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आजाद भारत के एक थे जनरल साहिब,

चालीस साल बाद, हम नेहरू के कपड़े फाड़ने के लिए सुभाष और थिमैया को हथियार बनाते है। जरा इतिहास में ठीक से देखिए, तो पाएंगे कि वे लोग अपनी लाज रखे जाने के लिए खुद नेहरू के ऋणी हैं।

 Shiv Kumar Mishra |  8 Oct 2020 2:26 AM GMT  |  दिल्ली

आजाद भारत के एक थे जनरल साहिब,
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अपने चेम्बर में लार्ड क्लाइव और वारेन हेस्टिंग्ज के पोर्ट्रेट लटकाये रखे थे। दूसरे भी कुछ आरोप थे, जिससे जाहिर था की उनकी भारत के प्रति वफादारी में खोट था। उन पर जांच बिठा दी गयी।

1958 में पाकिस्तान में एक सैनिक विद्रोह हुआ। जनरल अयूब ने लोकतन्त्र को डस्टबिन में फेंक कर खुद को राष्ट्रपति नियुक्त कर लिया। दरअसल पिछले दस सालों में अमरीकी मिलिट्री मदद से सेना इतनी ताकतवर हो चुकी थी, की सिविलियन लीडरशिप को बचाव का कोई मार्ग नही था।

इसी दौर में भारत के सेनाध्यक्ष थे- जनरल थिमैया याने टिमी। नेहरू के प्रिय जनरल, जिन्हें मोस्ट सीनियर न होने के बावजूद उन्होंने सेनाध्यक्ष पर प्रमोट किया था। समय के साथ नेहरू के साथ उनके मतभेद हो गए। चीन नीति को लेकर मतभेद थे।


मोदी जी और सभी देशभक्त सही कहते हैं, कि नेहरू ने थिमैया की सुनी होती, तो भारत चीन से नहीं हारता। पर कारण जरा अलग है, थिमैया रक्षा मंत्री मेनन की तमाम फौजी खरीद, नई ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीयों, मिलिट्री कालेजों और सेना की संख्या में ताकत बढ़ोतरी करने के बावजूद यह मानते थे कि भारत चीन से लड़ने के योग्य नही हुआ। उसे टकराव से बचना चाहिए। पर नेहरू चीन सीमा में आगे बढ़ते जा रहे थे।

1954 में नेहरू ने नए नक्शे बनवाये। वही जिसे हम आज देखते है, जिसमे अक्साई चिन, औए नेफा भारत मे दिखाया गया है। अब भारत का सैन्यबल एक एक कर इन इलाकों को आगे बढ़कर कब्जा कर रहा था। थिमैया इसे आग से खेलना समझते थे, मगर नेहरू ने न सुनी। पर आज बात फारवर्ड पॉलिसी की तो नही है।

आज बात जनरलों की ..

1958 में भारत की सेना भी पाकिस्तान और चीन के मद्देनजर मजबूती, विस्तार और आधुनिकीकरण को बढ़ रही थी। तभी पाकिस्तान की मजबूत सेना एक जो तख्तापलट किया, आगे के घटनाक्रम उस रोशनी में देखिए।

थिमैया साहब का दिल्ली में जो बंगला था, उनके पड़ोसी थे ब्रिटिश राजदूत मैकडोनल्ड। अक्सर शाम को मिलते, चिट चैट होती। टिमी साहिब बताते की उनके यहां कित्ती टेंशन है। नेहरू की कौन सी पॉलिसी गलत है, मेनन क्या कहते हैं, कौन किसे गाली देता है, कहाँ क्या हो रहा है। राजदूत साहब को जो जानकारियां किसी स्पाई से मिलती, हमारे सेनाध्यक्ष दे रहे थे। सारी रिपोर्टिंग लन्दन को होती। अपनी सरकार को भेजे, मैकडोनल्ड के केबल्स, रिपोर्ट और सोर्स, अब पब्लिक डोमेन में हैं।

जनरल थिमैया अपने प्रिय डिप्टी, ले. ज. थोराट को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। इतिहास में पहली और आखरी बार सिटिंग जनरल ने, अपने उत्तराधिकारी नियुक्त करने के लिए एक पत्र सीधे राष्ट्रपति को लिखा। वह सुप्रीम कमांडर होते है, नियुक्ति आखिर उनको करनी है। राजेन्द्र प्रसाद ने इसे स्वीकार भी लिया, नियुक्ति के लिए फाइल पीएमओ को भेज दी गयी। पीएमओ के कान खड़े हुए। कहा, संविधान का सिस्टम नही है। प्रसाद बाबू ने मान लिया।

( हाल में एक जनरल ने भी अपने पीछे लाइन ऑफ सक्सेशन बदलने के तमाम जतन किये थे, और जिसे जनरल न बनने देना चाहते थे, उसके खिलाफ जाँच बिठा दी थी। उन्हें मुंह की खानी पड़ी, फिर वे चोला बदलकर विरोधी पार्टी के सांसद और और केंद्रीय मंत्री हो गए)


