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#Metoo अभियान के बवंडर में मीडिया, कई नामचीनों के बेनक़ाब होने का ख़तरा

 Yusuf Ansari |  2018-10-10 07:15:07.0  |  Delhi

#Metoo  अभियान के बवंडर में मीडिया, कई नामचीनों के बेनक़ाब होने का ख़तरा

यूसुफ़ अंसारी

कई देशों में बवंडर मचाने के बाद मी-टू कैंपेन अब भारत में भी असर दिखाने लगा है. हॉलीवुड में कई बड़े लोगों बेनकाब करने को बाद इस कैंपेन ने बॉलीवुड में कहर बरपा कर रखा है. बॉलीवुड के 'संस्कारी बाबूजी' समेत कई असंस्कारी और गैर संस्कारी लोग भी बेनकाब हुए हैं. अब मी टू कैंपेन का बंवडर सत्ता के गलियारों और राष्ट्रीय मीडिया जगत तक पहुंच गया है. ऊंचे पदों पर बैठे कई लोगों के बेनकाब और कईयों के बदनाम होने का खतरा मंडराने लगा है.

मी-टू कैंपेन के तहत अब महिलाएं अब अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की बात खुल कर क़बूल रही हैं. विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर पर उनकी पूर्व सहकर्मी ने आरोप लगाकर राष्ट्रीय मीडिया जगत और सत्ता के गलियारों में हलचल मचा दी है. हर संपादक और बड़ा पत्रकार डरा हुआ है. पता नहीं कब कौन महिला किसके खिलाफ इस तरह के आरोप लगाकर उसे बेनकाब कर दे या बदनाम कर दे. पत्रकारों में तो चर्चा अब ही-टू (#Hetoo) यानी उसने भी ऐसा किया शी-टू (#Shetoo) यानी उसके साथ भी ऐसा हुआ और यू-टू (#Youtoo) यानी तुम्हारे साथ भी ऐसा हुआ या फिर तुमने भी ऐसा किया जैसे मुद्दे पर हो रही है.

दिल्ली में पत्रकारिता करते हुए पिछले 20 साल में कई बार ऐसे मौके आए हैं जब साथी महिला पत्रकारों ने अपने साथ हुई बदसलूकी की बात बताई. यह बताया कि किस-किस ने उनसे किस मौक़े पर किन हालात में 'सेक्सुअल फेवर' की डिमांड की या फिर अनैतिक ऑफर दिए.

बीस साल पहले एक साथी महिला पत्रकार ने बताया था कि एक केंद्रीय मंत्री ने उसे अपने साथ हफ्ते भर के लिए उत्तर-पूर्वी राज्यों के दौरे पर चलने का ऑफर दिया है. सरकारी खर्चे पर. उसे उसके दौरे की मीडिया कवरेज करनी है और साथ ही मौज मस्ती भी. उसने ऑफर ठुकरा दिया था. इसे लेकर वो कई दिन परेशान रही. उसे यक़ीन नहीं हो रहा था कि कोई मंत्री ऐसे खुला ऑफर दे सकता है. उसने अपने बॉस से इसकी शिकायत भी की लेकिन बॉस ने मामले को रफा-दफा करने की सलाह दे डाली. तातक्लीन वाजपेयी सरकार के ये मंत्री महोदय आज मोदी सरकार में भी मंत्री हैं.

लगभग उन्हीं दिनों की बात है. कांग्रेस के एक सह प्रवक्ता मीडिया विभाग में बैठे पत्रकारों से बात कर रहे थे. मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव होने वाले थे. टिकटों के बंटवारे पर बात चल रही थी. नेता ने पास बैठी एक महिला पत्रकार को यह कहकर शर्मसार कर दिया था कि मध्यप्रदेश में वह जहां से चाहे वो उन्हें टिकट दिला सकते हैं. उस नेता की रंगीन मिज़ाजी किस्से राजनीतिक गलियारों में मशहूर थे महिला पत्रकार यह सुनकर शर्मसार हो गई. उन्होंने अचानक आए इस ऑफर पर नाराज़गी जताई. नेता जी ने इसे मज़ाक़ कह कर पिंड छुड़ाया.

