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अगर समय हो तो जरुर पढ़ें: समाज में बलात्कार का अपराध एक अभिशाप

नैतिक मूल्यों के पतन से समाज में कुरीतियां बढ़ रहा है।

अगर समय हो तो जरुर पढ़ें: समाज में बलात्कार का अपराध एक अभिशाप
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दिनेश तिवारी

बलात्कार का अपराध संपूर्ण भारत को हिला चुका है तथा यह अपराध भारतीय समाज के लिए एक महामारी के रूप में सामने आया है। राज्य और भारत सरकार द्वारा इस अपराध को रोके जाने के कई प्रयास किए जा रहे हैं। समाज में बलात्कार का अपराध एक अभिशाप बनकर आया है, विभिन्न सामाजिक स्तरों पर बलात्कार को रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं।बलात्कार जैसे अपराध से केवल वयस्क स्त्रियां ही पीड़ित नहीं हैं, अपितु दुधमुंही बच्चियां भी बलात्कार जैसे जघन्य अपराध से पीड़ित हो रही हैं।अपराधी दुधमुंही बच्चियों के भी बलात्कार कर उनकी हत्याएं कारित कर रहे हैं। कुछ समय पूर्व एक वर्ष की बच्ची का बलात्कार किया गया तथा बलात्कार के उपरांत उसकी हत्या भी कर दी गई। किसी भी समाज में किसी भी स्त्री का बलात्कार होना केवल उस स्त्री के साथ अन्याय नहीं वरन उस समाज के सभ्य होने पर भी सवालिया निशान खड़ा करता है। दिल्ली में एक लड़की का अमानवीय बलात्कार और फिर उसकी मौत देश में स्त्रियों की हालत बयाँ करते हैं , ऐसा नहीं ये पहली और आखरी घटना थी,देश में लगभग हर 20 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है। ये तो वह आंकड़े हैं जो पीड़ित द्वारा पुलिस में शिकायत की जाती है, सोचिये .. ये आंकड़े इससे कही ज्यादा होंगे क्योंकि अभी भी 80% स्त्रियाँ लोक -लाज,गरीब,असहाय या अशिक्षित होने के कारण थाने तक पहुँच ही नहीं पाती होंगी। क्या ऐसे में किसी प्रदेश को सभ्य कहा जा सकता है ? क्या कारण है कि मेरा महान भारत जो की स्त्री को देवी कह कर पूजता था,जिसने स्त्रियों को या देवी सर्वभूतेषु कह कर उसे पूजनीय बनाया,पुरुषों द्वारा लिखे गए वेदों में भी उसे इतना सम्मान दिया की यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता तक कह दिया गया ।

वेदों, रामायण,महाभारत किसी में भी किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है, राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न किसी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया। महाभारत में पांड्वो की जीत हुई लाखों कौरव मारे गए,उनकी स्त्रियाँ विधवा हुई पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक लगाया। फिर अचानक क्या हुआ कि इसी भारत के प्रदेशों में स्त्रियों की इतनी दयनीय स्थिति हो गयी, उनके बलात्कार होने लगे ? इसके लिए हम को इतिहास में झांकना होगा

