया है उस फ़र्ज़ी कयादत करने वाले ने मुसलमान के लिए तो पुलिस की बात करते थे कि मुसलमान को पुलिस से बचाते है क्या पूरे मुसलमान आपराधिक प्रवर्ती के है इस सवाल का फ़र्ज़ी कयादत की दुहाई देने वालों के पास कोई जवाब नही था जहाँ तक मुसलमान का आपराधिक प्रवर्ती का सवाल है ये संख्या चन्द मुसलमानो में है बाक़ी मुसलमान अमन पसंद है बल्कि ऐसे भी है जिनकी कई-कई नस्लें गुज़र गई उन्होने थाने या पुलिस की शक्ल तक नही देखी और फ़र्ज़ी कयादत करने का दावा करने वाले कहते है कि हमारा नेता मुसलमान को पुलिस से बचाते है शर्म आती है ऐसे लोगों और उनकी सोच पर लेकिन कुछ चिरकुटो को छोड़कर शायद इसका असर नही हुआ है या यूँ कहे कि अगर हुआ भी है तो इनकी शर्मनाक हरकत से गठबंधन की सेहत पर कोई फ़र्क़ नही पड़ा है जैसे 2004 के चुनाव में चौधरी मुनव्वर हसन जीते थे ऐसे ही इस बार गठबंधन प्रत्याशी हाजी फजलूर्रहमान चुनाव जीत रहे है इंशाअल्लाह वैसे कुछ समझदार शेखजादा जाति के लोगों ने इसका विरोध भी किया कि ऐसा नही होना चाहिए हम सबको सही बात बताने वाले भी अगर जातिवाद की बातें करने लगेंगे तो फिर जाहिलो और हममें क्या फ़र्क़ रह जाएगा लेकिन कुछ जाहिल मानने को तैयार नही हुए और जातिवाद पर ही खड़े और अंडे रहे और आज तक भी वही बेहूदगी की बातें कर रहे है।


सवाल यह भी है कि शेखजादा जाति के ही कुछ लोग अंसारी जाति पर जातिवादी होने का आरोप लगाते थे कि अंसारी जाति के लोग जातिवादी है क्या अब उनको ये बात कहने का हक है जब तुम बिरादरीवाद करो तो ठीक और दूसरा करे तो गलत जबकि सच्चाई ये है कि अंसारी जाति ने और सभी जातियों ने मुसलमान बनकर वोट दिया ये कटू सत्य है।इस तरह की हरकत से सहारनपुर की सियासत के स्वयंभू योद्धा को बहुत नुक़सान उठाना पड़ेगा ऐसा सियासत पर बारिक नज़रें रखने वाले मान रहे है।उनका कहना है कि सियासत में बोए हुए बीज का फल बहुत दिनों तक आता रहता है वो अच्छा हो या बुरा ये उसकी सियासी चालों से पता चलता है इस बार सहारनपुर की सियासत पर एक छत्र राज करने वाले परिवार की हर चाल उलटी पड़ रही थी।


Tags:    
स्पेशल कवरेज न्यूज़ से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें न्यूज़ ऐप और फेसबुक पर ज्वॉइन करें, ट्विटर पर फॉलो करे...
Share it
Top