एक न्यूज़ चैनल में लंबे समय तक काम करते हुए कई साथी महिला पत्रकारों ने अपनी आपबीती सुनाई. बताया कि उनके साथ कैसी-कैसी घटिया हरकतें हो रही हैं. किसी को छुट्टी के लिए बॉस ने अपने साथ घूमने-फिरने का ऑफर दिया तो किसी को एंकर बनाने के लिए साथ सोने का ऑफर दिया गया. ज्वाइनिंग के कुछ ही दिन बाद अचानक एंकर बनी एक सहकर्मी ने बताया कि उसे एंकर बनाए जाने के बदले में बॉस 'सेक्सुअल फेवर' की मांग कर रहा है. लगातार फोन करके परेशान करता है. मैसेज करता है. मांग नहीं माने जाने पर कैरियर बर्बाद करने की धमकी देता है. मैंने कहा है एचआर में शिकायत कर दो. वो हिम्मत नहीं जुटा पाई. नौकरी चले जाने का खतरा था. काफी बदनामी झेली. बाद में एक और लड़की की शिकायत पर बॉस की नौकरी ही चली गई थी.

एक बड़े टीवी चैनल से सीनियर प्रोड्यूसर पर महिला सहकर्मी ने लिफ्ट में बदसुलूकी करने का आरोप लगाया . सीनियर प्रोड्यूसर ने सफाई दी कि लड़की एंकर बनना चाहती थी. उसे नहीं बनाया गया तो बदनाम कर रही है. बहरहाल लड़की आरोपों पर अड़ी रही. बदसलूकी के आरोप में उन्हें चैनल से निकाला गया था. लेकिन हफ्ते भर बाद ही दूसरे चैनल में बॉस बन गए. वहां भी उन पर वैसे ही हरकत करने का आरोप लगा. नतीजा यह हुआ कि लड़की और बॉस दोनों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा. लड़की तो गुमनामी के अंधेरे में खो गई. लेकिन बॉस अपने पुराने बड़े चैनल में लौट आए. पूरे सम्मान के साथ वही जमे हुए हैं.

क़रीब दस सल पहले एक करीबी मित्र ने अपनी भांजी को कहीं चैनल में काम दिलवाने की सिफारिश करने को कहा. मैंने उसे एक टीवी चैनल के एंटरटेनमेंट हेड के पास भेज दिया. उन्हें बता दिया कि क़रीबी मित्र की बहन की बेटी है. मदद कर दीजिएगा. हफ्ते भर बाद उन्होंने मुझे बताया कि लड़की को कुछ नहीं आता है. न जानकारी है और न हीं लिख पाती है. न आवाज़ ही अच्छी है. फिलहाल चल नहीं पाएगी. आगे कुछ होता है तो मैं मदद करूंगा. मैंने अपने मित्र को यह कर टाल दिया कि अभी गुंजाइश नहीं हैं. आगे देख लेंगे.

बात आई गई हो गई. कई महीने बाद वो लड़की फिर काम के सिलसिले में मिलने आई. बोली- प्लीज़ सर, उनके पास दोबारा मत भेजिएगा. वो अच्छे इंसान नहीं है. उसके बाद जो कुछ उसने बताया वो सब मेरे लिए बहद हैरान करने वाला था. लड़की ने बताया कि उन्होंने उसे ऑफिस के बाहर कहीं होटल में मिलने को कहा. बॉलीवुड में काम दिलाने को कहा. ऑफर दिया कि अगर वो उन्हें खुश कर दे वो उसे किसी भी चैनल में काम दिलवा कर बड़ी न्यूज़ एंकर बनवा देंगे. फिल्म में हिरोइन भी बनवा देंगे.

मुझसे मिलकर वो चली गई. कई साल बाद उसने बताया कि उसने कई चैनलों में नौकरी के लिए ट्राई किया. सब जगह से उसे ऐसे ही ऑफर मिले. उसने नौकरी की उम्मीद ही छोड़ दी. छोटे-मोटे ब्रांड के लिए मॉडलिंग की. टीवी ऐड में काम किया. कुछेक टीवी सीरियल्स में भी छोट-मोटा काम मिला. आज वो शादी करके अपनी गृहस्थी संभाल रही है. उसे इस बात का मलाल नहीं है कि वह बड़ी टीवी एंकर या फिल्म स्टार नहीं बन पाई. इस बात की खुशी है वह हवस का शिकार होने से बच गई.

