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गांधी से नहीं जीत सकती दुनिया की कोई भी फौज !

इस मसले पर गांधी से नफ़रत करने वालों का मानना था कि लड़ाई तो सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे वे क्रांतिकारी लड़ रहे हैं, जो बम/ गोली/ बंदूक यानी हिंसा की ताकत का प्रदर्शन करके अंग्रेजी सेना से सीधा मुकाबला करके जान ले और बलिदान दे रहे हैं।

 अश्वनी कुमार श्रीवास्त� |  2 Oct 2020 3:53 AM GMT  |  दिल्ली

गांधी से नहीं जीत सकती दुनिया की कोई भी फौज !
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मृत्यु के 72 बरस बाद भी आज अपनी जन्म तिथि पर महात्मा गांधी को दुनियाभर से प्रेम के साथ- साथ उन्हें नापसंद करने वाले बहुत से लोगों से कटु शब्दों में निंदा भी मिल रही है... शायद उसी तरह, जिस तरह जीते जी उन्हें मिलती रही है। गांधी दरअसल अपने जीवनकाल में भी अपने विरोधियों से इसी तरह कटु शब्द सुनते रहे थे।

अहिंसा, सत्याग्रह, अनशन जैसे शांतिप्रिय मगर सबसे खतरनाक हथियारों से भारत को आजाद कराने की जो लड़ाई गांधी ने छेड़ी थी, उससे न सिर्फ अंग्रेज नाराज थे बल्कि खुद भारत में बहुत बड़ी तादाद में लोग उनसे नाराज थे। नाराज़गी की वजह यह थी कि गांधी के इस अहिंसावादी तरीके को वह हथियार मानते ही नहीं थे और यह कहते थे कि इससे भारत के लोग कायर हो रहे हैं। इस मसले पर गांधी से नफ़रत करने वालों का मानना था कि लड़ाई तो सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे वे क्रांतिकारी लड़ रहे हैं, जो बम/ गोली/ बंदूक यानी हिंसा की ताकत का प्रदर्शन करके अंग्रेजी सेना से सीधा मुकाबला करके जान ले और बलिदान दे रहे हैं।

गांधी का मानना यह था कि हिंसक मार्ग से क्रांति करके देश के बच्चे बच्चे को या स्त्री, बुजुर्ग, कमजोर, दलित, शोषित आदि को भी अंग्रेजी राज के खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट नहीं किया जा सकता। हिंसा या हथियारों का इस्तेमाल करके बहुत कम ही लोग अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए एकजुट किए जा सकते थे। वैसे भी, हथियारों की ताकत या हिंसा की मदद से ही अंग्रेजों ने दुनियाभर में ऐसा साम्राज्य बनाया था, जिसमें सूरज कभी अस्त नहीं होता था इसलिए अंग्रेजों की सैन्य ताकत का मुकाबला सैन्य तरीकों से करना बहुत ही मुश्किल कार्य था। जबकि अहिंसा, सत्याग्रह, अनशन, असहयोग आदि अहिंसक तरीकों से समूचे देश को एकजुट करके देश के हर कोने से अंग्रेजी राज को चुनौती दी जा सकती थी। इसी मकसद से गांधी अपने अहिंसक हथियारों के मार्ग से कभी नहीं डिगे।

गांधी का विरोध करने वालों का तर्क है कि अंग्रेज भारत से इसलिए गए क्योंकि यहां हिंसक क्रांति का सामना वह नहीं कर पाए। मगर इतिहास पढ़कर पता लगता है कि हर हिंसक क्रांति या हिंसक आंदोलन को अंग्रेजों ने अपनी फौजी ताकत से कुचल डाला। न जाने कितने क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका कर, तोप से उड़ाकर, गोली मारकर या अन्य बर्बर तरीकों से यातना देकर शहीद कर दिया। सन 1857 में हुए देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों से लेकर सेकंड वर्ल्ड वार के दौरान सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज को भी अपनी सैन्य ताकत से अंग्रेजों ने शहीद कर दिया। इनके अलावा, न जाने कितने और क्रांतिकारी अंग्रेजी जेलों में काला पानी या अन्य सजाओं में जीवन भर कैद रहकर वहीं शहीद हो गए। निसंदेह हिंसा के मार्ग से क्रांति करने वाले देश के लाखों- करोड़ों शहीदों के बलिदान से हमें आजादी मिली है।