ये तो सभी जानते हैं की भारत पर समय -समय पर विदेशी आक्रमण होते रहे हैं कुछ प्रमुख आक्रमण कारियों के इतिहास को देखते हैं।सिकंदर ने भारत पर लगभग 326- 327 ई0पू0 आक्रमण किया,पुरु और सिकंदर का भयंकर युद्ध हुआ हजारो -लाखो सैनिक मारे गए। युद्ध सिकंदर द्वारा जीत लिया गया,युद्ध जीतने के बाद भी राजा पुरु की बहादुरी से प्रभावित होकर जीता हुआ राज्य भी पुरु को दे दिया और बेबिलोन वापस चला गया। विजेता होने के बाद भी सिकंदर की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न तो धर्म परिवर्तन करवाया।कुषाण काल में (एक शताब्दी से 2 शताब्दी) बीच में आक्रमणकारी मूल रूप से चीन से आये हुए माने जाते थे,शकों को परास्त करते हुए ये अफगानिस्तान के दर्रो को पार करते हुए ये भारत में पहुँचे और भारत पर कब्ज़ा किया, इतिहास में कही भी शायद ऐसे नहीं लिखा कि इन्होने पराजित सैनिको अथवा स्त्रियों का बलात्कार किया हो।हूण (520 AD ) परसिया को जीतने के बाद ये अफगानिस्तान से होते हुए भारत में आये और यहाँ पर राज किया,बलात्कार शायद इन्होने भी नहीं किया किसी भी स्त्री का क्यों कि इतिहासकारों ने इसका कही जिक्र नहीं किया और भी आक्रमणकारी थे जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे शाक्य आदि पर बलात्कार शब्द तब तक शायद किसी को नहीं पता था। अब आते हैं मध्यकालीन भारत में …जहाँ से शुरू होता है इस्लामिक आक्रमण,और शुरू हुआ भारत में बलात्कार का प्रचलन ।

सबसे पहले मुस्लिम आक्रमण हुआ 711 ई . में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर राजा दाहिर को हराने के बाद उसकी दोनों बेटियों का बलात्कार करके उन्हें दसियों के रूप में खलीफा को तोहफा भेज दिया,तब शायद ये भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ। जिसमें हारे हुए राजा की बेटियों और साधारण स्त्रियों का जीती हुयी सेना द्वारा बुरी तरह से बलात्कार हुआ। गजनी ने पहला भारत पर आक्रमण 1001 ई में किया,इसके बारे में ये कहा जाता है कि इस्लाम को फ़ैलाने के ही आक्रमण किया था, सोमनाथ के मंदिर को तोड़ने के बाद उसके साथ हजारों हिन्दू स्त्रियों को अफगानिस्तान ले गया और उनके साथ बलात्कार करके दासों के बाजारों में उन्हें बेच दिया गया। गौरी ने 1175 में सबसे पहले मुल्तान पर आक्रमण किया,मुल्तान में इस्लाम फ़ैलाने के बाद उसने भारत की तरफ रुख किया। पृथ्वी राज को दूसरे युद्ध(1192) में हराने के बाद उसने पृथ्वीराज को इस्लाम कबूल करने के लिए कहा पर जब पृथ्वीराज ने इंकार तो उसने न की पृथ्वीराज को अमानवीय यातनाये दी बल्कि उन लाखों हिन्दू पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया और अनगिनत हिन्दू स्त्रियों के साथ उसकी सेना ने बलात्कार किया जिन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया था ।

ये सूची बहुत लम्बी है,पर मेरे कहने का बस इतना तात्पर्य है कि मध्य कालीन में मुगलों द्वारा पराजित हिन्दू राजाओं की स्त्रियों का और साधारण हिंदू स्त्रियों का बलात्कार करना एक आम बात थी,क्योंकि वो इसे अपनी जीत या जिहाद का इनाम मानते थे। धीरे -धीरे ये बलात्कार करने की रुग्ण मानसिकता भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी और आज इसका ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है तो इस प्रकार भारत में बलात्कार करने की मानसिक रोग उत्त्पन्न हुआ।ठीक उसी प्रकार जैसे सर पर मैला उठाने की प्रथा वैदिक काल में नहीं थी और न ही उसके बाद तक जब तक की मुगलों का आगमन भारत में नहीं हुआ था।मैला उठाने की प्रथा मुगलों के समय माना जाता है। सन 80 से 90 दशक में उत्तर भारत के किसी सिनेमाघर में कोई फिल्म दिखाई जा रही थी।पर्दे पर जैसे ही शक्ति कपूर रूपी खलनायक चरित्र ने अनीता राज रूपी चरित्र का बलात्कार करना शुरू किया, तो हॉल में सीटियां बजनी शुरू हो गईं।तभी अचानक बिजली चली गई।अब जब तक जेनरेटर चलाया जाता और पर्दे पर फिर से रोशनी आती तब तक दर्शकों ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया और जब बिजली आई तो कहा गया कि उस सीन को दोबारा चलाया जाए।