मीडिया जगत में ऐसे तमाम किस्से हैं . हर चैनल के दफ्तर में. हर अखबार के दफ्तर में. हाल ही में एक नए टीवी न्यूज़ चैनल में काम करने वाली लड़की अपने दो सीनियर्स के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं. पहले तो नोएडा के थाना सेक्टर-20 में उसकी एफआईआर लिखने से मना कर दिया. लड़की अड़ी रही तो पुलिस को मामला दर्ज करना पड़ा. कई साल पहले दो बड़े टीवी चैनलों में एंकर ने सीनियर्स पर ऐसे ही आरोप लगाए था. लड़कियों के नौकरी से हाथ धोना पड़ा. बाद में कहीं और भी नौकरी नहीं मिली.

बड़ी शर्म की बात है कि जो टीवी चैनल और अखबार दुनिया भर में हो रही नाइंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं वो अपने यहां ही महिलाओं को सम्मान और इंसाफ नहीं दिल पाते. अब तक सामने वाले ज़्यादातर मामलो में गाज महिलाओं पर ही गिरी है. इक्का-दुक्का मामलों में पुरुषों का नौकरी गई. लेकिन जल्द ही उन्हें दूसरी जगह ससम्मान नई नौकरी और ऊंचा ओहदा मिल गया. सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायतों के बावजूद मीडिया संसथानों में वर्क प्लेस पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए जारी की गईं विशाखा गाइडलाइंस का पूरी ईमानदारी से पालन नहीं किया जा रहा.

अक्सर यह देखा गया है कि अगर किसी संस्थान में कोई महिला अपने साथ हो रही बदसुलूकी के खिलाफ आवाज़ उठाती है तो मैनेजमेंट पुरुष सहकर्मी के साथ के खड़ा हो जाता है. सबसे पहले महिला का चरित्र हनन किया जाता है. उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है या उसे इतना बदनाम कर दिया जाता है कि वो खुद ही नौकरी छोड़कर चल जाती है. तमाम संपादक बॉस का आपसी नेटवर्क मज़बूत नेटवर्क है. मजाल कि ऐसी किसी लड़की कहीं और नौकरी मिल जाए.

मीडिया संस्थानें में किसी न किसी रूप में यौन उत्पीड़न की शिकार हुई ये तमाम महिला पत्रकार अगर मी-टू अभियान के तहत बड़े पत्रकारों को बेनक़ाब करने पर उतर आएं और अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की पुलिस में शिकायत कर दें तो अख़बारों और न्यूज़ चैनलों के आधे से ज्यादा संपादकों के जेल जाने की नौबत आ जाएगी. कई बड़े चेहरे बेनकाब हो जाएंगे. कुछ भी हो मी टू कैंपेन की वजह से आज महिलाओं में अपने खिलाफ हुए दुर्व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत आई है. इस अभियान ने दुनिया भर में महिला सशक्तिकरण की मुहिम को मज़बूती दी है.

जो लोग महिलाओं के 10 साल या 20 साल बाद आवाज उठाने पर सवाल उठा रहे हैं उन्हें इन महिलाओं की पीड़ा को समझना चाहिए. इतना वक्त बीतने के बावजूद उनके ज़ख्म अगर हरे हैं तो वो किस मानसिक मानसिक दबाव से गुजरी होंगी. इका अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है. लंबे समय तक चुप रहने पर सवाल उठाना जायज़ नहीं है. सुप्रीम कोर्ट रह चुका है कि अगर किसी महिला के साथ बचपन मे ऐसी कोई घटना हुई है तो वो पूरी ज़िंदगी मे कभी भी उसकी शिकायत कर सकती है. उसकी जांच कराई जाएगी.

पिछले साल फिल्म स्टार जितेंद्र की बुआ की बेटी ने 35 साल पहले किए गए यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया है. मामले की जांच चल रही है. दोषी पाए जाने पर जवानी में लिए गए मज़े के लिए जितेंद्र को बुढ़ापे में सज़ा भुगतन पड़ सकती है. जो महिलाए मी-टू कैंपेन के ज़रिए अपने साध हुए दुर्व्यहार का खुलासा कर रही हैं उन्हें बाक़ायदा पुलिस मे रिपोर्ट भी लिखवानी चाहिए. दोषी को सलाखे के पीछे भिजवाने की कोशिश करनी चाहिए. तभी इसकी सार्थकता है. वर्ना यह अभियान लोगों को बदनाम करने का ज़रिए बन कर रह जाएगा.

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