मगर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजी राज में ऐसे करोड़ों लोग, जो कमजोर, दलित, शोषित, महिला, कम उम्र किशोर, बुजुर्ग भी थे, जिनके लिए सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपना पाना संभव ही नहीं था। फिर इतना गोला- बारूद या हथियार भी क्रांतिकारियों के पास नहीं था , जो वे देश के हर व्यक्ति को बांट कर अंग्रेजों की फौज से लड़ने के लिए मैदान में उतार सकें।

यही नहीं, आर्थिक कारणों से खुद भारत के ही लोगों को अंग्रेजी फौज में नौकरी करके क्रांतिकारियों से लड़ने के लिए अंग्रेज मैदान में उतार रहे थे। ऐसे हालात में वह गांधी का अहिंसक तरीका ही तो था, जिसने देश के हर व्यक्ति को अंग्रेजों से लड़ने का हथियार और ताकत दे दी। गांधी के नेतृत्व में पूरे देश में जिस तरीके से सत्याग्रह, अनशन, अहिंसक विरोध, मार्च, असहयोग, रैली, धरना, प्रदर्शन, शांति पूर्ण तरीके से कानून तोड़ने, अंग्रेजी सामान के बहिष्कार आदि गांधीवादी तरीकों से देश के करोड़ों लोग सड़कों पर उमड़ आए, उसने न सिर्फ पूरी दुनिया में भारत के लोगों की एकजुटता और ताकत का चर्चा करा दिया बल्कि अंग्रेजी फौज के सारे हथियार भी बेअसर कर दिए।

शांतिपूर्ण तरीकों से सड़कों पर विरोध करने के लिए अगर आज भी हजारों- लाखों लोग कहीं किसी भी देश में उतर आते हैं तो सोचिए कि वहां की सरकार किस तरह घबरा जाती है। फिर कल्पना कीजिए कि गांधी की एक आवाज पर जब पूरा देश यानी करोड़ों लोग अंग्रेजी राज का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आया करते होंगे तो अंग्रेजी फौज और अंग्रेजी सरकार के लिए क्या हालात होते होंगे? वह भी तब , जब निहत्थे और शांतिपूर्ण तरीकों से विरोध करने वाले भारतीयों का दमन करने के लिए अंग्रेजों को भारतीय सैनिकों से ही भरी अपनी फौज को भेजना पड़ता रहा होगा। उस वक्त जैसा हंगामा मचता होगा, उससे क्या ब्रिटेन में बैठे अंग्रेजी फौज के आका बेखबर रहते होंगे या बाकी दुनिया को कुछ सुनाई नहीं देता होगा?

गांधी के अहिंसक हथियारों की ताकत से आज भी दुनिया के हर देश की सरकार घबराती है। लिहाजा गांधी को कटु शब्द बोलकर देश को कायर या कमजोर बनाने का आरोप लगाने वालों को गांधी के नेतृत्व में देश की करोड़ों जनता की एकजुटता से उपजी ताकत का या तो पता नहीं है या वे गांधी विरोधी दुष्प्रचार में फंस गए हैं।

हालांकि खुद गांधी अपने आलोचकों या गाली देने वालों की बातें अथवा तर्क सुनकर नाराज होने की बजाय उन्हें मनाने या समझाने की कोशिश करते। सिर्फ शब्दों से उन पर हमला करने वालों को ही नहीं गांधी ने अपने ऊपर चाकू, हथियार, गोली, लाठी या अन्य हिंसक तरीके से हमलावर होने वाले व्यक्तियों को भी अपने अहिंसक तरीके से जोड़ने की पुरजोर कोशिश जीवभर की। इसके बावजूद गांधी के प्रति नफ़रत में कमी नहीं आई और उनसे नफ़रत करने वालों ने उन्हें हिंसा का सहारा लेकर अंततः मार भी दिया।

गांधी का शरीर उनके विरोधियों ने हिंसा का सहारा लेकर मृत जरूर कर दिया लेकिन पूरी दुनिया में सूरज की तरह रोशनी बिखेर रहे गांधी के विचारों को मार पाना उनके बस की बात ही नहीं है। क्योंकि गांधी एक कमजोर शरीर के स्वामी भले ही रहे हों मगर उनके विचार इतने ताकतवर हैं कि आज भी दुनिया के बड़े से बड़े तानाशाह या बड़ी से बड़ी फौज अथवा सरकार को नेस्तनाबूद कर सकते हैं।

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