बड़ी संख्या में उस दौर के पुरुष दर्शक बलात्कार के दृश्य बहुत पसंद करते थे। हाट-बाज़ार में यहां-वहां लगे पोस्टरों के कोनों में जान-बूझकर ऐसे दृश्य अवश्य लगाए जाते थे, जिससे लोगों को यह पता चल सके कि इस फिल्म में बलात्कार का दृश्य भी है। सिनेमाघर के ठीक बाहर के पान की दुकानों पर ये शिकायत आम रहती थी कि बलात्कार का सीन तो दिखाया गया, लेकिन कपड़े ठीक से नहीं फाड़े, कुछ ठीक से नहीं दिखाया, उतना मज़ा नहीं आया।फ़िल्म देखने वालों में चर्चा रहती थी। हालांकि सिनेमाघर में मौजूद कुछ ऐसे दर्शक भी अवश्य होते थे, जिनकी सहानुभूति पीड़िता के चरित्र से रहती थी।यह कहना मुश्किल है कि उस दौर के फिल्मकारों ने लोगों की इस मानसिकता को अच्छी तरह समझकर इस ट्रेंड को भुनाना शुरू किया था, या कि फिल्मकारों द्वारा इस रूप में परोसे गए दृश्यों की वजह से लोगों की रुचि और मानसिकता इस प्रकार की बन गई थी।इससे मिलती-जुलती एक घटना कुछ समय पहले देखने में आई. बिहार में एक रात्रिकालीन बस जिन्हें आमतौर पर वीडियो कोच कहा जाता है, में सफर करते हुए कंडक्टर ने एक ऐसी फिल्म चलाई जिसमें फिल्म का प्रौढ़ खलनायक बार-बार अलग- अलग तरीकों से अलग-अलग स्कूली बच्चियों का अपहरण और बलात्कार करता था। स्कूल यूनिफॉर्म में ही बलात्कार के दृश्यों को लंबा और वीभत्स रूप में दिखाया जा रहा था। तब एक सभ्य यात्री ने कंडक्टर को बुलाकर कहा कि भाई ये सब क्या चला रहे हो। इस बस में महिलाएं और बच्चे भी सफर कर रहे हैं, कम से कम उनका तो लिहाज करो। कंडक्टर अनसुना करते हुए आगे बढ़ गया। दोबारा ऊंची आवाज में कहा गया तो कंडक्टर भी भड़क गया। दाढ़ी और वेश-भूषा देखकर कहने लगा बाबाजी ये आपके काम की चीज नहीं है,आप तो आंख बंद करके सो जाइये। यात्रा लम्बी है,लंबी बस में सबसे पिछली सीट पर बैठे लोग उस फिल्म का भरपूर आनंद लेना चाहते थे और बार-बार कंडक्टर से कह रहे थे कि आवाज बढ़ाओ। लेकिन इसके बाद चार-पांच अन्य मुसाफिरों ने भी जब उस फिल्म के दिखाने पर आपत्ति जताई और बात ड्राइवर तक जा पहुंची तो आखिरकार फिल्म को बदल दिया गया और ज्यादा हल्ला होने पर थोड़ी देर बाद उस वीडियो को ही पूरी तरह बंद कर दिया गया।अक्सर बस की यात्रा में अनेकों बार अनुभव किया होगा।नब्बे के दशक के आखिर तक उत्तर प्रदेश के कई छोटे जिले में इन पंक्तियों के आप लोगों ने देखा कि एक-दो ऐसे विशेष सिनेमाघर होते थे, जिनकी ख्याति ही ऐसी फिल्मों की होती थी जिनमें बलात्कार इत्यादि के कई दृश्य फिल्माए गए होते थे।प्रचलित शब्दावली में जिन्हें 'बी ग्रेड' या 'सी ग्रेड' कहा जाता था, ऐसी फिल्में ही उनमें दिखाई जाती थीं। घोषित रूप से मॉर्निंग शो में चलने वाली एडल्ट फिल्मों के अशोभनीय और वीभत्स पोस्टर दिल्ली के कनॉट प्लेस से लेकर पटना लखनऊ भोपाल मुंबई जैसी राजधानियों के लगभग हर सार्वजनिक स्थल पर सटे हुए हम सबने देखे ही होंगे।