बाद में सरकार ने सीनियरिटी प्रिंसिपल का पालन करते हुए, अपनी ओर से जनरल थापर का नाम घोषित किया। इसके पहले थापर साहब ने अपने जरनल थिमैया को एक चिट्ठी लिखकर 13 आरोप लगाए, जिसमे विदेशी हथियार सौदागरों से रिश्ते, मिलिट्री सीक्रेट्स की लीक और सिविलियन लीडरशिप के खिलाफ बोलने आरोप शामिल थे।

थापर ने थोराट को भी एक पत्र लिखा, जिसमे इस तरह के 5 आरोप लगाए। कॉपी पीएम-राष्ट्रपति सबको भेजी। इन सबके बीच एक थे ले.ज. जनरल बीएम कौल। नेहरू से रिश्तेदारी के झूठे दावे, कश्मीरी ओरिजन, अंग्रेजी और चापलूसी के बूते रक्षा मंत्री मेनन के खास हो गये थे। इन्होंने थिमैया के कानों में जो कहा, थिमैया ने रिजाइन कर दिया।

रिजाइन नेहरू के समझाने पर तुरंत ही वापस ले लिया। मगर उनके एक और खास ले.ज. जे एन चौधरी थे। यह महाशय सरकारी नौकरी में थे, सेना में थे, और इसके साथ द स्टेट्समैन के मिलिट्री करिस्पांडेंट भी थे। ( मुंह मत बाइये, खुद ऑटोबायोग्राफी में लिखा हैं). यह स्टेट्समैन 60 के दशक का स्टेट्समैन है, जिसके मालिकान ब्रिटिश थे। तो इस्तीफे की खबर एक्सक्लूसिवली स्टेट्समैन में छपी। सरकार शर्मसार हुई, विपक्ष को तब और आज का हथियार मिला।

थिमैया एक और जनरल के पीछे पड़े, जिनका नाम एस डी वर्मा था। जांच हुई, कुछ न निकला। एक और ले. ज. जनरल की जांच कराई, जिसके कमरे में क्लाइव और हेस्टिंग्ज के पोर्ट्रेट लगे होना जांच का हिस्सा था। उस जनरल का नाम सैम मानेकशा था। नाम तो सुना ही होगा।

1961में एक खबर उड़ी जिसमे अम्बाला से एक डिवीजन दिल्ली कूच का आदेश दिया गया। इसके साथ झांसी से एक आर्मर्ड डिवीजन को मथुरा कूच के आदेश हुए। प्रोटोकाल के विरुद्ध सेनाध्यक्ष ने सीधे लोकल सीओ को आदेश दिए थे, कारण अस्पस्ट था। तख्तापलट की खबरें उड़ी, दिल्ली में पैनिक छाया। फोन घूमे, कुछ इंतजाम हुए, और फिर यह खबरे अफवाह करार दी गयी। अखबारों के लिए थापर ने आदेश देने का जिम्मा ले लिया।--

टिमी, याने थिमैया 1961 में रिटायर हो गए। पद्मभूषण भी मिला, विदेशो में यूएन सेना की कमांड भी मिली। उनके बाद थापर सेनाध्यक्ष हुए। रक्षामंत्री मेनन और सेनाध्यक्ष थापर ने ने 1961 में गोआ विजय का सेहरा बांधा, तो 1962 की हार के बाद अपमानित हुए, रिजाइन कर दिया। उनके बाद जनरल चौधरी, वही स्टेट्समैन वाले, सेनाध्यक्ष भी हुए, और 1965 के युध्द के हीरो हुए।


थिमैया के प्रिय थोराट ले.ज. से ही रिटायर हुए। और वो वारेन हेस्टिंग्स और क्लाइव का प्रेमी मानेकशा, फील्ड मार्शल हुए। 71 जिताने वाले सैम को हिंदुस्तान सबसे बड़ा वार हीरो मानता है। थिमैया के दौर में बाल बाल न बचे होते, तो आप उनकी शानदार मूछों के बाल न पहचानते।

अक्सर हम नेताओं को फेलियर का जिम्मेदार मानते है, सेना पवित्र होती है। सच यह है वहां भी इंसान है, ईगो है, महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व है। किसकी महत्वाकांक्षा कहाँ तक है, कहना मुश्किल है। इस तरह के प्रोफेशनल्स पर नियंत्रण कठिन होता है।

एक ऐसे देश मे जो अभी बना है, जिसके सिस्टम्स अभी डेवलप हो रहे हों, जिसके जुड़वां पड़ोसी देश मे स्थिति नियंत्रण से बाहर जा चुकी हो, नेहरू जैसे व्यक्तित्व ने संभाला, और सबका सम्मान बरकरार रखा।

चालीस साल बाद, हम नेहरू के कपड़े फाड़ने के लिए सुभाष और थिमैया को हथियार बनाते है। जरा इतिहास में ठीक से देखिए, तो पाएंगे कि वे लोग अपनी लाज रखे जाने के लिए खुद नेहरू के ऋणी हैं।

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