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मीम-भीम के दूध की मलाई खाएगा कौन?

भीम आर्मी भी लगी मलाई की ठेकेदार बनने की तैयारी में

 Special Coverage News |  2018-09-22 14:38:45.0  |  सहारनपुर

मीम-भीम के दूध की मलाई खाएगा कौन?

तौसीफ कुरैशी

लखनऊ।आरएसएस ने अपना काम शुरू कर दिया है मिशन 2019 को जीतने के लिए बसपा को कमज़ोर दिखाने का सिलसिला शुरू कर दिया है इस बार हथियार बनाया जा रहा है भीम आर्मी के अध्यक्ष चन्द्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि चन्द्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण बसपा के वोटबैंक को बाँटने में कामयाब हो रहा है।जैसे-जैसे 2019 नज़दीक आ रहा है वैसे-वैसे बयानवीरों की बयानबाज़ी भी तेज़ी से बढ़ती जा रही है।


हर रोज़ नए-नए घटनाक्रम देखने को मिल रहे है। कोई सॉफ़्ट हिन्दुत्व की तरफ़ भाग कर कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर रहा है। तो कोई भगवान विष्णु का मन्दिर बनवाने की बात कर रहा है। वही हिन्दुत्व के ठेकेदार अपनी कठोर नीति के विपरीत मस्जिद का दौरा कर एक अलग ही संदेश देने की कोशिश कर रहे है। वही अब तक पानी पी-पी कर कांग्रेस को कोसने वाली आरएसएस कांग्रेस की तारीफ़ो के पुल बाँधने में कोई कोर कसर बाक़ी नही छोड़ रही है। ऐसा बदलाव क्यों आ रहा है? उसे इस बात का अहसास हो चला है कि जिस नीति से 2014 का चुनाव जीता था। उस तरीक़े से भारत जैसे देश में ज़्यादा दिन तक सत्ता में बने नही रह सकते इस लिए देश में इस तरह के दाँव पेंचों का प्रयोग किया जा रहा है व उसकी राजनीतिक पार्टी भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत की बात करती है और कहती है कि सत्तर सालों में देश ने कुछ नही किया अब देश की जनता किस पर यक़ीन करें कि इनकी कौनसी बात सच है। जिनका इतिहास रहा कि देश में साम्प्रदायिकता फैले और फैल भी गई, देश आज उस मुहाने पर खड़ा है कि कौई एक दूसरे की बात को सुनने तक को तैयार नही है।


इन्हीं सबके बीच राजनीति के गलियारों में नए समीकरण बनाने की तैयारी की जा रही है। उत्तर प्रदेश इसमें मेन है ओर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी एक मज़बूत दल है उसको कमज़ोर दर्शाने के लिए भीम आर्मी के संस्थापक को उभारा जा रहा है। ऐसे साबित करने की कोशिश हो रही है कि चन्द्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण बसपा के दलित वोटबैंक में सेंध मारी कर रहा है। जबकि हक़ीक़त कुछ और ही है बसपा का वोटर अपनी जगह मज़बूती से खड़ा है। वह किसी भी सूरत में बसपा के ख़िलाफ़ न कभी गया न उसने नयी कयादत्त की तलाश की वह एक मुस्त होकर लम्बे अर्से से बसपा के साथ चल रहा है।


मोदी की भाजपा की सरकार में दलितों पर हुए अत्याचारों की घटनाओं से मोदी की भाजपा के ख़िलाफ़ लाम्बंध हो रहा है उसी को ध्यान में रख यह सब हो रहा है। वही मुस्लिम वोट भी पहले से ही मोदी की भाजपा के विरूध लाम्बंध है ही वह तो मानता ही नही अब इन दोनों मज़बूत और टिकाऊ वोटबैंक को हथियाने के तरीक़े तलाशे जा रहे है। वैसे मुसलमान सपा कंपनी का बँधवा मज़दूर माना जाता है लेकिन वह भी किसी ऐसे दल की तलाश में है जो मोदी की भाजपा को ज़मीन पर लाने में सक्षम हो तो उस फ़्रेम में दलित सबसे फ़िट बैठता दिख रहा है। यदि कोई पार्टी इन दोनों वोटबैंक को क़ब्ज़ाने में कामयाब होती है। तो वह प्रदेश में उसकी दमदार उपस्थित दर्ज करने सफल हो सकती है।


फ़िलहाल इन दोनों ही मज़बूत वोटबैंक की भट्टी पर गर्म होते दूध की सुगंध लेना चाह रही पार्टियाँ अपने-अपने तरीक़े से डोरे डाल रही है लेकिन यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा कि मीम भीम की यह मलाई किसकी क़िस्मत आती है यही तमन्ना लिए सियासी दल उनके दरवाज़े हाजरी लगा रहे है।यह सब न हो इस लिए आरएसएस ने एक योजनाबद्ध तरीक़े से भीम आर्मी को इस्तेमाल किया जा रहा। इसी क्रम में चन्द्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण ने अपना दायरा बढ़ाने के लिए मुस्लिम संगठनों को भी साधना शुरू कर दिया है। विश्वविख्यात इस्लामिक नगरी देवबन्द में एक ऐसा ही घटनाक्रम हुआ जिसमें भीम आर्मी के चीफ़ ने हिन्दुस्तान में मुसलमानों के सबसे बड़े संगठन जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी से मुलाक़ात की। मुसलमानों में हज़रत मौलाना सैयद अरशद मदनी एक ऐसी शख़्सियत है। जिन पर उगली नही उठाई जा सकती चाहे वह कोई भी मामला हो वह देश की भलाई व मिल्लत के लिए दिन रात काम करते है। उनसे रावण की मुलाक़ात को हथियार बनाकर गोदी मीडिया तरह-तरह की चर्चाओं को फैलाने का काम कर रही है। जैसे 2017 के विधानसभा के चुनाव में मुसलमानों से आरएसएस ने कैसे वोटिंग कराई थी। हम सबके सामने है गोदी मीडिया के ज़रिए से इस बात का यक़ीन दिला दिया कि सपा कंपनी की सरकार दुबारा बनने जा रही है।


बस फिर क्या था मुसलमान पागल हो गया और कहता फिरने लगा कि अगर हारे भी तो मंत्री बनेगा क्योंकि सरकार तो गठबंधन की आ रही है। मैंने अख़बार में पढ़ा जबकि वह सब फेंक ख़बरें थी जिससे मुसलमान टेकफुल वोटिंग न कर दे कि जहाँ भाजपा को कोई भी हरा रहा हो उसी को वोट करो ऐसा होने पर आज प्रदेश के जो हाल है ऐसे न होते। लेकिन मुसलमान की जब यह बात समझ में आई तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ऐसा ही अब भीम आर्मी को लेकर भ्रम फैलाने की कोशिश हो रही है। जिसको मुसलमानों और दलितों को दरगुजर करना पड़ेगा नही तो 2017 व 2014 फिर दोहरा दिया जाएगा और मुसलमान -दलित के हाथ से वह अवसर निकल जाएगा। जिसका वह बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है।


यह सवाल जब तक बना रहेगा जब तक मुसलमान-दलित टेकफुल वोटिंग नही करता और अगर इन दोनों ने सही दिशा में जाकर वोटिंग की तो यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि मोदी की भाजपा देश में दुबारा सरकार नही बना पाएगी और अगर ऐसा न हुआ तो उसे आने से कोई रोक नही पाएगा। यह भी एक कड़वा सच है जिसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। सियासत में ज़रूरी है रवादारी समझता है वो रोज़े तो नही रखता लेकिन अफ्तारी समझता है।

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