उत्तर प्रदेश के हाथरस में सामूहिक बलात्कार की जघन्य वारदात पर व्यापक आक्रोश के बीच इन घटनाओं के वर्णन का उद्देश्य सिनेमा रूपी माध्यम को या समाज के किसी खास वर्ग को कोसना या उसका नकारात्मक चित्रण करना नहीं है,क्योंकि आज हम उस दौर से बहुत आगे बढ़ चुके हैं। इंटरनेट क्रांति और स्मार्टफोन की सर्वसुलभता ने पोर्न या वीभत्स यौन-चित्रण को सबके पास आसानी से पहुंचा दिया है,कल तक इसका उपभोक्ता केवल समाज का उच्च मध्य-वर्ग या मध्य-वर्ग ही हो सकता था, लेकिन आज यह समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ हो चुका है। सबके हाथ में है और लगभग फ्री है, कीवर्ड लिखने तक की जरूरत नहीं, आप मुंह से बोलकर गूगल को आदेश दे सकते हैं, इसलिए इस परिदृश्य घटना पर विचार करना किसी खास वर्ग या क्षेत्र के लोगों के बजाय हम सबकी आदिम प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास है।तकनीकें और माध्यम बदलते रहते हैं, लेकिन हमारी प्रवृत्तियां कायम रहती हैं या स्वयं को नए माध्यमों के अनुरूप ढाल लेती हैं।

इसे ऐसे समझें कि कभी फुटपाथ पर बिकने वाले अश्लील साहित्य से लेकर टीवी-वीसीआर-वीसीडी और सिनेमा के रास्ते आज हम यू-ट्यूब तक पहुंच चुके हैं। लेकिन एक समाज के रूप में हमारी यौन-प्रवृत्तियां बद से बदतर होती गई हैं। उदाहरण के लिए, यदि हम यू-ट्यूब पर अंग्रेजी में 'रेप सीन' लिखकर सर्च करें तो 21 लाख परिणाम आते हैं।इसका मतलब है कि लोग आज भी फिल्मों के उस विशेष हिस्से को बार-बार देखना-दिखाना चाहते हैं जिनमें बलात्कार को फिल्माया गया होता है। और यह भी कि बलात्कार के ऐसे दृश्य देखकर हममें करुणा, सहानुभूति या आक्रोश की भावना पैदा नहीं होती, बल्कि ये दृश्य मनोरंजन और यहां तक कि हमारी काल्पनिक यौन-इच्छाओं को संतुष्ट करने का साधन बनते हैं।इसका एक प्रमाण यह भी है कि यू-ट्यूब की तर्ज पर ही एक समानांतर 'रेप-ट्यूब' का अस्तित्व में होना भी देखा गया है, जिस पर बलात्कार से सबंधित पोर्न वीडियो डाले जाते हैं। इसलिए बलात्कार के समय बलात्कारियों द्वारा घटना का वीडियो बनाना केवल ब्लैकमेल के उद्देश्य से नहीं होता होगा, बल्कि उसे ऐसी साइटों पर प्रदर्शित करने का उद्देश्य भी रहता होगा।

बहुत अरसा नहीं हुआ जब कठुआ की आठ-वर्षीय बच्ची आसिफा के साथ हुआ जघन्य अमानवीय कृत्य भारत में पोर्न-साइटों पर पहले स्थान पर ट्रेंड कर रहा था।कुछ समय पहले कानपुर में चार नाबालिग लड़कों ने कथित रूप से छह साल की एक बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार किया था और रिपोर्टों के मुताबिक आरोपितों ने पोर्न वीडियो देखते हुए घटना को अंजाम दिया था।यह सिलसिला आज हैदराबाद और उन्नाव होता हुआ हाथरस तक आ पहुंचा है।साल 2006 में जापान में एक वीडियो गेम रिलीज़ किया गया जिसका नाम था 'रेपले'. इस गेम में दिखाया गया कि किस तरह एक युवक बारी-बारी से एक मां और उनकी दो बेटियों का पहले तो जगह-जगह पीछा करता है और फिर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग तरीकों से उनके साथ बलात्कार करता है. हमें यह जानकर आश्चर्य हो, लेकिन इस गेम को साल 2009 तक अमेज़न डॉट कॉम पर भी खरीदा जा सकता था। इसके बाद कुछ लोगों के विरोध के चलते इसे कई देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया,जबकि कई लोगों ने इस गेम के समर्थन या बचाव में भी लेख लिखे। दलील यह दी गई कि जब हत्या जैसे अपराध के बारे में गेम बनाए जाते हैं, तो बलात्कार के ऊपर क्यों नहीं ? कहा जा रहा है कि इसी तरह के अन्य कई रेप गेम अभी भी किशोरों और युवाओं के लिए सुलभ हैं और उनके बीच लोकप्रिय हैं,हालांकि यह आसानी से समझ में आने वाली बात है कि जिन चीजों को हम बार-बार देखते हैं या जिन बातों के बारे में हम बार-बार सोचते हैं, वे हमारे मन, वचन और कर्म पर कुछ न कुछ प्रभाव तो अवश्य ही छोड़ते हैं। प्राचीन मनीषियों ने अपनी दैहिक और आध्यात्मिक साधना से भी इसे अनुभूत और प्रमाणित किया था।संतों की वाणियों में अक्सर हमें ये बातें सुनने को मिलती हैं। आधुनिक युग में मनोवैज्ञानिकों ने भी अपने अध्ययन में पाया है कि हमारे दिमाग की बनावट इस तरह की है कि बार-बार पढ़े, देखे, सुने या किए जाने वाले कार्यों और बातों का असर हमारी चिंतनधारा पर होता ही है और यह हमारे निर्णयों और कार्यों का स्वरूप भी तय करता है. इसलिए पोर्न या सिनेमा और अन्य डिजिटल माध्यमों से परोसे जाने वाले सॉफ्ट पोर्न का असर हमारे दिमाग पर होता ही है और यह हमें यौन-हिंसा के लिए मानसिक रूप से तैयार और प्रेरित करता है।इसलिए अभिव्यक्ति या रचनात्मकता की नैसर्गिक स्वतंत्रता की आड़ में पंजाबी पॉप गानों से लेकर फिल्मी 'आइटम सॉन्ग' और भोजपुरी सहित तमाम भारतीय भाषाओं में परोसे जा रहे स्त्री-विरोधी, यौन-हिंसा को उकसाने वाले और महिलाओं का वस्तुकरण करने वाले गानों की वकालत करने से पहले हमें थोड़ा सोचना होगा।

एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी 'फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन' ने अपने आपराधिक आंकड़ों के विश्लेषण में पाया है कि यौन हिंसा के 80% मामलों में वहां पोर्न की मौजूदगी देखी गई है।टेड बंडी नाम के एक अमरीकी सीरियल किलर ने 30 से अधिक महिलाओं और लड़कियों का वीभत्स तरीके से बलात्कार और फिर उनकी हत्या की थी। जनवरी 1989 में मौत की सजा से एक दिन पहले दिए गए अपने विस्तृत साक्षात्कार में बंडी ने कहा था कि यदि उसे पोर्न देखने की आदत नहीं पड़ी होती, तो उसने इतने हिंसक यौन- अपराध नहीं किए होते। हालांकि बंडी की इस स्वीकारोक्ति के बाद भी पोर्न समर्थकों द्वारा बंडी और उसके साक्षात्कारकर्ता की मंशा का हवाला देते हुए इस तथ्य की अनदेखी करने की कोशिशें हुईं।बंडी के साक्षात्कार का वह वीडियो भी यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। शक्ति कपूर या गुलशन ग्रोवर को फिल्मी परदे पर बलात्कार करते देखते हुए यौन-उत्तेजना के शिकार होकर आनंदित होनेवाले दौर के लोग आज स्वयं बेटियों के पिता होंगे और अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर सचमुच चिंतित होंगे।तो क्या यह कहा जा सकता है कि इनमें से कई पिता अपनी खुद की पत्नी या बेटियों को लेकर भले ही चिंतित हों, लेकिन यह जरूरी नहीं कि अन्य महिलाओं या लड़कियों के प्रति भी उनकी संवेदना या समानुभूति वैसी ही हो।यानी हममें से बड़ी संख्या में ऐसे पुरुष हो सकते हैं जिन्होंने अपने लड़कपन के दौर से आगे बढ़ते हुए महिलाओं या मनुष्यमात्र के प्रति सच्ची संवेदना विकसित कर ली हो। लेकिन हममें से ही बड़ी संख्या में ऐसे पुरुष भी हो सकते हैं, जो संभावित बलात्कारी हों और ऐसा अवसर आने पर ऐसी हिंसा को अंजाम दे दें। यही एक बात है जो हमें समझनी है।

दुनिया की कोई भी सरकार पोर्न, साहित्य और सिनेमा को बैन करने में न तो पूरी तरह सफल हो सकती है और न ही बैन या सेंसरशिप इसका वास्तविक समाधान है। यह एक सभ्यतामूलक चुनौती है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन में मानवीय मूल्यों के समावेश का उपक्रम है।अहिंसा, करुणा,सहानुभूति और मनुष्यमात्र की गरिमा के प्रति सम्मान की भावना भरने का एक प्रबोधनात्मक सामाजिक परियोजना है। जो हमारी सहानुभूति,अहिंसा और साथी-मनुष्य के प्रति संवेदना को प्रायः समाप्त कर देता है। ऐसा एक भी दिन नहीं होता कि देश के किसी न किसी अख़बार में किसी बच्चे के साथ हिंसा या यौन हिंसा की खबर न छपे। कई बार रेप का शिकार नवजात बच्चियां भी होती हैं।

भारत के कई राज्यों में राजस्थान सबसे ऊपर और यूपी सबसे नीचे है।100 फीसदी साक्षर आबादी वाले केरल और महिला स्वाभिमान की गौरवपूर्ण कहानियों से भरे राजस्थान में सबसे ज्यादा बलात्कार होते हैं। संभव है कि पढ़ने में यह बात आपको चौंकाने वाली लगे,लेकिन हकीकत यही है नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी भारत में अपराध -2019 रिपोर्ट के मुताबिक महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों में केरल और राजस्थान शीर्ष पर हैं। वहीं, केंद्र शासित प्रदेशों को साथ लेकर आकलन करें तो चंडीगढ़ में सर्वाधिक बलात्कार की घटनाएं हुई हैं। इस सूची में दिल्ली राज्य की स्थिति राजस्थान के बाद नंबर दो है तो केरल चौथा सबसे अधिक दुष्कर्म की घटनाओं वाला प्रदेश है।वहीं देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की स्थिति 25 अन्य केंद्र शासित प्रदेशों और राज्यों से कहीं बेहतर है। एनसीआरबी द्वारा जारी भारत में अपराध -2019 रिपोर्ट बताती है कि चंडीगढ़ में प्रति एक लाख महिला आबादी पर बलात्कार की दर 20.7 है तो राजस्थान, दिल्ली और केरल में क्रमशः 15.9,13.5 और 11.1 की दर से महिलाओं के साथ दुष्कर्म जैसा जघन्य कुकृत्य हुआ है। इस राष्ट्रीय आकलन रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में प्रति एक लाख महिला आबादी पर बलात्कार के अपराधों में उत्तर प्रदेश की अपराध दर 2.8 है, जो देश के 25 अन्य राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों की अपराध दर से कहीं बेहतर है, जाहिर है कि देश के अन्य राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों की तुलना में उत्तर प्रदेश राज्य की स्थिति अपराध नियंत्रण में अच्छी है,जबकि असम,झारखंड,छत्तीसगढ़, पंजाब,उड़ीसा,मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में भी स्थिति चिंतनीय है।

आजकल बलात्कार एवं छेड़छाड़ की घटना को हथियार बनाकर राजनीति के रूप में राजनीतिक पार्टियां इस्तेमाल करने में पीछे नहीं है। किसी को भी बदनाम करने में जब चाहे तब प्रयोग हो सकता है। जबकि बलात्कार की घटना महिलाओं के जीवन में सबसे बड़ा कलंक का क्षण होता है। उन्हें उबरने के लिए मनोवैज्ञानिक ढंग से समाज सरकार और मीडिया को नया रास्ता बनाना होगा।यह सही है जो वास्तविक पीड़ित महिला होती है वह मीडिया में हेडलाइन नहीं बन पाती है। लेकिन जो कहानी बनती बिगड़ती है उस जाल में काफी फंस कर बर्बाद हो गए कई ब्लैकमेलिंग के शिकार भी हुए,कई लोगों ने लंबी रकम देकर जान छुड़ाया,कई लोगों को लंबी रकम देने के बाद भी जान नहीं बच पाया। संतों में आशाराम, नारायण साईं,राम रहीम,ओम बाबा,निर्मल बाबा तथा नेताओं में गायत्री प्रजापति,चिन्मयानंद आदि ही चर्चित नहीं है बल्कि सपा,बसपा, कांग्रेस और आरजेडी नेताओं पर भी लगे रेप और यौन शोषण के आरोप, बीजेपी की भी लम्बी लिस्ट है। ब्यूरोक्रेट्स भी पीछे नहीं है।व्यापारियों,उद्योगपतियों और सामाजिक कार्यकर्ता,पत्रकार और जनता की सुरक्षा में लगे पुलिस भी अछूते नहीं है। यूपी के नीति नियंताओं ने एन्टी रोमियो स्वायड के जरिए बदलाव की कोशिश की थी जो आज वैश्विक कोरोना महामारी के दौर में सफलता और असफलता के साथ बढ़ता हुआ आज हाथरस कांड जैसे कई कांड होने के बाद महिलाओं की सुरक्षा पर मिशन शक्ति का जन्म हुआ हैं।देखना लाजमी है कि क्या इतिहास बदल पायेगा। हमारा समाज सभ्यता के लिए विख्यात भारतीय संस्कृति के अनुरूप महिलाओं को सम्मान दे पाएगा और विकृत मानसिकता की जाल को तोड़ सकेंगे।कई सवाल आज भी उभरते है। सरकार और समाज को मिलकर ही सभ्य समाज की परिकल्पना का परिभाषा स्थापित कर सकते है। संवैधानिक पदों पर बैठें लोगों को अपनी जबान में सही बोल बोलने होंगे। यह कहने कि बच्चे है गलती हो जाती है से काम नहीं चलेगा,महिलाओं के अस्मिता की रक्षा करना हर एक व्यक्ति के लिए मुश्किलें नहीं है अगर नैतिकता का संकल्प ले ले। लेकिन किसी भी महिला के साथ घटना होने पर ईमानदारी के साथ प्रशासनिक अधिकारी /पुलिस अधिकारी मिशन शक्ति में मिले कानून के हथियार का दुरुपयोग न कर सदुपयोग के जरिए नया वातावरण बनाए और समाज में विश्वास स्थापित कर अनैतिक मूल्यों से नैतिकता को ओर जनजागृति करें। महिला समाज को भी नैतिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प लेना होगा।

Shiv Kumar Mishra
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